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छत्तीसगढ़ी लोकमन के कवि और हिन्दी कविता के सजग हस्ताक्षर लक्ष्मण मस्तुरिया

स्वराज्य करुण
वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर

आम जनता के बीच लक्ष्मण मस्तुरिया की पहचान छत्तीसगढ़ी भाषा के सुमधुर कवि और गायक के रूप में आजीवन बनी रही। वर्षों तक उन्होंने कवि सम्मेलनों में अपनी छत्तीसगढ़ी कविताओं से जनता के दिलों पर एक बेताज बादशाह के रूप में राज किया।

माटी-महतारी की वंदना के उनके छत्तीसगढ़ी गीत खूब लोकप्रिय हुए। वहीं, छत्तीसगढ़ के मजदूरों, किसानों और साधारण मनुष्यों के दुःख-दर्द को प्रकट करने वाली उनकी कविताएँ भी जनता के दिलों की गहराइयों में उतरती रहीं। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए जनमत निर्माण में उनकी रचनाओं ने उत्प्रेरक की तरह अपनी यादगार भूमिका निभाई। उन्होंने छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए भी कई भावुक और कर्णप्रिय गीत लिखे। लेकिन अधिकांश लोगों को नहीं मालूम कि लक्ष्मण मस्तुरिया ने छत्तीसगढ़ी भाषा के साथ-साथ हिन्दी में भी खूब कविताएँ लिखीं।

आज अगर वे हमारे बीच होते तो 77 साल के हो चुके होते, और उनका कवि हृदय उस वक्त भी अपनी रचनाओं में युवा दिलों की धड़कनों को स्वर दे रहा होता। बिलासपुर जिले के ग्राम मस्तूरी में 7 जून 1949 को जन्मे लक्ष्मण मस्तुरिया की जिंदगी का सफर उनके गृह नगर, राजधानी रायपुर में 3 नवम्बर 2018 को अचानक हमेशा के लिए थम गया। उनके लाखों चाहने वाले श्रोता और प्रशंसक स्तब्ध रह गए। लेकिन लगता नहीं कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं, क्योंकि विभिन्न छत्तीसगढ़ी एलबमों में संरक्षित उनके सदाबहार गानों की मीठी अनुगूंज, जनता के होठों पर गाहे-बगाहे उन गीतों की गुनगुनाहट और किताबों में शामिल उनकी कविताएँ हमें एहसास दिलाती हैं कि वे आज भी यहीं कहीं हमारे आस-पास हैं।

उनकी कविताओं में छत्तीसगढ़ सहित सम्पूर्ण भारत के आम जनों, मजदूरों और किसानों की भावनाएँ तरंगित होती हैं। उनका जनप्रिय और कालजयी गीत है ‘मोर संग चलव गा’, जिसमें समाज के गिरे, थके लोगों से साथ चलने का आह्वान है। आकाशवाणी रायपुर केंद्र से सत्तर के दशक में जब पहली बार यह गीत प्रसारित हुआ तो कर्णप्रिय संगीत के साथ इसके शब्दों ने जनता को सम्मोहित कर लिया था। लोग झूम उठे थे। तब से लेकर अब तक, विगत लगभग पाँच दशकों में इस गीत ने लोकप्रियता का ऐसा कीर्तिमान बनाया है कि आज भी यह आम जनता की जुबान पर है। यहाँ तक कि परस्पर विरोधी राजनीतिक दलों और एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी प्रत्याशियों को भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान रैलियों और आम सभाओं में लाउडस्पीकर पर इस गीत को बजवाते देखा जा सकता है।

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मस्तुरिया जी के ऐसे कई छत्तीसगढ़ी गीत हैं, जिनके ऑडियो-वीडियो कैसेट और एलबम काफी लोकप्रिय हुए हैं। उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं के प्रकाशित संकलनों में (1) हमू बेटा भुइंया के, (2) गंवई-गंगा, (3) घुनही बंसुरिया, (4) छत्तीसगढ़ के माटी और (5) सांवरी शामिल हैं। वहीं, एक खंडकाव्य ‘सोनाखान के आगी’ भी प्रकाशित हो चुका है, जो यहाँ के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमर शहीद वीर नारायण सिंह के नेतृत्व में 1857 में अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ हुए विद्रोह पर आधारित है।

उनकी हिन्दी कविताओं का पहला संकलन ‘सिर्फ सत्य के लिए’ वर्ष 2008 में राजधानी रायपुर की साहित्यिक संस्था ‘सृजन सम्मान’ द्वारा प्रकाशित किया गया था। इसमें उनकी 71 कविताएँ शामिल हैं। इनमें मुक्तछंद की रचनाओं के साथ-साथ छंदबद्ध रचनाएँ भी हैं। उनके हिन्दी निबंधों का संग्रह ‘माटी कहे कुम्हार से’ भी वर्ष 2008 में प्रकाशित हुआ।

उनके हिन्दी कविता-संग्रह ‘सिर्फ सत्य के लिए’ की पहली कविता है ‘गाँवों की ओर’। इसमें लक्ष्मण कहते हैं—

**”लौट चलो गाँवों की ओर,
गौतम-गाँधी मिलेंगे,
गलियों, चौपाल पर,
खेतों की मेड़,
नदी, नालों और ताल पर।
मुक्त करो प्राण पंख
सभ्यता की डोर।

शहरों की भीड़ में
खो गया विवेक,
रास्ते बहुत बने, पर
आदमी वह एक,
रुंध रहे दिल-दिमाग,
दहलाते शोर।

रुपयों के पीछे बस
भाग रहा आदमी,
प्रतिस्पर्धा-धूर्तता में
नाच रहा आदमी,
पंगु व्यवस्था में बढ़ा
डंडे का जोर।”**

संग्रह की शीर्षक कविता ‘सिर्फ सत्य के लिए’ में आज के विसंगतिपूर्ण लोकतंत्र में सिर झुकाकर जीने को मजबूर आम नागरिक की पीड़ा अभिव्यक्त होती है। कवि इस बेरहम व्यवस्था पर तंज कसते हुए उस दलित, शोषित मनुष्य से कहता है—

**”मस्तक जरा झुकाकर जी, सर को यहाँ बचाकर जी,
सबके सब पद्मासन में, तेरा क्या सिंहासन में।

कंचन बिखरा आंगन पर, कंकर तेरे दामन भर,
अपने हिस्से के रजकण को अपना तिलक बनाकर जी।

छूना मत अनजाने में, बैठे सर्प खजाने में,
निर्धन की क्या हस्ती है, धनवालों की बस्ती है।
अपनी खरी मजूरी पर तू रूखी-सूखी खाकर जी।

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पग-पग अत्याचार बढ़ा, झूठों का सत्कार बढ़ा,
छल जो किया अदाओं ने, तमगे दिए सभाओं ने।
देख, समझ मत लेकिन उंगली दाँतों तले दबाकर जी।

तूने जितना भी देखा, वह सब पानी पर रेखा।
पाँव-पाँव में कंटक है, जीवन सब पर संकट है।
बीच डगर पर पड़े हुए ये सारे शूल उठाकर जी।

है बिसात क्या भवनों की, शोभा कितनी गहनों की।
हर श्रृंगार अधूरा है, सारा वैभव धूरा है।
सिर्फ सत्य के लिए स्वयं की अंतर ज्योति जलाकर जी।”**

किसी भी सच्चे कवि की संवेदनाएँ सम्पूर्ण सृष्टि, यहाँ तक कि रूखी-सूखी घास के प्रति भी होती हैं। कवि कफन ढूँढती लाश और युद्ध के विनाश से भी दुःखी होता है। लक्ष्मण मस्तुरिया ‘दुःख है’ शीर्षक कविता में कहते हैं—

**”सबको अपनी प्यास का दुःख है,
मुझे धरा, आकाश का दुःख है।

टूट गिरी जो उस शबनम को
रूखी-सूखी घास का दुःख है।

फिक्र तुम्हें है नागफनी की,
मुझको मगर पलाश का दुःख है।

चार गिरह जो कफन ढूँढती,
बदकिस्मत उस लाश का दुःख है।

कभी बात रोटी तक पहुँची
और कभी आवास का दुःख है।

फूँके जो आबाद घरों को,
ऐसे युद्ध-विनाश का दुःख है।”**

कवि सम्मेलनों के मंचों पर सैकड़ों-हजारों श्रोता उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुना करते थे, क्योंकि उनकी रचनाओं में आम जनता के दिलों की आवाज गूँजती थी। उनमें आम जनों का दर्द झलकता और छलकता था। मंचीय कवि सम्मेलनों में वह खूब जमते थे, लेकिन उन्हें कवि सम्मेलनों में कुछ कवियों द्वारा हास्य कविता के नाम पर परोसा जाने वाला विदूषकीय फूहड़पन बिल्कुल पसंद नहीं था। मंचीय कविता की आड़ में होने वाली चुटकुलेबाजी से उन्हें सख्त नफरत थी। उनके इस हिन्दी काव्य-संग्रह के दो मुक्तकों में इसे महसूस किया जा सकता है—

(1)

“डंडे को बेलन क्या कहना,
टुनटुन को हेलन क्या कहना।
चुटकुले सुनाने वाले मंच को
कवि सम्मेलन क्या कहना।”

(2)

“चारों ओर चलन बिक रहा है,
असहाय मेरा वतन दिख रहा है।
इस कारण राष्ट्र रतन मिट रहा है,
चिंतन और लेखन बिक रहा है।”

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लोकतंत्र के नाम पर आज के सियासी माहौल को देखकर भी वह बहुत क्षुब्ध रहते थे। साहित्यिक मंचों के साथ-साथ राजनीतिक मंचों के वातावरण से वह निराश थे। उनकी यह निराशा इस संग्रह की ‘मंच पर’ शीर्षक कविता में व्यंग्य के रूप में प्रकट हुई है—

“मंच पर विदूषक बनकर आ रहे हैं लोग,
वर्जनाएँ भूलकर सब गा रहे हैं लोग।
बात पहुँची है यहाँ तक इस नई तहजीब में,
आज नंगी लाश भी नचवा रहे हैं लोग।”

संग्रह में मुक्तछंद की उनकी कविता ‘रंगे सियार बैठे हैं’ देश और समाज के वर्तमान माहौल पर निशाना साधती है। वह जनता को ‘रंगे सियारों’ से सावधान करते हैं। कुछ पंक्तियाँ देखिए—

**”संभल कर रहना साथियों,
रंगे सियार बैठे हैं,
पराये कंधों से बंदूक चलाने वाले बैठे हैं।

यहाँ सुकर्म आदर्शों का मोल
कौन समझेगा?
जो जितना होगा पैंतरेबाज,
उतना और चमकेगा।”**

संग्रह की कविताओं पर छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद शंकर शुक्ल ने ‘संस्कृति की बदसूरती के खिलाफ प्रतिरोध की कविताएँ’ शीर्षक अपनी भूमिका के अंत में लिखा है, “लक्ष्मण मस्तुरिया की हिन्दी कविताएँ मंचवादी नहीं हैं। वे मुग्ध करने या वाह-वाह करने के लिए नहीं लिखी गई हैं। वे पाठक या श्रोता को अपने समय और परिवेश की विसंगतियों पर सोच-विचार के लिए उत्तेजित करने वाली कविताएँ हैं। विलुप्त होती मनुष्यता की चिंता उनकी मूल धुरी है। समय और समाज की विसंगतियों से कवि की टकराहट के विविधकोणी छायाचित्र उनमें उपस्थित हैं।”

संग्रह में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शोभाकांत झा का अभिमत भी प्रकाशित किया गया है। उन्होंने लिखा है, “कविता भी एक कला है, सृजन है, सौन्दर्यमूलक सत्याग्रह है और है मनुष्य में निहित एक बेहतर संसार की मांग। इस मांग और समाधान के बीच से लक्ष्मण मस्तुरिया का कविता-संग्रह ‘सिर्फ सत्य के लिए’ उपजा है।”

मस्तुरिया जी की इन हिन्दी कविताओं के संदर्भ में दोनों विद्वान साहित्यकारों की ये टिप्पणियाँ अत्यंत मूल्यवान हैं। वास्तव में, लक्ष्मण मस्तुरिया की ये हिन्दी कविताएँ मानव हृदय की कोमल भावनाओं के साथ गाँव, शहर, देश और समाज की जीवनव्यापी हलचल तथा आज के मनुष्य के दुःख-दर्द का एक जीवंत दस्तावेज हैं।