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समुद्र मंथन से महासागर संरक्षण तक भारतीय सांस्कृतिक विरासत

आचार्य ललित मुनि

समुद्र केवल जल का विशाल विस्तार नहीं है। भारतीय चेतना में समुद्र एक जीवंत सत्ता है, एक देवता है, एक रहस्य है और एक दर्पण भी है जिसमें मनुष्य अपने अस्तित्व की गहराई को निहारता है। जब हम भारतीय परंपरा में समुद्र के स्थान को समझने की कोशिश करते हैं, तो पाते हैं कि यह यात्रा केवल पुराणों और वेदों के पृष्ठों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी सामूहिक स्मृति में, हमारे पर्वों में, हमारी प्रार्थनाओं में और हमारी दैनिक जीवनशैली में भी उतनी ही गहरी उतरी हुई है।

समुद्र मंथन की कथा, जो विष्णु पुराण, भागवत पुराण और महाभारत के आदिपर्व में विस्तार से वर्णित है, केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं है। यह उस गहरी दार्शनिक सत्य की ओर संकेत करती है जिसे भारतीय ऋषियों ने युगों पहले जाना था कि समुद्र की गहराइयों में असीमित सम्पदा है, और उस सम्पदा को प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास, त्याग और धैर्य आवश्यक है।

विष्णु पुराण के अनुसार, देवताओं और असुरों ने मिलकर मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया। इस मंथन से चौदह रत्न प्रकट हुए जिनमें कामधेनु, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, शारंग धनुष, शंख, धन्वंतरि अमृत कलश सहित और सबसे पहले हलाहल विष प्रकट हुआ।

क्षीरोदमथनं कृत्वा देवदानवसंगतैः।
अमृतं समनुप्राप्तं सर्वलोकहितं महत्।। विष्णु पुराण
अर्थात: देवताओं और दानवों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया और समस्त लोकों के कल्याण के लिए महान अमृत की प्राप्ति की।

यह कथा हमें सिखाती है कि समुद्र केवल भौतिक संसाधनों का भंडार नहीं है, वह आध्यात्मिक सम्पदा का भी स्रोत है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि इस मंथन में सबसे पहले विष प्रकट हुआ और भगवान शिव ने उसे कंठ में धारण किया। यह प्रतीक बताता है कि जब हम प्रकृति के गर्भ में हस्तक्षेप करते हैं, तो पहले संकट आता है, और उस संकट को सँभालने की शक्ति और उत्तरदायित्व भी मनुष्य को ही उठाना पड़ता है।

ऋग्वेद में समुद्र को ‘सिंधु’ और ‘वरुण’ के अधिकार क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। वरुण देवता को जल और नैतिक व्यवस्था दोनों का संरक्षक माना गया है। यह संयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ है कि समुद्र की रक्षा एक नैतिक दायित्व है, न केवल व्यावहारिक आवश्यकता।

समुद्रं गच्छ स्वाहा।
वरुणस्य त्वा प्रसवेनादद ऋतस्य योनौ।। ऋग्वेद, मण्डल ७, सूक्त ८९
अर्थात: हे जल! तुम वरुण देव की प्रेरणा से ऋत (सत्य और व्यवस्था) के उद्गम स्थान, सागर की ओर प्रवाहित हो। यह सत्य की योनि है, जहाँ सब कुछ समाहित होता है।

अथर्ववेद में पृथ्वी सूक्त (भूमि सूक्त) में समुद्र को पृथ्वी की संपत्ति के रूप में देखा गया है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जल, वायु, और पृथ्वी हमारी माताएँ हैं और उनकी रक्षा करना हमारा प्राथमिक कर्तव्य है।

समुद्रश्च अन्तरिक्षं च तेजांसि च सर्वाणि च।
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।। अथर्ववेद १२.१.१२
अर्थात: समुद्र, आकाश और समस्त तेज इस पृथ्वी के अंग हैं। भूमि हमारी माता है और हम पृथ्वी के पुत्र हैं। इस माता का सम्मान और संरक्षण हमारा धर्म है।

वाल्मीकि रामायण में जब राम लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र के किनारे आते हैं और सागर से मार्ग माँगते हैं, तो यह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। राम तीन दिनों तक तपस्या करते हैं, लेकिन समुद्र उत्तर नहीं देता। तब वे क्रोधित होकर अग्निबाण उठाते हैं। तब समुद्रदेव प्रकट होते हैं।

नैसर्गिकी वशीकृत्य स्वभावो मम राघव।
गम्भीरत्वं हि मे नित्यं दुस्तरत्वं च सर्वदा।। वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड, सर्ग २२
अर्थात: हे राघव! मेरी गहराई और दुस्तरता मेरा स्वभावजनित गुण है जिसे मैं बदल नहीं सकता। यही प्रकृति का नियम है जिसे वश में नहीं किया जा सकता।

यह प्रसंग प्रकृति के प्रति भारतीय दृष्टिकोण का सटीक प्रतिनिधित्व करता है। समुद्र अपनी सीमाओं में रहता है, वह अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता। मनुष्य को उसके साथ सहयोग करना होगा, न कि उसे जीतने की कोशिश करनी होगी। नल द्वारा निर्मित राम सेतु इसी सहयोग का प्रतीक है, जहाँ मनुष्य और समुद्र मिलकर एक असंभव कार्य को संभव बनाते हैं।

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भारतीय पुराणों में सात समुद्रों का वर्णन है: लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, क्षीर और जल। य्ह एक दार्शनिक अवधारणा है जो बताती है कि ब्रह्मांड अनेक स्तरों पर अस्तित्वमान है और प्रत्येक स्तर की अपनी विशेषता, अपनी सम्पदा और अपना धर्म है।

भागवत पुराण में वर्णित है कि क्षीरसागर विष्णु का निवास है। यह कोई साधारण भूगोल नहीं है, यह आध्यात्मिक स्थलाकृति है जो बताती है कि जल में, विशेषकर समुद्र में, ईश्वरीय चेतना का वास है। इसीलिए समुद्र में अपशिष्ट फेंकना केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अपमान भी है।

दक्षिण भारत में, विशेषकर तमिल साहित्य में, समुद्र का स्थान अत्यंत विशेष रहा है। संगम साहित्य में ‘नेयतल’ (तटीय परिदृश्य) को पाँच भूदृश्यों में से एक माना गया है जो विरह और प्रतीक्षा के भाव से जुड़ा है। कवि नयनार और अलवार संतों ने समुद्र को ईश्वर की गहराई के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया।

केरल के मछुआरे समुद्र में उतरने से पहले ‘कडलम्मा’ (समुद्र माता) की पूजा करते हैं। उड़ीसा में रथयात्रा और बोइता बंदाना पर्व में समुद्र को एक पवित्र सत्ता के रूप में पूजा जाता है। महाराष्ट्र में नारली पूर्णिमा पर मछुआरे समुद्र को नारियल अर्पित करते हैं जो एक ऐसी परंपरा है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच पारस्परिक सम्मान का प्रतीक है।

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सिंधु घाटी सभ्यता के लोथल बंदरगाह (लगभग 3700 ई.पू.) से लेकर चोल साम्राज्य की नौसैनिक शक्ति तक, भारत का समुद्र के साथ सम्बंध केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि व्यावहारिक और सांस्कृतिक भी रहा है। चोल सम्राट राजेन्द्र चोल प्रथम ने ११वीं शताब्दी में दक्षिण-पूर्व एशिया तक नौसैनिक अभियान चलाया और भारतीय संस्कृति, भाषा और धर्म को इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और कम्बोडिया तक पहुँचाया।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ‘नाव्यध्यक्ष’ (समुद्री प्रशासक) का उल्लेख है जो समुद्री व्यापार और संसाधनों के प्रबंधन के लिए नियुक्त होते थे। भारतीय विधि परंपरा में भी समुद्र और जल को प्रदूषित करने के विरुद्ध स्पष्ट निर्देश मिलते हैं। मनुस्मृति में जल को दूषित करने को एक दंडनीय अपराध माना गया है।
नदीं देवखातं च तडागं वापि कूपकम्।
न दूषयेन्नरो धीमान् मूत्रपुरीषवर्जितैः।। मनुस्मृति, अध्याय ४, श्लोक ५६
अर्थात: बुद्धिमान मनुष्य को कभी नदी, देवखात (राजकीय जलाशय), तालाब, बावड़ी या कुएँ को मल-मूत्र जैसे अपशिष्ट पदार्थों से दूषित नहीं करना चाहिए। यह धर्म और बुद्धि दोनों के विरुद्ध है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ‘जलाध्यक्ष’ अर्थात जल प्रशासक का उल्लेख है जो नदियों, झीलों और समुद्री संसाधनों के प्रबंधन की देखरेख करता था। जो व्यक्ति जल को दूषित करता था उसे कठोर दंड दिया जाता था।

आज जब वैज्ञानिक बताते हैं कि प्रतिवर्ष 8 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक महासागरों में जाता है, जब प्रशांत महासागर में ‘ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच’ का आकार फ्राँस से तीन गुना बड़ा हो चुका है, जब प्रवाल भित्तियाँ (coral reefs) तेजी से नष्ट हो रही हैं और समुद्री तापमान बढ़ रहा है, तब भारतीय परंपरा का वह बोध और भी प्रासंगिक हो उठता है जो समुद्र को देवता और जीवनदायिनी शक्ति मानता था।

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गंगा आरती की परंपरा में ही महासागर संरक्षण का बीज छिपा है। जब हम नदी को माँ मानकर उसकी आरती करते हैं, तो हम वास्तव में यह स्वीकार करते हैं कि वह हमसे बड़ी है, हमारी दाता है। और जो हमसे बड़ा है उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। यही दर्शन महासागर संरक्षण का आधार बन सकता है।

भारत सरकार की ‘ब्लू इकोनॉमी’ नीति और ‘प्रोजेक्ट सागर’ जैसी पहलें इसी परंपरागत ज्ञान को आधुनिक नीति में रूपांतरित करने का प्रयास हैं। तटीय विनियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone) कानून और मैंग्रोव संरक्षण योजनाएँ उस प्राचीन भावना को कानूनी रूप देने की कोशिश हैं जो कहती थी: जल दूषित मत करो।

कालिदास ने रघुवंश में समुद्र को ‘रत्नाकर’ अर्थात रत्नों की खदान कहा है। यह नाम प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि समुद्र की सम्पदा बाहरी नहीं, आंतरिक है और उसे प्राप्त करने के लिए साधना चाहिए।

तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना।
तेजोविभजनं येन रत्नाकर इवाभवत्।। रघुवंश, सर्ग ६
अर्थात: विधाता ने महाभूतों की समाधि से जैसे समुद्र को रत्नाकर बनाया, वैसे ही तेज का विभाजन कर इस सृष्टि को समृद्ध किया। समुद्र की गहराई में जो रत्न हैं वे विधाता की सृजनशक्ति के प्रमाण हैं।

संस्कृत साहित्य में ‘क्षमा समुद्र की भाँति होनी चाहिए’ यह उपमा बार-बार आती है। समुद्र एक नैतिक आदर्श भी है। वह सब कुछ ग्रहण करता है, सब नदियाँ उसमें मिलती हैं, फिर भी वह अपनी सीमाएँ नहीं तोड़ता। यह संयम का प्रतीक है।

भारतीय परंपरा में समुद्र केवल एक भौगोलिक तथ्य नहीं है, वह एक जीवन-दर्शन है। समुद्र मंथन की कथा हमें सिखाती है कि प्रकृति से लेना है तो साथ मिलकर लो, उचित मूल्य चुकाओ और विष को भी स्वीकार करने का साहस रखो।  रामायण का सागर प्रसंग बताता है कि प्रकृति का अपना स्वभाव है और उसके साथ संघर्ष नहीं, सहयोग करना होगा।

आज जब महासागर संकट में हैं, तो इस प्राचीन ज्ञान को केवल पुस्तकों में बंद रखना उचित नहीं। नारली पूर्णिमा पर नारियल अर्पित करने वाले मछुआरे, कडलम्मा की पूजा करने वाले केरलवासी, बोइता बंदाना मनाने वाले उड़ीसावासी, ये सभी अनजाने में एक ऐसी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं जो कहती है कि समुद्र हमारा है, हम समुद्र के हैं, इसलिए उसकी रक्षा करना हमारा पहला कर्तव्य है।