भारत की आत्मा है गंगा

भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक चेतना में गंगा केवल एक नदी नहीं है बल्कि वह इस देश की प्राणवायु और जनमानस की सामूहिक चेतना का आधार है। आदिकाल से ही लोक जीवन में गंगा का महत्व इतना गहरा रहा है कि भारतीय समाज ने इसे मां का संबोधन देकर अपने परिवार के सबसे सम्मानित सदस्य के रूप में प्रतिष्ठित किया है। गंगा का उद्गम हिमालय की ऊंचाइयों में गंगोत्री ग्लेशियर से होता है और वहां से लेकर गंगासागर के मिलन तक यह नदी लगभग ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा तय करती है। इस लंबी यात्रा में गंगा केवल जल का प्रवाह नहीं करती बल्कि वह अपने किनारों पर सभ्यताओं का विकास करती है और करोड़ों लोगों के विश्वास को सींचती है।
भारतीय पौराणिक संदर्भों में गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक है। राजा भगीरथ की कठोर तपस्या के फलस्वरूप गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर आना इस बात का प्रतीक है कि दृढ़ संकल्प से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। भगवान शिव द्वारा गंगा के वेग को अपनी जटाओं में थामना प्रकृति और पुरुष के बीच के संतुलन को दर्शाता है। लोक जीवन में इस संदर्भ का अर्थ यह है कि गंगा का प्रवाह केवल भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार है जो मनुष्य के भीतर के विकारों को धोने की क्षमता रखता है।
ऐतिहासिक और तथ्यात्मक दृष्टि से देखा जाए तो गंगा का मैदान दुनिया के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है। प्राचीन काल से ही पाटलिपुत्र काशी प्रयाग और कन्नौज जैसे बड़े साम्राज्य और सांस्कृतिक केंद्र गंगा के तटों पर ही विकसित हुए। इसका कारण गंगा का वह निरंतर प्रवाह है जिसने कृषि को आधार प्रदान किया और व्यापार के मार्ग खोले। लोक जीवन में गंगा के किनारे बसे गांवों और शहरों की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति है जिसे गंगा जमुनी तहजीब के रूप में पहचाना जाता है।
गंगा के जल की शुद्धता के पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी मौजूद हैं जिसमें शोधकर्ताओं ने पाया है कि इसमें विशेष प्रकार के बैक्टीरियोफेज वायरस होते हैं जो हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। यही कारण है कि सदियों से लोक मान्यता रही है कि गंगा का जल कभी खराब नहीं होता। लोग इस जल को तांबे के पात्रों में वर्षों तक सहेज कर रखते हैं और शुभ कार्यों में इसका उपयोग करते हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य और लोक विश्वास का एक ऐसा अद्भुत संगम है जो गंगा को संसार की अन्य नदियों से भिन्न बनाता है।
यदि गंगा होने के अर्थ को समझें तो यह हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफर की साक्षी है। एक शिशु के जन्म के बाद उसके शुद्धिकरण के लिए गंगाजल की बूंदों का उपयोग होता है तो वहीं जीवन की अंतिम यात्रा में भी गंगा की गोद में विलीन होने की कामना की जाती है। काशी के मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताएं और हर की पौड़ी पर होने वाली संध्या आरती जीवन और मृत्यु के उसी शाश्वत सत्य को दर्शाती हैं जिसे गंगा अपने प्रवाह में समेटे हुए है। लोक गीतों में गंगा का वर्णन विरह मिलन और भक्ति के विभिन्न रंगों में मिलता है।
भोजपुरी और मैथिली लोकगीतों में गंगा मैया से सुख शांति की मन्नतें मांगी जाती हैं। छठ पूजा जैसे महापर्व में गंगा के तट पर लाखों श्रद्धालुओं का उमड़ना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आधुनिकता के दौर में भी लोक आस्था की जड़े गंगा से ही पोषण प्राप्त कर रही हैं। यह नदी केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं बल्कि उन तमाम समुदायों के लिए भी पूजनीय है जो इसके किनारों पर अपनी आजीविका ढूंढते हैं। नाविकों मछुआरों और किसानों के लिए गंगा साक्षात अन्नपूर्णा है।
गंगा के महत्व का एक अन्य पहलू इसकी आर्थिक और पर्यावरणीय भूमिका है। उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर गंगा पर निर्भर है। सिंचाई की नहरों के माध्यम से गंगा ने भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे क्षेत्रों में गंगा का स्वच्छ और शीतल जल पर्यटन और आध्यात्मिक शांति का केंद्र है। लोक जीवन में कुंभ मेले का आयोजन गंगा के महत्व को वैश्विक स्तर पर स्थापित करता है। करोड़ों लोगों का बिना किसी निमंत्रण के एक स्थान पर एकत्रित होना केवल श्रद्धा के वशीभूत होकर ही संभव है। यह मेला मानवीय एकता और सामूहिक विश्वास का सबसे बड़ा उदाहरण है जहाँ गंगा के जल में एक डुबकी लगाने मात्र से लोग स्वयं को धन्य मानते हैं। यह विश्वास ही गंगा को लोक जीवन की धड़कन बनाता है।
किंतु वर्तमान समय में गंगा के साथ मानवीय व्यवहार चिंता का विषय भी है। जिस नदी को हमने मां का दर्जा दिया उसे हमने औद्योगिक कचरे और प्रदूषण के बोझ तले दबा दिया है। यह एक विरोधाभास है कि हम गंगा की पूजा भी करते हैं और उसे प्रदूषित करने में संकोच भी नहीं करते। लोक जीवन में इस संकट के प्रति जागरूकता का अभाव गंगा के अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। सरकार द्वारा नमामि गंगे जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन जब तक जनभागीदारी और लोक चेतना में बदलाव नहीं आएगा तब तक गंगा की अविरलता और निर्मलता को बनाए रखना कठिन होगा। मानवीय संवेदना का यह तकाजा है कि हम गंगा को केवल दोहन की वस्तु न मानकर उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखें। गंगा का सूखना या प्रदूषित होना केवल एक नदी का अंत नहीं होगा बल्कि वह उस पूरी संस्कृति और लोक परंपरा का अंत होगा जिसने हमें हजारों वर्षों से पाल पोस कर बड़ा किया है।
साहित्य और कला के क्षेत्र में भी गंगा ने कवियों और लेखकों को सदैव प्रेरित किया है। पंडित जगन्नाथ की गंगा लहरी से लेकर आधुनिक काल के कवियों तक सभी ने गंगा के सौंदर्य और उसकी शक्ति का गुणगान किया है। गंगा का प्रवाह हमें सिखाता है कि बाधाएं कितनी भी बड़ी क्यों न हों निरंतर चलते रहना ही जीवन है। पहाड़ की चट्टानों को काटकर अपना रास्ता बनाने वाली गंगा संघर्ष की प्रतीक है। मैदानों में आकर शांत और गंभीर हो जाने वाली गंगा परिपक्वता की प्रतीक है। अंत में समुद्र में मिल जाने वाली गंगा पूर्णता की प्रतीक है। लोक जीवन में ये जीवन दर्शन रचे बसे हैं। ग्रामीण अंचलों में आज भी बुजुर्ग गंगा की सौगंध खाकर सत्य की पुष्टि करते हैं जो यह दर्शाता है कि कानून की किताबों से ऊपर लोक न्याय में गंगा की अदालत सर्वोच्च है।
गंगा के किनारे होने वाली खेती वहां के मेलों की रौनक घाटों पर सुनाई देने वाले शंखनाद और सुबह की पहली किरण के साथ गंगा में अर्घ्य देते श्रद्धालु भारत की वह तस्वीर पेश करते हैं जो शाश्वत है। गंगा केवल उत्तर भारत की भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं है बल्कि दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर तक हर भारतीय के मन में गंगा के प्रति एक पवित्र स्थान है। कावेरी को दक्षिण की गंगा कहना इस बात का प्रमाण है कि गंगा शब्द अब शुचिता और महानता का पर्यायवाची बन चुका है। लोक जीवन में गंगा का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती है। शहरों की आपाधापी में जब मनुष्य स्वयं को खोया हुआ पाता है तो गंगा के शांत किनारे उसे पुनः स्वयं से साक्षात्कार कराते हैं।
गंगा भारत की आत्मा है। इसकी लहरों में भारत का इतिहास भूगोल दर्शन और भविष्य सब कुछ समाहित है। लोक जीवन में गंगा का महत्व शब्दों की परिधि से परे है क्योंकि यह एक अनुभूत सत्य है। हमें यह समझना होगा कि गंगा का संरक्षण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं है बल्कि वह हमारी अपनी पहचान और विरासत को बचाने का संकल्प है। गंगा की धारा यूं ही बहती रहे और मानवीय चेतना को आलोकित करती रहे यही मानवता के हित में है। जब तक हिमालय खड़ा है और जब तक इस देश की मिट्टी में श्रद्धा का अंश जीवित है तब तक गंगा का लोक जीवन में स्थान अक्षय और अटल रहेगा। गंगा का जल केवल प्यास नहीं बुझाता बल्कि वह आत्मा को तृप्त करता है और हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है। इस अंतर्राष्ट्रीय युग में भी गंगा की प्रासंगिकता रत्ती भर कम नहीं हुई है बल्कि इसकी आवश्यकता और बढ़ गई है ताकि हम अपनी सभ्यता के मूल मंत्रों को याद रख सकें। गंगा के प्रति हमारा समर्पण ही हमारी संस्कृति की जीवंतता का आधार है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

