वेदों और पुराणों में प्रकृति संरक्षण की अवधारणा : जैव विविधता दिवस विशेष

मनुष्य और प्रकृति का सम्बन्ध उतना ही पुराना है जितना स्वयं सृष्टि। जब मानव सभ्यता शैशवावस्था में थी, तब भी हमारे पूर्वज यह जानते थे कि पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश केवल भोग की वस्तुएँ नहीं हैं बल्कि ये समस्त जीवन के आधार हैं। भारतीय वैदिक परम्परा में प्रकृति को माता के रूप में सम्मान दिया गया है और उसके संरक्षण को एक पवित्र दायित्व माना गया है। आज जब हम पर्यावरण संकट की बात करते हैं तो यह जानकर आश्चर्य होता है कि सहस्रों वर्ष पूर्व हमारे ऋषियों ने उन्हीं सिद्धान्तों को वेद मन्त्रों और पुराण कथाओं में संजो कर रखा था जिनकी आज विज्ञान भी पुष्टि करता है।
वेद केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं हैं। ये मानव जीवन का एक सम्पूर्ण दर्शन हैं जिसमें ब्रह्माण्ड से लेकर एक छोटे से कीट तक सबके प्रति करुणा और सद्भावना का भाव निहित है। पुराण उसी ज्ञान को कथाओं के माध्यम से जन सामान्य तक पहुँचाने का माध्यम रहे हैं। इस आलेख में हम उन्हीं उद्धरणों और उनके निहितार्थों पर विचार करेंगे जो यह सिद्ध करते हैं कि प्रकृति संरक्षण की अवधारणा भारतीय चिन्तन का अभिन्न अंग रही है।
पृथ्वी: माता और देवी
अथर्ववेद के भूमि सूक्त को पर्यावरण चेतना का सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ दस्तावेज़ कहा जा सकता है। इस सूक्त में ऋषि अथर्वा पृथ्वी को माँ कहकर सम्बोधित करते हैं और उनसे क्षमाप्रार्थना करते हैं कि मनुष्य के कदमों की चोट उन्हें कष्ट न दे। यह भावना ही प्रकृति संरक्षण का आधार है।
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।
अर्थात पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। (अथर्ववेद, 12.1.12)
इस एक वाक्य में पारिस्थितिकी का सम्पूर्ण दर्शन समाया हुआ है। जब आप किसी को माता मानते हैं तो उसके साथ शोषण का सम्बन्ध नहीं रहता, उसके प्रति दायित्व और कृतज्ञता का भाव जागता है। पृथ्वी को माँ कहना इस बात का प्रतीक है कि हम उससे जीवन पाते हैं, उसकी गोद में पलते हैं और अन्ततः उसी में समाहित हो जाते हैं।
उसी भूमि सूक्त में आगे ऋषि कहते हैं कि जब मैं पृथ्वी को खोदता हूँ, जब मैं उसकी छाती पर चलता हूँ, तब हे माता मुझे क्षमा करो। यह भावना आज के उस विनाशकारी दृष्टिकोण से सर्वथा भिन्न है जिसमें प्रकृति को एक निर्जीव संसाधन के रूप में देखा जाता है।
यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु।
अर्थात हे पृथ्वी, जहाँ मैं खुदाई करूँ वह स्थान शीघ्र ही फिर से हरा-भरा हो जाए। (अथर्ववेद, 12.1.35)
यह उद्धरण पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन का सबसे प्रारम्भिक उदाहरण है। ऋषि केवल पृथ्वी से लेना नहीं चाहते, वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जो लिया जाए वह लौटाया भी जाए। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान में इसे Sustainable Use या Regenerative Ecology कहते हैं।
जल: जीवन का आधार और देवता
ऋग्वेद में जल को आपः कहकर देवता के रूप में सम्मान दिया गया है। जल सूक्त में कहा गया है कि जल में औषधि है, जल में अमृत है, जल में अग्नि है और जल में ही सम्पूर्ण जीवन का आधार है। नदियों को माता माना गया और उनके प्रदूषण को सबसे बड़ा पाप।
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे।
अर्थात हे जल देव, आप सुखदायक हैं। आप हमें ऊर्जा और महान आनन्द के लिए दर्शन दें। (ऋग्वेद, 10.9.1)
यजुर्वेद में जल संरक्षण के सन्दर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण मन्त्र आता है जिसमें जलाशयों की पवित्रता बनाए रखने की प्रार्थना की गई है। यह उस समय की पर्यावरण नीति थी जब राजा से लेकर सामान्य नागरिक तक सभी जल स्रोतों की शुद्धता के प्रति सजग रहते थे।
शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः।
अर्थात देवियाँ जल हमारे पीने के लिए कल्याणकारी हों। ये जल हमारे लिए सुखप्रद होकर बहें। (ऋग्वेद, 10.9.4)
पुराणों में भी जल का अत्यन्त विस्तृत वर्णन है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति नदी, तालाब या कुएँ को दूषित करता है वह समाज का शत्रु है और उसे गम्भीर दण्ड का भागी होना चाहिए। मनुस्मृति में भी जल स्रोतों के समीप अशुद्ध वस्तुएँ फेंकने पर प्रतिबन्ध लगाया गया था।
वन और वृक्ष: देवताओं का निवास
वैदिक साहित्य में वृक्षों को महज पेड़ नहीं, देवताओं का निवास माना गया है। अरण्यानी सूक्त ऋग्वेद का एक अनूठा रचना है जिसमें वन देवी की स्तुति की गई है। यह सूक्त प्रकृति के प्रति उस सूक्ष्म संवेदनशीलता को दर्शाता है जो आधुनिक समाज में दुर्लभ होती जा रही है।
अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि। कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दति।
अर्थात हे वन देवी, तुम दूर तक फैली हो, तुम गाँव की परवाह नहीं करतीं, तुम भय को नहीं जानतीं। (ऋग्वेद, 10.146.1)
अथर्ववेद के वनस्पति सूक्त में वृक्षों को औषधि का स्रोत और जीवन का आधार बताया गया है। ऋषि वनस्पतियों से प्रार्थना करते हैं कि वे मनुष्यों की रक्षा करें और बदले में यह वचन देते हैं कि मनुष्य भी उनकी रक्षा करेगा। यह एक प्रकार का पारस्परिक वचन है जो आज की पर्यावरण सन्धियों से बहुत पहले दिया गया था।
वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम।
अर्थात हे वनस्पति, तुम सैकड़ों शाखाओं से बढ़ो, हम भी सहस्रों शाखाओं की तरह विकसित हों। (अथर्ववेद, 3.6.1)
पद्म पुराण में एक वृक्ष का मूल्य दस पुत्रों के बराबर बताया गया है। यह उद्धरण समाज में वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने की एक नीति थी जिसे धार्मिक महत्त्व देकर जन सामान्य में प्रचारित किया गया।
दशकूपसमा वापी दशवापीसमो हृदः। दशहृदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः।
अर्थ: दस कुओं के बराबर एक बावड़ी है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब है, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है। (पद्म पुराण, 60.16)
यह श्लोक पर्यावरण के प्रति भारतीय दृष्टिकोण का सारांश है। वृक्षों का मूल्य इतना ऊँचा आँका गया कि उन्हें पुत्र से भी अधिक मानवीय जीवन के लिए उपयोगी बताया गया। इस श्लोक को सुनकर कोई भी व्यक्ति वृक्ष काटने से पहले सौ बार सोचता था।
वायु और आकाश: प्राण और परमात्मा
ऋग्वेद में वायु को प्राण तत्त्व के रूप में देखा गया है। वायु देव न केवल श्वास का स्रोत हैं बल्कि वे समस्त जीवन की चेतना के वाहक भी हैं। इसीलिए वायु प्रदूषण को आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यन्त निन्दनीय माना गया।
वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे। प्र ण आयूंषि तारिषत्।
अर्थात हे वायु देव, हमारे हृदय के लिए औषधि लेकर आओ, हमारे जीवन को दीर्घ करो। (ऋग्वेद, 10.186.1)
यजुर्वेद में पञ्चमहाभूतों की शुद्धता के लिए एक विस्तृत याज्ञिक विधि का वर्णन है। यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, वह वायु शुद्धि का एक वैज्ञानिक प्रयोग भी था। हवन में प्रयुक्त आम, पीपल, बरगद और औषधीय जड़ी-बूटियों का धुआँ वायुमण्डल को शुद्ध करता था और वातावरण में उपस्थित रोगाणुओं को नष्ट करता था।
अग्नि और ऊर्जा: संतुलन का सिद्धान्त
वैदिक दर्शन में अग्नि तत्त्व को सृजन और विनाश दोनों का प्रतीक माना गया है। अग्नि देव की स्तुति में यह भाव निहित है कि ऊर्जा का उपयोग विवेकपूर्वक हो। जो अग्नि खाना पकाती है, रोशनी देती है और ठण्ड से बचाती है, वही अग्नि जब अनियन्त्रित होती है तो वनों को भस्म कर देती है।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
अर्थात हे अग्नि देव, हमें सही मार्ग पर ले चलो, हमारे सभी पाप और कुकर्म को जानते हुए भी हमें सम्पन्नता की ओर ले जाओ। (ऋग्वेद, 1.189.1)
यह प्रार्थना इस बात का प्रमाण है कि वैदिक ऋषि जानते थे कि मनुष्य गलतियाँ करता है, प्रकृति का दोहन करता है। इसीलिए वे देवताओं से यह प्रार्थना करते थे कि उन्हें सद्बुद्धि मिले और वे प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलें।
पुराणों में पर्यावरण नीति : विष्णु पुराण में सृष्टि का सन्तुलन
विष्णु पुराण में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पृथ्वी के संसाधन असीमित नहीं हैं और यदि मनुष्य लालच में आकर प्रकृति का अत्यधिक दोहन करे तो पृथ्वी अपना सन्तुलन खो देगी। कल्कि अवतार की कथा में यह वर्णन मिलता है कि जब वनों का विनाश होगा, नदियाँ सूख जाएँगी और वायु विषाक्त होगी तब संसार के पुनर्निर्माण की आवश्यकता होगी। यह वर्णन आज के पर्यावरण संकट की भविष्यवाणी जैसा प्रतीत होता है।
शिव पुराण और पशुओं की रक्षा
शिव पुराण में पशुपति के रूप में शिव का वर्णन है। पशुपति अर्थात समस्त जीव-जन्तुओं के स्वामी। इस अवधारणा का निहितार्थ यह है कि शिव केवल मनुष्यों के नहीं, समस्त प्राणियों के रक्षक हैं। शिव के गले में लिपटे नाग से लेकर उनके वाहन नन्दी तक, उनके परिवेश में उपस्थित प्रत्येक प्राणी यह सन्देश देता है कि हर जीव मूल्यवान है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।
अर्थात सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी का कल्याण हो, कोई भी दुःखी न हो। (बृहदारण्यक उपनिषद)
यहाँ ‘सर्वे’ का अर्थ केवल मनुष्य नहीं है। इसमें समस्त जीव-सृष्टि सम्मिलित है। यही वैदिक पर्यावरण दर्शन का केन्द्र बिन्दु है।
स्कन्द पुराण और वन संरक्षण
स्कन्द पुराण में वन देवताओं की पूजा का विस्तृत विधान मिलता है। यह परम्परा थी कि किसी वन में जाने से पहले वन देवता से अनुमति माँगी जाए और जितने वृक्ष काटे जाएँ उससे अधिक वृक्ष लगाए जाएँ। राजाओं के लिए यह नियम था कि वे अपने राज्य का एक बड़ा भूभाग वनों के लिए आरक्षित रखें जहाँ शिकार और वृक्षों की कटाई वर्जित हो।
पंचतत्त्व और पर्यावरण संतुलन
वैदिक दर्शन में पञ्चमहाभूत अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को सृष्टि का आधार माना गया है। मानव शरीर भी इन्हीं पाँच तत्त्वों से निर्मित है और मृत्यु के पश्चात उन्हीं में विलीन हो जाता है। इस अवधारणा का गहरा पारिस्थितिक अर्थ है।
जब मनुष्य यह स्वीकार करता है कि वह स्वयं प्रकृति का ही एक अंश है तो वह उसे नष्ट करने की सोच भी नहीं सकता। यह उसी प्रकार है जैसे कोई व्यक्ति अपना हाथ खुद नहीं काटता। ईशावास्य उपनिषद में इसी भावना को अत्यन्त सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया है।
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
अर्थात इस जगत में जो कुछ भी है वह सब ईश्वर से व्याप्त है। उसे त्याग भावना से भोगो, लालच मत करो, यह धन किसका है। (ईशावास्य उपनिषद, मन्त्र 1)
यह मन्त्र पर्यावरण नैतिकता का सार है। प्रकृति के सभी संसाधन हमें ईश्वर ने दिए हैं और हमें उन्हें सयंम और त्याग के साथ उपयोग करना है। आवश्यकता से अधिक लेना पाप है, यही वैदिक पर्यावरण नीति का मूल है।
कृषि और भूमि संरक्षण
ऋग्वेद के कृषि सूक्त में कृषक को पृथ्वी माँ का पुजारी बताया गया है। खेती केवल आजीविका का साधन नहीं थी, वह एक पवित्र कर्म था। बीज बोने से लेकर फसल काटने तक प्रत्येक चरण में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती थी।
शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम्। शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय।
अर्थात हल और बैल का यह कार्य शुभ हो, किसान का यह प्रयास सफल हो, खेत जोतने का यह कार्य कल्याणकारी हो। (ऋग्वेद, 4.57.4)
इसी प्रकार अथर्ववेद में भूमि को खोदने से पहले उससे क्षमा माँगने की प्रार्थना है। यह भावना किसान को यह याद दिलाती थी कि वह पृथ्वी माँ की छाती पर हल चला रहा है और उसे यह नहीं भूलना चाहिए। इसी भाव के कारण पारम्परिक भारतीय कृषि में भूमि की उर्वरता बनाए रखने की अनेक पद्धतियाँ विकसित हुईं।
जीव दया: प्रत्येक प्राणी में परमात्मा
वैदिक दर्शन में अहिंसा का सिद्धान्त केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं था। यजुर्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि हम पशुओं, पक्षियों और वनस्पतियों को बिना आवश्यकता के कष्ट न दें। यह सिद्धान्त आधुनिक Animal Rights आन्दोलन से बहुत पहले का है।
मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि।
अर्थात किसी भी प्राणी को कष्ट मत दो। (यजुर्वेद, 12.32)
भागवत पुराण में ऋषि शुक देव यह कहते हैं कि जो व्यक्ति अन्य प्राणियों के दुःख में आनन्द लेता है या उनके प्रति क्रूरता करता है, वह मनुष्य के रूप में पशु ही है। यह उद्धरण उस समय की जैव नैतिकता को प्रतिबिम्बित करता है जब जीव दया को सर्वोच्च धर्म माना जाता था।
समकालीन प्रासंगिकता
आज जब ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई, नदियों का प्रदूषण और जैव विविधता का ह्रास विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियाँ बन चुकी हैं, तब वेदों और पुराणों की ये शिक्षाएँ अत्यन्त प्रासंगिक हो उठती हैं। वैदिक ऋषियों ने जो बात हजारों साल पहले कही थी उसे आज की वैज्ञानिक भाषा में Ecological Balance, Sustainable Development और Biodiversity Conservation कहते हैं।
अन्तर केवल यह है कि तब यह ज्ञान जीवन के प्रत्येक पहलू में व्याप्त था। प्रातःकाल जल में पैर रखने से पहले पृथ्वी माँ से क्षमा माँगना, वृक्षों को काटने से पहले अनुमति लेना, नदियों में कूड़ा न फेंकना, ये सब दैनिक जीवन के अंग थे जिन्हें धार्मिक रूप देकर पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित किया गया था।
आज की पीढ़ी को इन ग्रन्थों से केवल धार्मिक नहीं बल्कि पर्यावरण वैज्ञानिक दृष्टि से भी पढ़ने की आवश्यकता है। जब हम यह समझेंगे कि माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः कहने वाले ऋषि केवल काव्य नहीं रच रहे थे, वे एक जीवन दर्शन प्रस्तुत कर रहे थे, तब शायद हम उस मार्ग पर चल सकेंगे जो इस संकटग्रस्त पृथ्वी को बचा सके।
वेदों और पुराणों में प्रकृति संरक्षण की अवधारणा केवल पर्यावरणीय नियमों का संकलन नहीं है। यह एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन है जिसमें मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका अभिन्न अंग है। पृथ्वी माता है, नदियाँ बहनें हैं, वृक्ष मित्र हैं और वायु प्राण है। इन सबकी रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा धर्म है।
जब हम इन ग्रन्थों अध्ययन करते हैं तो यह अनुभव होता है कि भारतीय परम्परा में पर्यावरण चेतना एक आरोपित विचार नहीं थी, वह स्वाभाविक थी, सहज थी और दैनिक जीवन में प्रवाहित होती थी। आवश्यकता है कि हम उस चेतना को पुनः जागृत करें और वेदों के उस सन्देश को व्यवहार में उतारें जो कहता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही सच्चा जीवन है और उससे विद्रोह ही सबसे बड़ा अधर्म है।
“यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्”
जहाँ समस्त विश्व एक घोंसला बने।
आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

