जनेऊ से नथ तक: परीक्षा केंद्रों में दोहरे मानदंड क्यों ?

प्रतियोगी परीक्षा केन्द्रों पर कड़ाई के नाम पर हिन्दू मान बिंदूओं और धार्मिक प्रतीकों के साथ आस्था से खिलवाड़ कई वर्षों से चल रहा है। प्रवेश से पहले द्वार पर कलावा, जनेऊ, नथ, मंगलसूत्र जैसे हिन्दू धर्म के प्रतीक चिन्हों को उतरवाना किसी प्रताड़ना से कम नहीं है। कर्नाटक कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) परीक्षा के दौरान चिक्कमगलूर के एमईएस (MES) कॉलेज में परीक्षा कर्मचारियों द्वारा ‘गहने न पहनने’ के नियम को सख्ती से लागू करते हुए हिंदू छात्राओं के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार की घटना सामने आई है।
परीक्षा केंद्र पर छात्राओं की पारंपरिक को हटाने के लिए कहा गया। नथुनी न उतार पाने की स्थिति में, परीक्षा कर्मचारियों ने छात्राओं की नाक पर, नथुनी के ऊपर सीधे एडहेसिव टेप चिपका दिया। छात्राओं का आरोप है कि उन्हें या तो नथुनी उतारने को कहा गया या टेप लगाने को, जिससे उन्हें परीक्षा के दौरान भारी मानसिक तनाव और अपमान का सामना करना पड़ा। प्रश्न यह उठता है कि क्या नथ, जनेऊ, कलावा का प्रयोग नकल करने में हो सकता है?
सोचिए कि परीक्षा केंद्र की द्वार पर खड़ा एक युवा छात्र, जिसने वर्षों की मेहनत के बाद इस दिन का इंतज़ार किया था, अचानक एक ऐसी दुविधा में फंस जाता है जो उसके माता-पिता ने कभी सोची भी नहीं थी। परीक्षा अधिकारी उससे कहते हैं कि अगर परीक्षा देनी है तो पहले जनेऊ उतारो। यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं है। यह अप्रैल 2026 के कर्नाटक का वास्तविक सच है जो देश की शिक्षा व्यवस्था और धर्मनिरपेक्षता के दावों पर एक गहरा सवाल उठाता है।
बेंगलुरु के मडिवाला स्थित कृपानिधि कॉलेज कर्नाटक कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) के दौरान पांच ब्राह्मण छात्रों के जनेऊ उतरवाने का मामला सामने आया। छात्रों ने आरोप लगाया कि परीक्षा कक्ष के निरीक्षकों ने उनसे साफ कहा कि यदि परीक्षा देनी है तो जनेऊ उतारना होगा, अन्यथा परीक्षा कक्ष में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
चिक्कमगलूरु के एमईएस कॉलेज परीक्षा केंद्र में कई छात्राओं को तलाशी के दौरान रोका गया क्योंकि परीक्षा हॉल में धातु के आभूषण ले जाने की अनुमति नहीं थी। छात्राओं से नथ और कान की बालियां उतरवाने के लिए कहा गया। नथ यानी मुगुती, जो कर्नाटक और दक्षिण भारत की हिंदू परंपरा में एक स्त्री की पहचान, सुहाग और आस्था का प्रतीक है। उसे जबरन उतरवाना केवल एक गहना उतारने जैसा नहीं था, सीधा सीधा आस्था पर आघात था।
जहां छात्राएं नथ नहीं हटा पा रही थीं, वहां परीक्षा स्टाफ ने उस पर सीधे एडहेसिव टेप चिपका दिया और उन्हें अंदर जाने दिया। एक किशोरी की नाक पर जबरन टेप चिपकाना उसकी देह की स्वायत्तता का उल्लंघन है। जिस नथ को उसकी माँ ने वर्षों पहले प्रेम से पहनाया था, परीक्षा केंद्र के एक अधिकारी ने उस पर टेप चिपका दिया। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील नागरिक को भीतर से हिला देने वाला है।
हिंदू धर्म में जनेऊ संस्कार का विशेष महत्व है। इसे 16 संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार माना जाता है। यह पवित्र धागा ज्ञान, अनुशासन और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद इसे शरीर से अलग नहीं किया जाता, क्योंकि यह व्यक्ति का अभिन्न अंग बन जाता है। इसे अशुद्ध होने या खंडित होने के बाद ही बदला जाता है, न कि अपनी इच्छा से उतारा जाता है।
ऐसा नहीं है कि यह घटनाएं पहली बार हुई हों, पिछले साल भी इसी तरह का विवाद सामने आया था, जब एक छात्र का जनेऊ कैंची से काट दिया गया था और परिवार का आरोप था कि उसे कूड़ेदान में फेंक दिया गया। छात्र को यह तक कहा गया था कि अगर परीक्षा देनी है तो जनेऊ हटाना ही होगा। यानी एक पवित्र धार्मिक वस्तु को कूड़ेदान में फेंका गया। इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है?
इस विवाद के बाद कर्नाटक सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सीईटी परीक्षा के दौरान छात्रों को जनेऊ उतारने के लिए नहीं कहा जाएगा। हालांकि उसके बावजूद 2026 में भी छात्रों को इसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा। सरकार ने आदेश दिया, फिर भी वही हुआ। यह प्रशासनिक लापरवाही है या सोची-समझी नीति, यह प्रश्न जनता के मन में उठना स्वाभाविक है।
बेंगलुरु के उस परीक्षा केंद्र में, जहां 17 अप्रैल को गणित की परीक्षा थी, छात्र सुचिव्रत कुलकर्णी को करीब 45 मिनट तक अधिकारियों से गुहार लगानी पड़ी, लेकिन अंत में उन्हें बिना परीक्षा दिए ही घर लौटना पड़ा क्योंकि उन्होंने जनेऊ हटाने से इनकार कर दिया था। एक बच्चे का एक वर्ष बर्बाद हो गया, उसके माता-पिता की उम्मीदें चूर हो गईं, केवल इसलिए कि उसने अपनी आस्था से समझौता करने से मना कर दिया। इस बच्चे का अपराध क्या था?
यहाँ दोहरा मापदंड स्पष्ट दिखाई देता है, जो असहज करने वाला है। NEET 2026 की परीक्षा में अभ्यर्थियों को हिजाब या बुर्का पहनकर परीक्षा देने की अनुमति है। ऐसे अभ्यर्थियों को आवेदन पत्र भरते समय “Customary Dress” विकल्प चुनना होता है और वे सामान्य समय से एक घंटे पहले परीक्षा केंद्र पर पहुंचकर जांच करवाते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि जब यह उदारता एक समुदाय को मिलती है तो दूसरे समुदाय के साथ वैसा ही व्यवहार क्यों नहीं किया जाता? जनेऊ धातु का नहीं, सूत के धागे का बना होता है। वह न तो नकल के किसी उपकरण को छिपा सकता है और न ही किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को। फिर उसे उतरवाने की हठधर्मिता किस तर्क पर टिकी है?
2022 का हिजाब विवाद को देखें तो उस समय हिजाब के समर्थन में भारत में कई संगठन खड़े दिखाई दिए, हिजाब को आस्था और धार्मिक पहचान बताते हुए संवैधानिक स्वतंत्रता की दुहाई देने लगे। जबकि 2022 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश में सभी छात्रों को किसी भी धार्मिक वेशभूषा में आने से रोका था। यह आदेश सभी स्कूलों और कॉलेजों में लागू किया गया और छात्रों से हिजाब और बुर्का बाहर उतरवाए गए। तब भी यही प्रश्न उठा था कि क्या यह नियम सबके लिए समान रूप से लागू हो रहा है?
घटना के राजनीतिक रंग लेने के बाद कृपानिधि कॉलेज ने संबंधित निरीक्षक को जांच लंबित रहने तक निलंबित कर दिया। सरकार ने गहन जांच के आदेश दिए और पुलिस ने तीन कर्मचारियों को हिरासत में लिया। निलंबन हुआ, जांच के आदेश दिए गए। लेकिन जिस बच्चे का जनेऊ कूड़ेदान में फेंका गया, जिस छात्रा की नाक पर टेप चिपकाया गया, जिस युवा को बिना परीक्षा दिए घर लौटना पड़ा, उनकी क्षतिपूर्ति क्या है? क्या एक निलंबन से वह पीड़ा मिट जाती है?
भारत का संविधान अनुच्छेद 14 में समानता का अधिकार और अनुच्छेद 25 में धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। ये अधिकार किसी एक समुदाय के लिए नहीं, सबके लिए हैं। जब नियम बनाए जाएं तो वे सबपर समान रूप से लागू हों। यदि बुर्के या हिजाब में परीक्षा देने की व्यवस्था है, तो जनेऊ और नथ के लिए भी समान व्यवस्था होनी चाहिए। और यदि सख्ती करनी ही है, तो वह भी सबके लिए समान रूप से हो।
जो बात अस्वीकार्य है वह यह है कि एक की आस्था को सुविधा और दूसरे की आस्था को बाधा माना जाए। एक की धार्मिक पहचान को सम्मान और दूसरे की को अपमान दिया जाए। एक को “कस्टमरी ड्रेस” का अधिकार और दूसरे को “धर्म या भविष्य में से एक चुनो” का असहज विकल्प दिया जाए।
एक परीक्षा केंद्र किसी छात्र के लिए उसके सपनों का दरवाजा होता है। वह वहां अपना सर्वश्रेष्ठ देने जाता है। उस दरवाजे पर उससे उसकी आस्था छीनना, उसकी नाक पर टेप चिपकाना, उसके पवित्र धागे को कूड़ेदान में फेंकना, ये सब केवल प्रशासनिक त्रुटियां नहीं हैं नैतिक विफलता के चिह्न हैं।
आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
