ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण की आधारशिला पुस्तकें

मानव सभ्यता के विकास में पुस्तकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। ज्ञान, अनुभव, संस्कृति और विचारों का सबसे विश्वसनीय माध्यम पुस्तकें ही रही हैं। समय, समाज और परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, किंतु पुस्तकों में संचित ज्ञान सदैव मानवता का मार्गदर्शन करता है। यही कारण है कि कहा जाता है कि पुस्तकें मनुष्य की सच्ची और स्थायी मित्र होती हैं, जो जीवन के प्रत्येक चरण में दिशा प्रदान करती हैं।
एक संस्कृत सुक्ति है –विद्या मित्रं प्रवासेषु, अर्थात विद्या (ज्ञान) विदेश या विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य की सच्ची मित्र होती है। यह ज्ञान और विद्या पुस्तकों एवं उपनिषद से प्राप्त होती है। श्रेष्ठ विचारों और ज्ञान के बिना मस्तिष्क भी विकसित नहीं होता। विश्व भर के साहित्य, ग्रन्थ, सभी पुस्तकों के रूप में ही पढ़े जाते हैं। देश-विदेश की ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विभिन्न क्षेत्रों तथा विषयों से संबंधित समस्त जानकारी हमें लिखित रूप में पुस्तकों से ही प्राप्त होती है। पुस्तकें ही सर्वसुलभ माध्यम हैं, जिससे भूतकाल के विविध विषयों की जानकारी से लेकर वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं तक का ज्ञान प्राप्त होता है।
आत्मनिर्माण व राष्ट्रनिर्माण में पुस्तकें, साहित्य अथवा धर्मग्रंथों ने सदैव ही मार्गदर्शन किया है। श्रेष्ठ पुस्तकें मनुष्य और समाज को उन्नति के मार्ग पर ले जाती हैं। प्रत्येक युग में अनेक कवि, साहित्यकार और लेखकों ने तत्कालीन परिस्थितियों से लेकर मानव जीवन की यथार्थता को अपने लेखन से अवगत कराया है। प्रकृति का कोई भी क्षेत्र कवि अथवा लेखक की पैनी दृष्टि से बच नहीं पाया। कहा भी गया है—‘जहां न जाए रवि, वहाँ जाए कवि’। आशय यह है कि सभी प्रकार का ज्ञान इन्हीं के द्वारा पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में संग्रहित रूप में उपलब्ध होता है।
भारत वर्ष में महान ऋषि-मुनियों द्वारा वैदिक काल से ही वेद-पुराणों की रचना की गई। अतीत के पन्नों में झांकने से हमें लेखन की परंपरा का पता चलता है। भोजपत्रों पर ग्रन्थ लिखे गए, बाद में पुस्तकें लिखी गईं। राजा-महाराजाओं ने अपने काल में अपने राज्य की विशिष्टता, कार्यों, नीतियों एवं उपलब्धियों की जानकारी शिलालेखों, ताम्रपत्रों, स्तंभों और दीवारों पर किसी न किसी लिपि में अंकित कराई, जिनके साक्ष्य आज भी उपलब्ध हैं।
अर्थात लिखित रूप में जो है, उसे बार-बार पढ़ा जा सकता है, जो सत्य और प्रामाणिक बना रहता है। पुस्तकों में लिखे गए विचारों, भावनाओं एवं कल्पनाओं के सुखद या दुःखद दोनों पक्षों को काल-कालांतर तक अनुभव किया जा सकता है। पुस्तकें ही वह साधन हैं, जो अतीत का अनुभव वर्तमान में भी कराती हैं। पुस्तकों का ज्ञान जिज्ञासु की जिज्ञासा को शांत करता है। विद्या का महत्व बताते हुए संस्कृत वांग्मय कहता है –
“न चोरहार्यं न च राजहार्यं, न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं, विद्या धनं सर्वधनप्रधानम्॥”
अर्थ – विद्या ऐसा धन है जिसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई बांट सकता है और खर्च करने पर भी यह बढ़ती ही है।
पुस्तकों के महत्व को देखते हुए ज्ञान के प्रचार-प्रसार के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 23 अप्रैल को यूनेस्को विश्व पुस्तक दिवस एवं कॉपीराइट दिवस मनाता है। यूनेस्को द्वारा मनाया जाने वाला यह एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य पढ़ने, प्रकाशन और कॉपीराइट को बढ़ावा देना है। यह विभिन्न संस्कृतियों एवं पीढ़ियों के बीच सेतु के रूप में किताबों की शक्ति को मान्यता देता है।
पुस्तकों के प्रति प्रेम और आनंद भविष्य निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। बच्चों और युवाओं को पठन-पाठन के लिए प्रेरित करना आवश्यक है, ताकि वे विभिन्न प्रकार के साहित्य से जुड़ सकें। अच्छी पुस्तकें प्रेरणा स्रोत होती हैं, जो चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करती हैं। पुस्तकें मनोरंजन के साथ समय के सदुपयोग का स्वस्थ साधन हैं। वे नई भाषा और शब्दावली को सीखने का अवसर देती हैं तथा विश्लेषण क्षमता, तर्क शक्ति और लेखन कौशल में भी वृद्धि करती हैं। आत्म-सुधार और आत्म-नियंत्रण की प्रेरणा भी पुस्तकों से प्राप्त होती है।
इसी कारण देश-विदेश में विविध विषयों पर लिखी गई पुस्तकों को सुरक्षित और व्यवस्थित रखने के लिए पुस्तकालयों की स्थापना की गई। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के अध्ययन हेतु पुस्तकों का संग्रह पुस्तकालयों में अनिवार्य रूप से रखा जाता है। हमारे देश में केंद्र सरकार द्वारा कोलकाता, दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में राष्ट्रीय पुस्तकालय स्थापित किए गए हैं।
पुस्तक मेलों का आयोजन भी किया जाता है, जहां विभिन्न प्रकार के साहित्य, घरेलू जानकारी, औषधीय पेड़-पौधों, ज्ञान-विज्ञान, हास्य-व्यंग्य तथा जीवन के विविध विषयों से संबंधित पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं का विशाल संग्रह उपलब्ध रहता है, जिसका अवलोकन और क्रय किया जा सकता है। राज्यों और जिलों में भी शासकीय ग्रंथालय स्थापित किए गए हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए सस्ता और सुलभ माध्यम हैं।
वर्तमान समय में डिजिटल माध्यम भी उपलब्ध हैं, जहां एक क्लिक पर अनेक प्रकार की जानकारी प्राप्त हो जाती है। किंतु इनकी अपनी सीमाएं और चुनौतियां भी हैं। पुस्तक के पन्नों को अपने हाथों से पलटते हुए पढ़ने का जो स्वाभाविक आनंद मिलता है, वह डिजिटल माध्यम में संभव नहीं हो पाता। यद्यपि समयानुसार परिवर्तन आवश्यक है, फिर भी यह सत्य है कि डिजिटल ज्ञान की मूल आधारशिला भी पुस्तकें ही हैं। हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के द्विवेदी युग के प्रसिद्ध कवि पंडित लोचन प्रसाद पांडेय द्वारा रचित काव्य पंक्तियां, जो सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थीं—
“मैं जो नया ग्रन्थ विलोकता हूँ, भाता मुझे सो नव मित्र-सा है।
देखूँ उसे मैं नित बारं-बार, मानों मिला मित्र मुझे पुराना।”
लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार एवं हिन्दी व्याख्याता हैं।
