आयुर्वेद में निवारक चिकित्सा की अवधारणा

आयुर्वेद मानव जीवन की सबसे प्राचीन और समग्र चिकित्सा पद्धति है जो केवल रोगों का उपचार नहीं बल्कि स्वास्थ्य की रक्षा और रोगों की रोकथाम पर विशेष बल देती है। इसके मूल में निवारक चिकित्सा की अवधारणा निहित है जिसे स्वस्थवृत्त कहा जाता है। यह वह विज्ञान है जो व्यक्ति को स्वस्थ रखने के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने का मार्ग दिखाता है। चरक संहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्य विकारप्रशमनं च। अर्थात आयुर्वेद का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति का स्वास्थ्य रक्षण तथा रोगी का विकार प्रशमन है। इस प्रकार आयुर्वेद निवारक और चिकित्सकीय दोनों भूमिकाओं को समान महत्व देता है।
सुश्रुत संहिता में स्वास्थ्य की परिभाषा देते हुए कहा गया है कि समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते। अर्थात जब दोष अग्नि धातु और मल की क्रियाएं संतुलित हों तथा आत्मा इंद्रियां और मन प्रसन्न हों तभी व्यक्ति स्वस्थ कहलाता है। इस संतुलन को बनाए रखने के लिए आयुर्वेद दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और योग जैसे उपायों का विस्तृत वर्णन करता है जो रोगों की जड़ को ही समाप्त कर देते हैं। ये उपाय शरीर के तीन दोषों वात पित्त और कफ को संतुलित रखते हैं पाचन अग्नि को प्रज्वलित करते हैं और मन को शांत रखते हैं। आज के युग में जहां जीवनशैली संबंधी रोग बढ़ रहे हैं वहां इन प्राचीन सिद्धांतों का पालन न केवल रोगों से बचाव करता है बल्कि लंबी आयु और सुखमय जीवन भी प्रदान करता है।
दिनचर्या आयुर्वेद की निवारक चिकित्सा की आधारशिला है। यह दैनिक दिनचर्या का वह क्रम है जो सूर्योदय से पहले शुरू होता है और पूरे दिन को स्वस्थ रखता है। अष्टांग हृदय में कहा गया है – ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः। अर्थात स्वस्थ व्यक्ति को आयु की रक्षा के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से लगभग दो घंटे पहले का समय होता है जब वात दोष सक्रिय होता है और पर्यावरण में शुद्ध ऑक्सीजन भरपूर होती है। इस समय उठकर व्यक्ति मन को शांत रखता है और दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा से करता है।
उठने के बाद सबसे पहले मल मूत्र विसर्जन का वेग पूरा करना चाहिए क्योंकि आयुर्वेद में प्राकृतिक वेगों को दबाने को रोगों का कारण माना गया है। इसके बाद दांतों की सफाई आती है। चरक संहिता सूत्र स्थान अध्याय पांच में वर्णित है कि कटु तिक्त और कषाय रस वाले दांतों की सफाई की लकड़ी से दांतों और मसूड़ों को साफ करना चाहिए। इससे मुंह की दुर्गंध मिटती है स्वाद बढ़ता है और कफ दोष का शमन होता है। जीभ की सफाई भी जरूरी है जो स्वर्ण या ताम्र की खुरचनी से की जाती है। इससे जिह्वा पर जमी गंदगी हटती है और अन्न रस का अनुभव तीव्र होता है।
आंखों की देखभाल के लिए अंजन का प्रयोग किया जाता है। चरक संहिता में वर्णन है कि रसांजन नामक औषधि से पांच से आठ दिनों में एक बार रात के समय अंजन लगाना चाहिए। इससे नेत्र स्वस्थ रहते हैं और कफजनित विकार नहीं होते। नस्य का अभ्यास भी दिनचर्या का अभिन्न अंग है। अनु तैल से नाक में तेल डालने से मस्तिष्क की रक्षा होती है इंद्रियां तीव्र रहती हैं और सिर संबंधी रोग दूर रहते हैं। इसके बाद धूमपान यानी औषधीय धुआं लेना चाहिए। चरक संहिता में आठ अवसरों पर धूमपान का उल्लेख है जैसे स्नान भोजन जीभ सफाई छींकने दांत साफ करने नस्य अंजन और नींद के बाद। इससे वात और कफ दोष शांत होते हैं सिर नाक और आंखों के रोग नहीं होते तथा स्वर मधुर होता है। गंडूष यानी तेल से कुल्ला करने से जबड़े मजबूत होते स्वर स्पष्ट होता है और दांतों में सड़न नहीं लगती।
शरीर की मालिश यानी अभ्यंग दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अष्टांग हृदय में कहा गया है- अभ्यंगं आचरेत् नित्यं सा हि वातहरः परः। अर्थात नित्य तेल मालिश करनी चाहिए क्योंकि यह वात दोष का सर्वोत्तम शमनकर्ता है। तिल के तेल से पूरे शरीर की मालिश करने से त्वचा चिकनी होती है शरीर बलवान होता है थकान नहीं लगती और वृद्धावस्था देर से आती है। उद्वर्तन यानी चूर्ण मालिश कफ और मेद बढ़ने वालों के लिए लाभकारी है। व्यायाम भी आवश्यक है लेकिन मात्रा में।
चरक संहिता में कहा गया है कि आधा बल व्यायाम करना चाहिए जो शरीर को हल्का रखे पाचन बढ़ाए और मोटापा घटाए। अधिक व्यायाम वात और पित्त को बढ़ा सकता है इसलिए संतुलन जरूरी है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनना सुगंधित द्रव्य लगाना और केशों की देखभाल करना भी दिनचर्या का हिस्सा है। ये सभी क्रियाएं शरीर को शुद्ध रखती हैं दोषों को संतुलित करती हैं और रोगों को जन्म लेने का अवसर नहीं देतीं। दिनचर्या का पालन करने वाला व्यक्ति कभी भी अकस्मात रोगों से ग्रस्त नहीं होता क्योंकि उसका शरीर प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलता है।
ऋतुचर्या आयुर्वेद की निवारक चिकित्सा का दूसरा स्तंभ है जो ऋतुओं के अनुसार जीवन शैली को ढालने का निर्देश देती है। अष्टांग हृदय सूत्र स्थान अध्याय तीन में ऋतुओं का वर्णन करते हुए कहा गया है – मासैर्द्विसंख्यैर्माघाद्यैः क्रमात् षडृतवः स्मृताः शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाशरद्धिमाः। अर्थात माघ से शुरू होकर छह ऋतुएं हैं शिशिर वसंत ग्रीष्म वर्षा शरद और हेमंत। वर्ष को दो भागों में बांटा गया है उत्तरायण और दक्षिणायन। उत्तरायण में सूर्य की तीव्रता बढ़ने से बल घटता है जबकि दक्षिणायन में बल बढ़ता है। प्रत्येक ऋतु में दोषों की चय अपचय की प्रक्रिया अलग अलग होती है इसलिए आहार और विहार को उसी के अनुसार बदलना पड़ता है।
हेमंत ऋतु में सर्दी बढ़ने से अग्नि प्रबल होती है इसलिए मधुर अम्ल और लवण रस वाले स्निग्ध आहार का सेवन करना चाहिए जैसे घी दूध गुड़ और मांसाहार। तेल मालिश गर्म वस्त्र और धूप का सेवन विहार में शामिल है। शिशिर ऋतु में भी यही चर्या लेकिन अधिक सावधानी से क्योंकि ठंड बढ़ती है। वसंत ऋतु में कफ प्रकोप होता है इसलिए तिक्त कटु और कषाय रस वाले हल्के आहार जैसे पुराना अनाज शहद और जंगली मांस (जो सेवन करते हैं उनके लिए) लें। व्यायाम उद्वर्तन और वमन जैसे शोधन कर्म आवश्यक हैं ताकि कफ न जमें।
ग्रीष्म ऋतु में पित्त बढ़ता है इसलिए शीतल मधुर और द्रव पदार्थों का सेवन करें जैसे फल का रस दूध और ठंडा जल। दिन में छाया में आराम और रात में चंद्रमा की शीतलता का लाभ लें। वर्षा ऋतु में अग्नि मंद होती है इसलिए पुराना अनाज मांस का शोरबा और मधुयुक्त जल लें। बस्ति कर्म और गर्म रहना जरूरी है। शरद ऋतु में पित्त शांत करने के लिए मधुर तिक्त और शीतल आहार जैसे दूध शहद और हरी सब्जियां लें। रात्रि में चंद्रमा का दर्शन और रक्त शोधन उपयोगी है।
ऋतुचर्या का पालन करने से ऋतुजनित रोग जैसे सर्दी जुकाम पित्त विकार और कफ जन्य समस्याएं नहीं होतीं। चरक संहिता सूत्र स्थान अध्याय छह में कहा गया है कि ऋतु के अनुसार आहार विहार से बल और कान्ति बढ़ती है। ऋतु संधि काल यानी दो ऋतुओं के संक्रमण के सात सात दिन पहले और बाद में पुरानी चर्या को धीरे धीरे छोड़कर नई अपनानी चाहिए ताकि अचानक परिवर्तन से रोग न हो। इस प्रकार ऋतुचर्या प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रोगों को जड़ से रोकती है।
आहार विहार आयुर्वेद की निवारक चिकित्सा का मूल आधार है। आहार को प्राण कहा गया है क्योंकि चरक संहिता में वर्णित है आहारः प्राणिनां प्राणः। सही आहार दोषों को संतुलित रखता है अग्नि को जागृत करता है और धातुओं का पोषण करता है। आहार विधि विशेषायतन में आठ नियम बताए गए हैं जैसे मात्रा देश काल आदि का विचार। भोजन हमेशा उष्ण स्निग्ध और सुपाच्य होना चाहिए। विरुद्ध आहार जैसे दूध के साथ मछली या दही के साथ मांस से बचना चाहिए क्योंकि ये दोषों को विकृत करते हैं।
आहार का समय भूख लगने पर होना चाहिए और रात्रि भोजन हल्का रखना चाहिए। वर्तमान में लोग समय देखकर भोजन करते हैं, चाहे भूख लगी हो या न लगी हो। विहार में व्यायाम योगासन प्राणायाम और सद्वृत्त का पालन शामिल है। योग आयुर्वेद का अभिन्न अंग है। हालांकि योग का अलग शास्त्र है लेकिन आयुर्वेद में इसे विहार के रूप में शामिल किया गया है। आसन जैसे सूर्य नमस्कार भुजंगासन और शवासन वात पित्त कफ को संतुलित करते हैं। प्राणायाम अनुलोम विलोम और भ्रामरी मन को शांत रखते हैं तनाव घटाते हैं और इम्यूनिटी बढ़ाते हैं। चरक संहिता में सद्वृत्त का वर्णन है जिसमें क्रोध लोभ और ईर्ष्या से बचना मन को नियंत्रित रखना और सत्य का पालन करना शामिल है। योग के माध्यम से शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं जो रोगों की रोकथाम का सबसे प्रभावी तरीका है।
आयुर्वेद में योग को रसायन कर्म के साथ जोड़ा गया है जो दीर्घायु और रोग मुक्ति प्रदान करता है। नियमित योगाभ्यास से ओजस बढ़ता है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता का आधार है। इस प्रकार दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और योग का समन्वय निवारक चिकित्सा का पूर्ण रूप है। इनका पालन करने वाला व्यक्ति कभी भी रोगों की चपेट में नहीं आता बल्कि स्वस्थ सुखी और दीर्घायु जीवन जीता है। आज के आधुनिक जीवन में इन सिद्धांतों को अपनाकर हम पुराने रोगों से मुक्ति पा सकते हैं और स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं। आयुर्वेद की यह अवधारणा हमें सिखाती है कि रोगों का इलाज दवा से पहले रोकथाम में है। प्रकृति के नियमों का पालन कर हम स्वयं को स्वस्थ रख सकते हैं।
आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
