भारत की विविधता में सह-अस्तित्व का दर्शन: महावीर जयंती विशेष

आज चैत्र शुक्ल त्रयोदशी की पावन तिथि के उदय होते के साथ भारत की धरती पर महावीर जयंती का २६२४वां पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान महावीर का जन्म उत्सव न केवल जैन समुदाय के लिए बल्कि समूचे भारत के लिए एक गहन चिंतन का अवसर है। भगवान महावीर का संदेश किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि वह भारतीय दर्शन की उस व्यापक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जो विविधता के विशाल कैनवास पर सह-अस्तित्व की ज्योति प्रज्वलित करती है। कल्पना कीजिए एक ऐसे देश की, जहां हजारों भाषाएं बोलने वाले लोग साथ रहते हैं, जहां अलग-अलग धर्मों के त्योहार एक साथ मनाए जाते हैं, जहां उत्तर की हिमाच्छादित चोटियों से लेकर दक्षिण के उष्ण समुद्र तट तक एक ही सूत्र में मानवीय संबंधों की भावना गुंथी हुई है। यही भारत है और यही महावीर का दर्शन है, जो कहता है -“जियो और जीने दो।” आज जब विश्व युद्ध और संघर्ष की चुनौतियों से गुजर रहा है, तब महावीर का दर्शन हमें स्मरण कराता है कि विविधता कोई संकट नहीं, बल्कि मानव समुदाय की सबसे बड़ी शक्ति है।
महावीर स्वामी का जीवन स्वयं त्याग, करुणा और व्यापक दृष्टि का उदाहरण है। वैशाली के कुंडग्राम में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहां जन्मे वर्धमान ने राजसी वैभव का त्याग कर केवल ज्ञान की खोज में 12 वर्ष की कठोर तपस्या की। जंगलों में नंगे पैर विचरण करते हुए उन्होंने प्रत्येक जीव में आत्मा का दर्शन किया। उनकी शिक्षाएं पंच महाव्रत – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह – पर आधारित हैं। किन्तु इनके साथ अनेकांतवाद और स्यादवाद का दर्शन विशेष महत्व रखता है। अनेकांतवाद हमें बताता है कि सत्य बहुआयामी होता है, कोई एक दृष्टिकोण पूर्ण नहीं होता। स्यादवाद यह समझाता है कि प्रत्येक कथन सापेक्ष है और विभिन्न परिस्थितियों में उसका अर्थ बदल सकता है। यदि हम दूसरों के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करें, तो संघर्ष का स्थान सहयोग ले सकता है। यही विचार भारत की विविधता में सह-अस्तित्व की मजबूत नींव बनता है।
भारत की विविधता को समझने के लिए हमें उसके प्राचीन इतिहास में झांकना होगा। हजारों वर्ष पहले जब सिंधु घाटी सभ्यता फल फूल रही थी तब यहां विभिन्न समुदाय एक साथ रहते थे। बाद में वैदिक काल में ऋग्वेद ने एकता का मंत्र दिया – ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति’ अर्थात सत्य एक है लेकिन विद्वान उसे अलग अलग नामों से पुकारते हैं। बौद्ध जैन और हिंदू दर्शन साथ साथ विकसित हुए। महावीर और गौतम बुद्ध समकालीन थे दोनों ने हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। जैन मंदिरों की शिल्पकला ने भारतीय कला को समृद्ध किया जबकि जैन साहित्य ने भाषा और साहित्य को नई दिशा दी। ब्रिटिश काल में स्वतंत्रता संग्राम ने इस विविधता को एकजुट किया। महात्मा गांधी ने महावीर के अहिंसा के सिद्धांत को अपनाकर सत्याग्रह का हथियार बनाया। गांधी जी जैन विचारों से गहराई से प्रभावित थे। उन्होंने कहा कि अहिंसा केवल शारीरिक नहीं बल्कि मन की शुद्धि है। उनकी यात्रा में जैन साधुओं की सादगी और त्याग ने उन्हें प्रेरित किया। गांधी ने साबरमती आश्रम में जैन परंपराओं को जगह दी और पूरे भारत को सिखाया कि विविधता में एकता संभव है।
आज का भारत इस दर्शन का जीवंत प्रमाण है। यहां 22 अनुसूचित भाषाएं हैं और लगभग 19500 बोलियां बोली जाती हैं। उत्तर में हिंदी पंजाबी कश्मीरी बोलते हैं तो दक्षिण में तमिल तेलुगु कन्नड़ मलयालम। पूर्व में बंगाली असमिया ओडिया और पश्चिम में मराठी गुजराती। हर भाषा का अपना साहित्य अपना गीत है, लेकिन राष्ट्रीय गान में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे एक सूत्र में बांधा पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल, बंग। धर्मों की बात करें तो भारत में सभी धर्मों के लोग रहते हैं। जैन पर्व हिन्दू और जैन एक साथ मिलकर मनाते हैं, आदिवासी संस्कृतियां अपनी परंपराओं को संजोए हुए हैं। उत्तर पूर्व के पहाड़ी राज्य अपनी अनोखी लोक कथाओं से देश को समृद्ध करते हैं। यह सब सह अस्तित्व का परिणाम है जो महावीर के अनेकांतवाद से प्रेरित है।
महावीर का दर्शन सारी मानवता के लिए है। फिर भी चुनौतियां हैं। कभी कभी राजनीतिक स्वार्थ या सामाजिक पूर्वाग्रह विविधता को विभाजन में बदल देते हैं। लेकिन महावीर दर्शन हमें याद दिलाता है कि अहिंसा का मार्ग ही सच्चा है। अपरिग्रह सिखाता है कि भौतिक सुखों से ऊपर उठकर हम एक दूसरे के साथ जी सकते हैं। आज पर्यावरण संकट के समय में महावीर का जीव दया का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। वे कहते थे कि छोटे से छोटे जीव में भी दिव्यता है। इसलिए वनों को बचाना नदियों को शुद्ध रखना और पशुओं का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। भारत की विविधता में यह दर्शन पर्यावरण संरक्षण का आधार भी बनता है।
जैन धर्म ने भारतीय संस्कृति को और समृद्ध किया। जैन मंदिरों की वास्तुकला जैसे दिलवाड़ा का मंदिर या श्रवणबेलगोला का गोमतेश्वर मूर्ति भारतीय कला का गौरव है। जैन ग्रंथों ने नैतिकता और दर्शन को नई ऊंचाई दी। मध्यकाल में जैन व्यापारियों ने अर्थव्यवस्था को मजबूत किया । अपरिग्रह का पालन करते हुए उन्होंने समाज सेवा की। आज भी जैन समुदाय शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी है। यह सब महावीर के सह अस्तित्व के दर्शन का परिणाम है।
समकालीन भारत में संविधान इस दर्शन को कानूनी रूप देता है। प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता और समानता का उल्लेख है। अनुच्छेद 25 से 28 धर्म की स्वतंत्रता देते हैं। विविधता को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। स्कूलों में बच्चों को सिखाया जाता है कि भारत एक परिवार है। महावीर के रास्ते पर चलकर शांति को प्राप्त किया जा सकता है। राजनीति में स्यादवाद अपनाकर संवाद बढ़ाना होगा। समाज में अपरिग्रह सिखाकर भौतिकवाद से ऊपर उठना होगा। जब हम सभी को अपनाएगें तब भारत विश्व गुरु बनेगा। विकसित भारत 2047 का सपना इसी सह अस्तित्व पर टिका है। महावीर ने सिखाया है कि सच्ची मुक्ति तब है जब सब जी सकें। भारत की हजारों वर्षों की यात्रा इसी सह-अस्तित्व के आधार पर आगे बढ़ती रही है और आगे भी बढ़ती रहेगी। विविधता में एकता, सह-अस्तित्व में शांति और महावीर के संदेश में मानवता की अमरता निहित है।
