SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, टीएमसी की आपत्ति खारिज; ‘न्यायिक अधिकारियों पर भरोसा रखें’
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत दावों की जांच के लिए तैनात न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण दिए जाने पर तृणमूल कांग्रेस की आपत्तियों को सुनने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर अनावश्यक विवाद खड़ा कर प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने टिप्पणी की, “छोटी-छोटी बातों को आधार बनाकर काम रोकने की कोशिश न करें। हर दिन इस तरह की सुनवाई संभव नहीं है, किसी न किसी बिंदु पर इसे समाप्त होना चाहिए।”
टीएमसी की दलील
टीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग ने न्यायिक अधिकारियों के लिए एक प्रशिक्षण मॉड्यूल जारी किया है, जिसमें यह बताया गया है कि किन दस्तावेजों को स्वीकार करना है और किन्हें नहीं। उनका तर्क था कि यह कदम अदालत के पूर्व आदेश की भावना के विपरीत है, क्योंकि 20 फरवरी के आदेश में प्रक्रिया की रूपरेखा तय करने का अधिकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिया गया था।
सिब्बल ने यह भी कहा कि कुछ अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि एसडीओ द्वारा जारी निवास प्रमाणपत्र स्वीकार न किया जाए, जो उचित नहीं है। उन्होंने अदालत से स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि न्यायिक अधिकारी चुनाव आयोग के निर्देशों से बाध्य नहीं हैं।
अदालत की कड़ी प्रतिक्रिया
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की निष्पक्षता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल प्रक्रिया की जानकारी देना है, अंतिम निर्णय न्यायिक अधिकारी ही लेंगे। “वे स्वतंत्र हैं। कोई भी पक्ष अपने तर्क रख सकता है, निर्णय न्यायिक अधिकारी करेंगे,” पीठ ने कहा।
न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि अदालत के आदेश स्पष्ट हैं और चुनाव प्रक्रिया अदालत के निर्देशों से ऊपर नहीं हो सकती। यदि किसी दस्तावेज को अदालत के आदेश में शामिल किया गया है तो उसकी जांच होगी, अन्यथा नहीं।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक अधिकारियों को एक नई जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसके लिए वे सामान्यत: प्रशिक्षित नहीं होते। ऐसे में सभी पक्षों को सहयोगी वातावरण सुनिश्चित करना चाहिए। अदालत ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग से भी अपेक्षा जताई कि वे न्यायिक अधिकारियों के साथ समन्वय बनाकर काम करें।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में कोई अतिरिक्त आदेश पारित करने से इनकार करते हुए कहा कि उसके पूर्व निर्देश पर्याप्त रूप से स्पष्ट हैं और न्यायिक अधिकारी उन्हें समझते हैं।

