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वेदों में विज्ञान और विकसित भारत का स्वप्न : राष्ट्रीय विज्ञान दिवस विशेष

आचार्य ललित मुनि

“नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥”

ऋग्वेद के इस नासदीय सूक्त का पहला ही मंत्र हमें उस आदिम जिज्ञासा के सामने खड़ा कर देता है जहाँ मानव पहली बार सृष्टि के रहस्य पर प्रश्न करता है। उस समय न सत था, न असत। न आकाश था, न पृथ्वी। फिर यह सृष्टि कैसे बनी। यह प्रश्न ही विज्ञान की जड़ है। प्रश्न करने का साहस, अज्ञात को स्वीकार करने की विनम्रता और सत्य की खोज का संकल्प। यही भाव आगे चलकर मानव सभ्यता की वैज्ञानिक यात्रा का आधार बना।

वेदों की परंपरा हमें यह बताती है कि ज्ञान केवल विश्वास नहीं है, वह खोज भी है। “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” यह ऋग्वेद का मंत्र केवल आध्यात्मिक भाव नहीं, बल्कि वैज्ञानिक संकेत भी है कि सूर्य जीवन का आधार है। अथर्ववेद में कहा गया है “अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मयः” अर्थात सूर्य की सात किरणें आकाश में फैलती हैं। आज हम इन्हें प्रकाश के सात रंगों के रूप में जानते हैं। जब हम 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाते हैं और सर चंद्रशेखर वेंकट रमन की खोज को स्मरण करते हैं, तब हमें यह भी याद रखना चाहिए कि प्रकाश के रहस्य पर चिंतन भारत की परंपरा में बहुत पुराना है।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस रमन प्रभाव की खोज के सम्मान में मनाया जाता है। 1928 में रमन ने दिखाया कि जब प्रकाश किसी पदार्थ से गुजरता है तो उसकी तरंग दैर्ध्य में परिवर्तन हो सकता है। यह खोज आधुनिक भौतिकी में एक मील का पत्थर बनी और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। यह उपलब्धि हमें प्रेरित करती है कि जिज्ञासा और प्रयोग से असंभव भी संभव हो सकता है। परंतु इस दिन को केवल आधुनिक प्रयोगशाला की सीमा में बाँध देना उचित नहीं होगा। हमें अपनी जड़ों की ओर भी देखना चाहिए जहाँ विज्ञान की चेतना बहुत पहले से प्रवाहित थी।

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वेदों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर विचार करते हुए नासदीय सूक्त आगे कहता है कि “को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः” अर्थात कौन जानता है कि यह सृष्टि कहाँ से आई। यह स्वीकार करना कि अंतिम सत्य अभी अज्ञात है, विज्ञान का सबसे बड़ा गुण है। आधुनिक कॉस्मोलॉजी में बिग बैंग सिद्धांत भी इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है। ऋषियों ने बिना दूरबीन के, बिना प्रयोगशाला के, केवल अवलोकन और ध्यान के माध्यम से यह साहसिक प्रश्न उठाए।

यजुर्वेद में एक मंत्र आता है “सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः” जिससे संकेत मिलता है कि चंद्रमा का प्रकाश सूर्य से संबंधित है। आज विज्ञान बताता है कि चंद्रमा स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करता, वह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है। इसी प्रकार पृथ्वी की गति और गुरुत्व के संकेत भी वैदिक साहित्य में मिलते हैं। “सविता यन्त्रैः पृथिवीमरम्णात्” यह संकेत देता है कि सूर्य की शक्ति पृथ्वी को बाँधे रखती है। यह गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा की ओर इशारा करता है।

नक्षत्रों की गणना और समय निर्धारण का ज्ञान भी वैदिक युग में विकसित था। यजुर्वेद और तैत्तिरीय संहिता में अश्विनी से रेवती तक 27 नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए नहीं था, बल्कि कृषि, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक जीवन के संगठन के लिए आवश्यक था। वेदांग ज्योतिष में अयन, विषुव और ग्रहणों की चर्चा मिलती है। राहु और केतु की अवधारणा ग्रहण की छाया को समझाने का प्रयास है।

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गणितीय दृष्टि से भी वैदिक परंपरा अत्यंत समृद्ध थी। यजुर्वेद में संख्याओं का विस्तार परार्ध तक मिलता है। सुल्ब सूत्रों में ज्यामितीय सिद्धांतों का वर्णन है। बौधायन सुल्ब सूत्र का कथन कि दीर्घचतुर्भुज के क्षेत्रफल के बराबर वर्ग का निर्माण किया जा सकता है, पाइथागोरस प्रमेय से पूर्व का संकेत माना जाता है। यह दर्शाता है कि यज्ञ वेदियों के निर्माण के लिए सटीक गणना की जाती थी। दशमलव और स्थानमान प्रणाली की जड़ें भी इसी परंपरा में हैं, जिसने आगे चलकर विश्व गणित को प्रभावित किया।

भौतिकी और रसायन के क्षेत्र में भी वैदिक चिंतन उल्लेखनीय है। अग्नि का वर्णन ऊर्जा के रूप में किया गया है। अरणी काष्ठ के घर्षण से अग्नि उत्पन्न करना ऊर्जा परिवर्तन का प्रत्यक्ष उदाहरण है। पंचमहाभूत की अवधारणा पदार्थ के विभिन्न रूपों को समझने का प्रयास है। जल, वायु और अग्नि के गुणों का सूक्ष्म वर्णन प्राकृतिक विज्ञान की गहरी समझ को प्रकट करता है।

अथर्ववेद में औषधियों और वनस्पतियों का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद इसी परंपरा का विस्तार है। “औषधयः शं नो भवन्तु” यह भावना व्यक्त की गई है कि औषधियाँ हमें कल्याण प्रदान करें। चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा विज्ञान को व्यवस्थित रूप दिया। शल्यक्रिया, नाड़ी परीक्षा और आहार संबंधी निर्देश आज भी आश्चर्यचकित करते हैं। यह ज्ञान प्रयोग और अनुभव पर आधारित था।

पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी वैदिक मंत्रों में झलकती है। ऋग्वेद में कहा गया है “मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः” अर्थात वायु मधुर बहे, नदियाँ मधुर जल दें। यह केवल काव्य नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन की कामना है। आज जब पर्यावरण संकट गंभीर हो रहा है, तब यह दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक है।

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वेदों में मन और चेतना पर भी गहरा चिंतन मिलता है। योग और ध्यान की परंपरा मानसिक स्वास्थ्य और आत्मनियंत्रण का विज्ञान है। “युञ्जते मन उत युञ्जते धियो” यह संकेत देता है कि मन और बुद्धि को साधना आवश्यक है। आज न्यूरोसाइंस और मनोविज्ञान ध्यान के लाभों को प्रमाणित कर रहे हैं।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान के बीच संवाद स्थापित करें। रमन प्रभाव की खोज हमें प्रयोग और अनुसंधान की प्रेरणा देती है। वेदों की जिज्ञासा हमें प्रश्न करने की प्रेरणा देती है। दोनों का संगम ही सच्चा विकास है।

आज भारत अंतरिक्ष मिशनों, डिजिटल तकनीक और जैव प्रौद्योगिकी में आगे बढ़ रहा है। यदि यह प्रगति अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहे तो संतुलित विकास संभव है। वेदों का अंतिम संदेश है “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः” अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोग हों। यही विज्ञान का अंतिम लक्ष्य भी है।

इस राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर हमें केवल अतीत का गौरवगान नहीं करना चाहिए, बल्कि उस जिज्ञासा को पुनर्जीवित करना चाहिए जिसने ऋषियों को प्रश्न करने के लिए प्रेरित किया और रमन को प्रयोग करने के लिए। ज्ञान की यह अखंड धारा ही भारत की वास्तविक शक्ति है। जब हम वेदों की वैज्ञानिक चेतना और आधुनिक अनुसंधान की ऊर्जा को एक साथ जोड़ते हैं, तब विकसित भारत का स्वप्न केवल कल्पना नहीं रहता, वह एक साकार होने वाली संभावना बन जाता है।