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आमलकी व्रत और रंगभरी उत्सव का सांस्कृतिक महत्व

संध्या शर्मा (फ़ीचर एडिटर)

फाल्गुन मास का शुक्ल पक्ष जैसे ही आगे बढ़ता है, वातावरण में एक विशेष प्रकार की कोमलता उतर आती है। सर्द हवाओं की तीक्ष्णता कम होने लगती है और वसंत की हल्की सुगंध हवा में घुल जाती है। खेतों में सरसों की पीली आभा और आम के बौर की महक मन को एक नई ऊर्जा से भर देती है। इसी मधुर ऋतु परिवर्तन के बीच एक तिथि आती है जो संयम और उत्सव दोनों को साथ लेकर चलती है। यह है फाल्गुन शुक्ल एकादशी। यही दिन आमलकी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है और काशी की परंपरा में रंगभरी एकादशी के रूप में भी मनाया जाता है।

यह एक ऐसी तिथि है जो भक्ति की दो धाराओं को एक साथ बहाती है। एक ओर भगवान विष्णु की उपासना के साथ व्रत और आंवले की पूजा का गंभीर भाव है, तो दूसरी ओर भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का उल्लास और रंगों की शुरुआत का आनंद है। एक ही दिन, पर दो भाव। एक तप का, दूसरा उत्सव का।

आमलकी एकादशी का संबंध भगवान विष्णु से है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। आंवला केवल एक फल नहीं, आयुर्वेद में अमृत समान माना गया है। पुराणों में इसे पवित्र और दिव्य बताया गया है। मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है। इसलिए इस दिन लोग आंवले के नीचे दीप जलाते हैं, जल अर्पित करते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं। यह केवल वृक्ष पूजा नहीं, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव भी है।

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आमलकी एकादशी की कथा पद्म पुराण में मिलती है। कहा जाता है कि एक बार चित्ररथ नाम का राजा था, जो अत्यंत धर्मनिष्ठ और विष्णु भक्त था। उसके राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन राजा और प्रजा ने मिलकर आंवले के वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा की। उसी समय एक शिकारी वहाँ आ पहुँचा। वह व्रत और पूजा के महत्व से अनजान था, पर रातभर वहीं बैठा रहा। पूजा, कथा और जागरण के कारण उसने भी भोजन नहीं किया। अनजाने में उसका उपवास हो गया। कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हुई और अगले जन्म में वह एक समृद्ध राजा के रूप में जन्मा। यह कथा यह बताती है कि भक्ति का प्रभाव केवल जानबूझकर किए गए कर्मों तक सीमित नहीं है। ईश्वर की कृपा अनजाने में भी मिल सकती है, यदि मन में सरलता हो।

आमलकी एकादशी का व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं है। यह मन के विकारों का त्याग है। इस दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। तुलसी दल, पीले पुष्प और फल अर्पित किए जाते हैं। यदि आंवले का वृक्ष उपलब्ध हो तो उसके नीचे दीप प्रज्वलित कर पूजा की जाती है। यदि वृक्ष न हो तो आंवले के फल को ही पूज सकते हैं। दिनभर फलाहार या निर्जल व्रत रखा जाता है। रात्रि में भजन कीर्तन और जागरण का विशेष महत्व है। अगले दिन द्वादशी को विधिपूर्वक पारण किया जाता है।

इस व्रत का संदेश स्पष्ट है। शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि आवश्यक है। आंवला स्वास्थ्य का प्रतीक है और विष्णु स्थिरता के देवता हैं। इस दिन का व्रत हमें संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। संयम, सात्विकता और प्रकृति के प्रति सम्मान जीवन को संतुलित बनाते हैं।

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इसी दिन का दूसरा स्वरूप काशी में रंगभरी एकादशी के रूप में सामने आता है। काशी की गलियों में इस दिन एक अलग ही उल्लास दिखाई देता है। मान्यता है कि विवाह के बाद भगवान शिव इसी दिन माता पार्वती को पहली बार काशी लेकर आए थे। इसलिए इसे शिव पार्वती के गृह प्रवेश का उत्सव भी कहा जाता है। इस दिन काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष श्रृंगार होता है। बाबा विश्वनाथ और माता गौरा को अबीर गुलाल अर्पित किया जाता है। मंदिर परिसर में भजन, ढोल और शंख की ध्वनि गूंजती है। वातावरण में भक्ति और आनंद का अद्भुत संगम होता है।

रंगभरी एकादशी को काशी में होली की शुरुआत माना जाता है। यह दिन केवल रंग खेलने का प्रतीक नहीं है। यह दांपत्य प्रेम, मिलन और सामाजिक उल्लास का प्रतीक है। शिव जो तपस्वी हैं, वही गृहस्थ जीवन के आदर्श भी हैं। यह उत्सव हमें सिखाता है कि जीवन में तप और प्रेम दोनों का स्थान है।

रंगभरी एकादशी की पूजा में प्रातः स्नान कर शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं। माता पार्वती को सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। गुलाल अर्पित कर मंगलकामना की जाती है। शिव मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाता है। यह दिन शिव भक्तों के लिए अत्यंत पावन माना जाता है।

इन दोनों परंपराओं को यदि गहराई से देखें तो स्पष्ट होता है कि यह तिथि जीवन के संतुलन का प्रतीक है। आमलकी एकादशी हमें आत्मसंयम और साधना की याद दिलाती है। रंगभरी एकादशी हमें आनंद और उत्सव का महत्व बताती है। एक ओर व्रत का अनुशासन है, दूसरी ओर रंगों का उल्लास। दोनों मिलकर जीवन को पूर्ण बनाते हैं।

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फाल्गुन शुक्ल एकादशी का यह द्वैत हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल कठोर तपस्या नहीं है और न ही केवल उत्सव। संयम और आनंद का संतुलन ही सच्चा आध्यात्मिक जीवन है। विष्णु का स्मरण हमें स्थिरता देता है। शिव का रंगोत्सव हमें हृदय की खुली अभिव्यक्ति सिखाता है।

समय के साथ इन पर्वों का सांस्कृतिक महत्व भी बढ़ा है। आमलकी एकादशी पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश देती है। वृक्ष पूजा केवल परंपरा नहीं, प्रकृति संरक्षण का भाव भी है। रंगभरी एकादशी सामाजिक एकता का संदेश देती है। काशी में इस दिन सभी लोग मिलकर उत्सव मनाते हैं, जाति और वर्ग का भेद भूल जाते हैं।

जब हम इस तिथि पर व्रत रखते हैं या मंदिर में गुलाल अर्पित करते हैं, तब हम केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं कर रहे होते। हम अपने भीतर संतुलन की खोज कर रहे होते हैं। हम यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि जीवन में शुद्धता भी चाहिए और उत्साह भी।

फाल्गुन की यह एकादशी हमें याद दिलाती है कि भक्ति का मार्ग बहुआयामी है। कोई इसे विष्णु भक्ति के रूप में जीता है, कोई शिव के रंगोत्सव के रूप में। पर अंततः लक्ष्य एक ही है। मन की निर्मलता और ईश्वर से जुड़ाव।