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वीर सावरकर का जीवन युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आचार्य ललित मुनि

जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं तो कुछ नाम केवल घटनाओं से जुड़े नहीं मिलते, वे विचारों से जुड़े मिलते हैं। कुछ व्यक्तित्व केवल अपने समय के नहीं होते, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं। विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें हम वीर सावरकर के नाम से जानते हैं, ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। उनका जीवन संघर्ष, साहस, अनुशासन, अध्ययन, संगठन और आत्मविश्वास की ऐसी कहानी है जो आज के युवाओं के भीतर सोई हुई ऊर्जा को जगा सकती है।

युवा अवस्था में व्यक्ति सबसे अधिक प्रश्न करता है। वह अपने देश, समाज और स्वयं की भूमिका को लेकर जिज्ञासु होता है। सावरकर का जीवन इसी जिज्ञासा और संकल्प का उदाहरण है। उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के भगूर गांव में हुआ। बचपन से ही उन्होंने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। प्लेग महामारी में माता पिता का निधन हो गया। परिवार की जिम्मेदारी कम उम्र में ही कंधों पर आ गई। लेकिन उन्होंने परिस्थिति को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने उसे शक्ति में बदला। यह पहला संदेश है जो युवा पीढ़ी उनके जीवन से सीख सकती है कि कठिनाइयाँ व्यक्ति को तोड़ती नहीं, गढ़ती हैं।

विद्यालय के दिनों में ही उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना प्रबल हो चुकी थी। उन्होंने मित्रों के साथ मिलकर एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य था देश को पराधीनता से मुक्त देखना। उस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था और अधिकांश लोग भय में जी रहे थे। पर एक किशोर सावरकर खुले शब्दों में स्वराज की बात करते थे। यह साहस केवल शब्दों का नहीं था, यह आंतरिक विश्वास का परिणाम था।

पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। यह घटना केवल प्रतीकात्मक नहीं थी। वह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की घोषणा थी। युवा सावरकर समझ चुके थे कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, मानसिक भी होनी चाहिए। यदि मन दासता स्वीकार कर ले तो स्वतंत्रता का अर्थ खो जाता है। आज का युवा भी कई बार मानसिक दबावों, सामाजिक अपेक्षाओं और भ्रमित विचारों में उलझ जाता है। सावरकर सिखाते हैं कि आत्मनिर्भर सोच ही सच्ची स्वतंत्रता का आधार है।

उनका जीवन अध्ययनशीलता का भी उदाहरण है। वे केवल क्रांतिकारी नहीं थे, गंभीर चिंतक और लेखक भी थे। लंदन में कानून की पढ़ाई के लिए गए, लेकिन वहाँ भी उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए कार्य जारी रखा। इंडिया हाउस में रहते हुए उन्होंने 1857 के संग्राम पर शोध किया और उसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध किया। उस समय अंग्रेज इतिहासकार उसे केवल विद्रोह कहते थे। सावरकर ने दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर उसे स्वतंत्रता का संग्राम सिद्ध किया। यह कार्य युवाओं के लिए प्रेरणा है कि यदि आप अध्ययन और शोध में ईमानदारी रखें तो स्थापित धारणाओं को भी चुनौती दे सकते हैं।

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लंदन में उनके क्रांतिकारी कार्यों के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। फ्रांस के मार्सेई बंदरगाह पर उन्होंने समुद्र में कूदकर भागने का साहसिक प्रयास किया। यह घटना आज भी रोमांच से भर देती है। हालांकि वे पुनः पकड़े गए, लेकिन उनका यह प्रयास दिखाता है कि वे परिस्थितियों के सामने हार मानने वाले नहीं थे। आज के युवा के लिए यह संदेश है कि असफलता अंतिम सत्य नहीं है। प्रयास करना ही साहस है।

सावरकर को दो आजीवन कारावास की सजा देकर अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया। वह स्थान किसी भी मनुष्य की इच्छाशक्ति को तोड़ सकता था। कालकोठरी की एकांतता, कठोर श्रम, अमानवीय व्यवहार, बैलों की तरह तेल कोल्हू में जोतना, कोड़ों की सजा। इन सबके बीच भी सावरकर का मन नहीं टूटा। उन्होंने जेल की दीवारों पर कील से कविताएँ लिखीं, उन्हें याद किया और साथियों को सुनाया। यह केवल साहित्यिक अभ्यास नहीं था, यह मानसिक स्वतंत्रता का अभ्यास था। शरीर कैद हो सकता है, विचार नहीं। युवा पीढ़ी के लिए यह गहरा संदेश है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत हों, मन की स्वतंत्रता बनाए रखी जा सकती है।

उनकी कविताओं में आशा और आत्मबल की झलक मिलती है। वे निराशा के बीच भी आशा का दीप जलाए रखते थे। आज जब युवा मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा और असफलताओं से जूझता है, तब सावरकर का यह उदाहरण बताता है कि आंतरिक शक्ति का निर्माण सबसे महत्वपूर्ण है। अनुशासन, अध्ययन और आत्मसंयम से ही यह शक्ति आती है।

सावरकर केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के समर्थक नहीं थे। वे सामाजिक सुधार को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध आवाज उठाई। रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर की स्थापना की जहाँ सभी जातियों को प्रवेश की अनुमति थी। उस समय यह एक साहसिक कदम था। वे मानते थे कि समाज में समरसता के बिना राष्ट्र मजबूत नहीं हो सकता। आज का युवा यदि समानता और सामाजिक न्याय की बात करता है तो सावरकर का यह पक्ष उसके लिए प्रेरणास्रोत हो सकता है।

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उनका विज्ञानवाद भी उल्लेखनीय था। वे अंधविश्वास के विरोधी थे। उन्होंने तर्क और विवेक को महत्व दिया। उनका मानना था कि आधुनिक विज्ञान और प्राचीन संस्कृति का संतुलन ही राष्ट्र को आगे बढ़ा सकता है। आज के तकनीकी युग में युवा यदि वैज्ञानिक सोच और सांस्कृतिक चेतना का संतुलन बनाए तो वह अधिक सशक्त बन सकता है।

सावरकर का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कवि थे, इतिहासकार थे, संगठनकर्ता थे, वक्ता थे। उन्होंने हिंदुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की जिसे उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में देखा। इस विचार पर मतभेद हो सकते हैं, पर यह तथ्य है कि उन्होंने राष्ट्र की एकता और सांस्कृतिक पहचान पर गहन विचार किया। युवा पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण यह है कि वे विचार करें, प्रश्न करें और अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से रखें। सावरकर का जीवन बताता है कि विचारधारा केवल नारे नहीं होती, वह अध्ययन और चिंतन से बनती है।

उन पर अनेक आरोप भी लगे और विवाद भी हुए। इतिहास के हर बड़े व्यक्तित्व की तरह उनके जीवन के कुछ प्रसंगों पर बहस होती रही है। परंतु प्रेरणा का स्रोत उनका साहस, आत्मबल और संगठन क्षमता है। युवा पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में आलोचना अवश्य होगी। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मन दृढ़ हो तो आलोचना से घबराने की आवश्यकता नहीं।

सावरकर का अनुशासन अद्भुत था। जेल में रहते हुए भी उन्होंने अध्ययन जारी रखा। स्मरण शक्ति इतनी प्रखर थी कि लंबी कविताएँ कंठस्थ कर लेते थे। यह आत्मनियंत्रण और साधना का परिणाम था। आज के युवाओं के सामने अनेक आकर्षण और विचलन हैं। यदि वे अनुशासन को जीवन का अंग बना लें तो किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा यह है कि उन्होंने अपने जीवन को लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया। निजी सुख सुविधा, पारिवारिक जीवन, आरामदायक भविष्य सब कुछ दांव पर लगा दिया। यह त्याग आज के समय में दुर्लभ प्रतीत होता है। हालांकि हर युवा से इतना बड़ा त्याग अपेक्षित नहीं है, पर अपने जीवन में किसी उच्च उद्देश्य को स्थान देना आवश्यक है। सावरकर का जीवन यह सिखाता है कि उद्देश्यहीन जीवन केवल दिनचर्या है, उद्देश्यपूर्ण जीवन ही इतिहास बनता है।

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उनकी मृत्यु 26 फरवरी 1966 को हुई। जीवन के अंतिम दिनों में भी उन्होंने आत्मानुशासन का पालन किया। उन्होंने निर्णय लिया कि अब शरीर ने अपना कार्य पूरा कर लिया है और उपवास द्वारा जीवन का समापन किया। यह निर्णय भी उनके आत्मनियंत्रण और दार्शनिक दृष्टि को दर्शाता है।

आज का भारत स्वतंत्र है, पर चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुईं। राष्ट्रनिर्माण का कार्य निरंतर है। शिक्षा, विज्ञान, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनेक क्षेत्र युवाओं की ऊर्जा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय में सावरकर का जीवन यह स्मरण कराता है कि परिवर्तन बाहरी परिस्थितियों से नहीं, भीतर की ज्वाला से आता है।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा केवल किसी व्यक्ति की पूजा में नहीं, बल्कि उसके गुणों को अपनाने में है। सावरकर से हम साहस सीख सकते हैं, अध्ययनशीलता सीख सकते हैं, आत्मसम्मान सीख सकते हैं, अनुशासन सीख सकते हैं। हम यह भी सीख सकते हैं कि राष्ट्रप्रेम केवल भावुकता नहीं, बल्कि कर्म और विचार का समन्वय है।

जब भी कोई युवा अपने जीवन में निराशा महसूस करे, तो वह सेल्युलर जेल की उस कोठरी की कल्पना करे जहाँ एक मनुष्य ने अंधकार में भी कविता लिखी। जब कोई युवा अपने लक्ष्य को लेकर असमंजस में हो, तो वह उस किशोर की कल्पना करे जिसने विदेशी कपड़ों की होली जलाकर स्वाभिमान की घोषणा की। जब कोई युवा समाज की विसंगतियों से परेशान हो, तो वह उस व्यक्ति को याद करे जिसने अस्पृश्यता के विरुद्ध मंदिर के द्वार खोले।

वीर सावरकर का जीवन एक सीधी रेखा नहीं था। उसमें संघर्ष थे, विवाद थे, चुनौतियाँ थीं। पर उसमें एक निरंतरता थी, अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा। यही निष्ठा उन्हें विशिष्ट बनाती है। युवा पीढ़ी यदि अपने जीवन में ऐसी निष्ठा और साहस को स्थान दे सके तो वह न केवल अपने लिए, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी परिवर्तनकारी शक्ति बन सकती है।

इसलिए वीर सावरकर का जीवन केवल इतिहास का अध्याय नहीं, प्रेरणा का स्रोत है। वह हमें याद दिलाता है कि एक व्यक्ति भी यदि संकल्पित हो तो वह समय की धारा मोड़ सकता है। युवा मन में यदि साहस, अध्ययन और अनुशासन का संगम हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।

वीर सावरकर को नमन। उनका जीवन हमें यह सिखाता रहे कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी है।