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पर्यावरण संरक्षण में वैदिक कालीन उपाय आज भी खरे

जीवन और पर्यावरण का अटूट सम्बन्ध है। पर्यावरण में ही सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, जीव-जंतु, पेड़-पौधे जन्म लेते और जैविक क्रियाएं करते है। साथ ही पर्यावरण के निर्माण में पर्वत-चट्टानें, नदी, वायु एवं जलवायु जैसे निर्जीव तत्वों की सहभागिता होती है जो पर्यावरण को पूर्णता प्रदान करती है। पर्यावरण अर्थात हमारे चारों ओर का आवरण या घेरा जो इन्हीं तत्वों से बना है।

जीवन की प्रत्येक गतिविधियां पर्यावरण पर निर्भर है एवं जाने-अनजाने इसे अच्छे-बुरे दोनों रूप से प्रभावित भी करती है। पर्यावरण के महत्व और संतुलन एवं इसके संरक्षण-संवर्धन के प्रति विश्व स्तर पर जागरूकता लाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र द्वारा 5 जून 1972 से 16 जून तक महासभा का आयोजन कर विश्व पर्यावरण सम्मेलन किया गया एवं 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया, तब से प्रति वर्ष मनाया जाता है।

भारत में वैदिक युग से ही पर्यावरण के प्रति जागरूकता रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसके महत्व को समझते हुए इसे प्रदूषित होने से बचाने के लिए अनेक उपाय किये, जिन्हें हम परम्परा, संस्कृति कहते हैं वास्तव में ये पर्यावरण को सुरक्षित एवं शुद्ध रखने का तरीका था।

वैदिक काल से प्राकृतिक पदार्थों से कल्याण की कामना को ‘स्वस्ति’ कहा गया अर्थात प्रकृति के सर्व सुलभ पदार्थों को सुरक्षित रखना ही ‘स्वस्ति’ है। सूर्य, चंद्र, वायु, जल, अग्नि को देवता के रूप में मंत्रोच्चारण द्वारा आह्वान करते हुए उनसे रक्षा की कामना की ताकि धरती से आकाश तक पर्यावरण संतुलित रहे।

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धरती पर उपलब्ध जीव-जंतु, जल, औषधियां, वनस्पतियां संतुलित रहें तभी मनुष्य और प्रकृति का संतुलन भी बना रहेगा। मानव को निरोगी रहने के लिए पर्यावरण का शुद्ध होना अति आवश्यक है और इसी निरोगता के लिए ॠषि मुनियों ने बहुतेरे अनुंसधान एवं शोध कर इसका माध्यम ढूंढा।

वैदिककाल से ही प्राकृतिक तत्वों को ईश्वरीय रूप में स्वीकारते हुए रोग-शोक, आधि-व्याधि, अनावृष्टि-अतिवृष्टि जैसी आपदाओं से मुक्ति के लिए पूजन-अर्चन के साथ यज्ञ किया जाता रहा था इसके पीछे कारण था यज्ञ में आहूत जाने वाली हवन सामग्रियों से वातावरण शुद्ध व पवित्र होता था इसलिए यज्ञ करने की परंपरा आज तक चली आ रही है।

अग्नि का तेज प्रदूषण निवारण में सक्षम है।जब गौ घृत की आहुतियाँ अग्नि में दी जाती हैं तो वायुमंडल सुगन्धित व विषाणु मुक्त होता है। वायु प्रदूषण समाप्त होता है। जिससे चराचर जगत का प्राणी रोगमुक्त रहकर स्वस्थ जीवन का निर्वहन करता था।

पर्यावरण की महत्वपूर्ण इकाई वृक्ष हैं इनके बिना धरती का कोई अस्तित्व ही नही। वृक्षों के महत्व को स्वीकार करते हुए मत्स्य पुराण में कहा गया है-

“दश कूप समा वापी,दश वापी समोहद्रः।
दशहृद समः पुत्रो, दश पुत्रो समो द्रुमः।।”

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अर्थात दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।”

पर्यावरण को शुद्ध करने वाले इन छः पौधों स्नुही (थुहर), अर्क (आंकड़ा), अश्मंतक (पथरचटा), पूतीक (करंज), कृष्ण गन्धा (सहजना) और तिल्लक (पठानी लोध) का चरकसंहिता में वर्णन है।

प्राचीन काल से ही औषधियों को प्रदूषण नाशक मानते थे। धरती में सभी पेड़-पौधे कुछ न कुछ औषधीय गुण अवश्य रखते हैं और इसी लिए ऋषि-मुनियों ने वृक्षों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से धार्मिक कर्मकांडों में इन्हें महत्व पूर्ण स्थान दिया और वृक्षों में किसी न किसी देवता का वास भी बताया।

वृक्षों को जीवित मानते हुए उनके बीजारोपण, काटने, तोड़ने के नियम भी बनाये जिनका पालन जानकार आज तक करते हैं। वैदिक संस्कृति में प्रकृति प्रेम और उनके संरक्षण का बहुत महत्व था। धरती को प्रदूषण से बचाने के लिए जल, वायु की शुद्धि के लिए वनौषधियों एवं यज्ञ को उपयुक्त माना।

आज पर्यावरण -प्रदूषण एक गंभीर समस्या हो गई है। पर्यावरण में आने वाली समस्याएं प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन जिनका जिम्मेदार स्वयं मनुष्य ही है। विकास के नाम पर किया जाने वाला औद्योगिकीकरण, नगरीकरण एवं जनसंख्या वृद्धि इत्यादि अनेक कारणों से पर्यावरण प्रदूषित हुआ है, परिणामस्वरूप ग्लेशियर पिघल रहे, समुद्र, नदियां प्रदूषित हो रही हैं। मानव प्राकृतिक संपदाओं का अविवेकपूर्ण दोहन कर जल, वायु, मृदा, ध्वनि प्रदूषण और न जाने कितने प्रदूषण फैला रहा है।

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हमारे मनिषियों ने पर्यावरण की प्रत्येक इकाई वृक्ष, जल, वायु, अग्नि, भूमि के महत्व को प्रमाण सहित सूक्ष्मता के साथ वेदों, ग्रंथों, पुराणों में वर्णित किया है ताकि आने वाली पीढियां जागरूक एवं सतर्क रहें, परंतु मानव ने स्वार्थपूर्ति के लिए वसुधा के सुंदर स्वरूप को क्षति पहुंचाया है। प्रकृति अपने साथ हो रहे अन्याय को चुपचाप सहन कर लेती है परंतु समय आने पर दंड देने से नही चूकती। मैथिलीशरण गुप्त जी ने पंचवटी खंडकाव्य में लिखा है –

“सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है।
अति आत्मीयता प्रकृति हमारे साथ उन्हीं से रोती है।
अनजानी भूलों पर भी वह अदय दंड तो देती है।”

आज पूरा विश्व पर्यावरण प्रदूषण पर चिंतन कर रहा है, परन्तु केवल एक दिन में प्रकृति का संरक्षण नही किया जा सकता, इसके लिए लोगों को जागरूक होकर दृढ संकल्प के साथ आगे आना होगा क्योंकि पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन और प्रदूषण पर नियंत्रण करना मनुष्य का उत्तरदायित्व है। इस समस्या के निराकरण में पूर्ण सहयोग देना देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

श्रीमती रेखा पाण्डेय
व्याख्याता हिन्दी
अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़