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भौतिक युग और आधुनिक जीवनशैली वरदान या अभिशाप : मनकही

विकास के साथ दुनिया बड़ी तीव्रता से बदल रही है, गाँव से लेकर शहर तक। जहाँ हम निवास करते हैं, वहां आधुनिकता अपने पाँव पसार रही, जो स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। लोग बड़ी निश्चिंतता से समयानुसार स्वयं को ढालते जा रहे हैं। जीवन की इस शैली के परिणामों को सोचे समझे बिना। महानगरों और बड़े-बड़े शहरों में तो इंसान रोबोट बनकर बस दौड़ता चला जा रहा है, जिसे अपनी मंजिल समझ रहा, क्या! सच में वही उसके जीवन की उपलब्धि है?

 

नही! जीवन की सार्थकता इसमें नही। कहा जाता है सदैव पुराने का मोह उचित नहीं, कमियाँ सब मे होती हैं, बस अंधानुकरण से बचते हुए स्वयं में समझ विकसित करना चाहिए। पुरानी जीवनशैली, नियम-कायदे, जिन्हें रूढ़िवादी या बेकार मान लोग त्याग कर, अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को भुलाकर पाश्चत्य जीवन पद्धति को अपनाने में अपनी शान समझ रहे हैं, कभी शांत चित्त से आत्मालोकन तो करे कि वो किस दिशा में जा रहे है?

 

आज की युवा पीढ़ी शिक्षा और तकनीकी दुनिया के बीच जिस कदर जूझ रही उसे देख लगता है कि जब इस अवस्था में युवाओं की शारिरिक-मानसिक स्थिति का तालमेल सही नही है तो उम्र बढ़ने पर जीवन में क्या संघर्ष कर पाएंगे। डिजिटल दुनिया ने जीवनचर्या ही बदल कर रख दी। प्रकृति के नियमों को ही चुनौती दे कर, मनुष्य सदैव निरोगी और दीर्घायु होने की कामना करता है।

 

अब दिन-रात, पथ्य-कुपथ्य में भेद नहीं रहा। हमारे बुजुर्गों ने स्वयं जो संतुलित और प्रकृति के नियमों से बंध कर जीवन जिया, वही अपनी आने वाली पीढ़ी को सिखाया और कठोरता से पालन करने के लिए अनुशासित भी किया। जिस पीढ़ी ने इस पर अमल किया मन से या बेमन से, उसी ने सही अर्थों में आनंदपूर्वक जीवन के हर क्षण को जिया है। इंसान की उम्र  बढ़ने के साथ समझ भी विकसित होती है। लेकिन वह वर्तमान से सदैव असन्तुष्ट ही रहता है क्योंकि सारी उपलब्धियाँ  एक साथ पाना चाहता है।

 

आज महानगरों की जीवनचर्या और बड़ी कंपनियों में कार्यरत निम्न से उच्च स्तर पर युवाओं की कार्यशैली पर नजर डालें तो उनका कार्य पालियों में बंटा होता है। जिसमें कार्य के घन्टे निर्धारित कर पूरी रात जाग कर या पूरा दिन बैठकर कार्य करने की प्रतिबद्धता होती है। बीच-बीच में, कुछ अंतराल मिलता है जो पर्याप्त नहीं होता। यदि कोई कर्मचारी अवकाश ले लिया तो उपस्थित कर्मचारियों पर कार्य का बोझ बढ़ जाता है, ताकि कंपनी द्वारा किये जाने वाले देश-विदेश से संबंधित कार्य बाधित न हो। ऐसे में मानसिक दबाव से जुझना पड़ता है क्योंकि  निर्धारित समय में कार्य को पूर्ण करने की जिम्मेदारी  होती है। परन्तु शरीर की कार्य क्षमता भी निश्चित होती है, उसे पौष्टिक भोजन और पर्याप्त आराम एवं नींद की आवश्यकता होती है।

 

महानगरों की दौड़ा-धूपी वाली जीवनचर्या से आज की पीढ़ी पिसती जा रही। उनकी बड़ी-बड़ी डिग्री, सुनहरे भविष्य को लेकर बुने गए ताने-बाने, जिसमें जीवन में कुछ अच्छा करने की लालसा को लेकर कार्य क्षेत्र का चुनाव भी स्वयं का होता है। ऐसे में अपने को एक उच्च स्थान में प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्ष बढ़ता जा रहा है। परिणामस्वरूप अनियमित दिनचर्या से आज के युवा असमय ही  रोगग्रस्त होते जा रहे हैं।

 

विकासशील युग में परिवर्तन भी अत्यंत शीघ्रता से  हो रहा और मनुष्य इस दौड़ का हिस्सा बन स्वयं एवं परिवारिक सुख-शांति के लिए प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कार्य कर सुखी होना चाहता है, जो असंभव है। हमारे ग्रंथ-पुराणों में जो संयमित जीवनचर्या और चार आश्रमों का उल्लेख किया गया है वे प्रकृति के नियमानुसार ही बनाये गये हैं। इनके पालन से हमारे पूर्वजों  ने स्वयं को सुरक्षित एवं संवर्धित रखा तभी तो मानव जाति का अस्तित्व आज तक बना है और आधुनिकता के इस युग को जी रहा है।

 

प्रकृति ने सृष्टि की संरचना इतनी संतुलित रीति-नीति से की है कि इसके अनुकूल-प्रतिकूल किये गए हर कार्य का अच्छा-बुरा परिणाम किसी भी रूप में सामने अवश्य आता है। फिर चाहे प्राकृतिक आपदाओं के रूप में हो या महामारी के रूप में समस्त जीवों को संकटों का सामना करना ही पड़ता है।

 

निरोगी काया और दीर्घायु जीवन के लिए संयमित दिनचर्या का पालन करना अतिआवश्यक है। वर्तमान की जीवन शैलीमानव जीवन को संकट में डाल रही है। समयानुसार परिवर्तन भी निश्चित है। जैसे भोजन में षट रसों का और जीवन में दस रसों सम्मिश्रण होता है, वैसे ही गतियों की दुनिया में अपने अस्तित्व को बचाते हुये, विभिन्न परिस्थितियों से सामंजस्य  बैठाते हुए, आज के युवाओं को शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना उनकी स्वयं के प्रति एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है।

 

अतः उन्हें गंभीरता से चिंतन-मनन करना चाहिए। यदि  वे अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो जीवन की इस भाग-दौड़ में स्वयं के लिए समय निकालना ही होगा। आत्मीय जनों के लिए तो तभी कुछ कर पाएंगे जब स्वयं के लिए स्वयं को समय देंगे और अपने प्रति अपनी ही जिम्मेदारी को समझेंगे। बस समय रहते चैतन्य हो जाने में ही भलाई है।

 

चलते-चलते बचपन में पढ़ी  गोपाल प्रसाद व्यास जी की हास्य रस की कविता याद आ रही, उस पर दृष्टिपात कीजिए, जो वर्तमान संदर्भ में खरी उतरती है-

 

“इस दौड़ धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो ।

आराम जिंदगी की कुंजी,इससे न तपेदिक होती है।

आराम सुधा की एक बूंद तन का दुबलापन खोती है।

ये जीवन यौवन क्षणभंगुर आराम करो, आराम करो।”

 

जीवन में हँसी और ख़ुशी अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह तभी प्राप्त होगी जब आपकी जीवनशैली संयमित-संतुलित

होगी। इसलिए ख़ुश रहिए हँसते रहिए। बाकी जो है सो तो हैइये है।

 

श्रीमती रेखा पाण्डेय (लिपि)
व्याख्याता हिन्दी
अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़

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