भारतीय प्राचीन संस्कृति में उर्जा संरक्षण के तत्व

भारत केवल भौगोलिक विविधता की धरती नहीं, बल्कि यह विचारों, परंपराओं और जीवन दृष्टियों का जीवंत संग्रह भी है। जहां गंगा की लहरें वैदिक ऋषियों की ऋचाओं की स्मृति को संजोए सतत प्रवाहमान हैं और और थार के रेगिस्तान में जोहड़ जल की जीवनरेखा बने हुए हैं, वहीं आज यही भूमि गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन ने ऊर्जा की मांग को अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा दिया है। जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए संकट भी खड़ा कर रही है।
विश्व ऊर्जा आउटलुक के अनुमानों के अनुसार, भारत की ऊर्जा मांग वर्ष 2030 तक लगभग दोगुनी हो सकती है। कोयला और तेल जैसे सीमित संसाधन न केवल समाप्ति की ओर हैं, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख स्रोत भी हैं। ऐसे समय में समाधान केवल नई तकनीकों या आयातित मॉडल्स में नहीं, बल्कि हमारी अपनी सभ्यता की स्मृति में छिपा है। यह स्मृति लोकज्ञान के रूप में आज भी जीवित है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी कथाओं, कृषि चक्रों, पर्वों और सामुदायिक व्यवहारों में संचारित होती रही है।
लोकज्ञान कोई पिछड़ा या अवैज्ञानिक विचार नहीं है। यह प्रकृति के दीर्घकालीन अवलोकन, अनुभव और सामूहिक विवेक का परिणाम है। यह हमें ऊर्जा संरक्षण के साथ-साथ प्रकृति के साथ सहजीवन की कला सिखाता है। भारत के विविध क्षेत्रों में फैली लोक प्रथाएं आज भी इस बात का प्रमाण हैं कि संतुलन और संयम के साथ जीवन जीकर ऊर्जा संकट से निपटा जा सकता है।
भारत के ऊर्जा संकट की जड़ों को समझे बिना समाधान की बात अधूरी है। राष्ट्रीय ऊर्जा नीति के अंतर्गत भारत ने 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य रखा है, लेकिन वर्तमान में कुल ऊर्जा उत्पादन में नवीकरणीय स्रोतों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत ही है। राजस्थान जैसे सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई के लिए डीजल पंपों पर निर्भरता अत्यधिक है, जिससे ऊर्जा खपत और प्रदूषण दोनों बढ़ते हैं। दूसरी ओर हिमालयी क्षेत्रों में अनियमित वर्षा और बाढ़ जलविद्युत परियोजनाओं को अस्थिर बना रही है।
इस संदर्भ में वैदिक लोकज्ञान का महत्व उभरता है। ऋग्वेद में वर्णित ऋत का सिद्धांत प्रकृति के संतुलन पर आधारित है। पंचमहाभूत का विचार यह सिखाता है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के बीच संतुलन बनाए बिना जीवन संभव नहीं। ऊर्जा संकट वास्तव में इसी संतुलन के टूटने का परिणाम है। आधुनिक विकास ने संयम को त्याग कर उपभोग को प्राथमिकता दी है, जबकि लोकज्ञान संयम और सह-अस्तित्व पर आधारित है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट्स भी इस ओर संकेत करती हैं कि स्वदेशी और पारंपरिक प्रथाएं, जैसे प्राकृतिक खेती, ऊर्जा गहन रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करती हैं। इससे न केवल ऊर्जा की बचत होती है, बल्कि मिट्टी और जल संसाधनों का संरक्षण भी होता है।
राजस्थान का थार मरुस्थल लोकज्ञान का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहां जोहड़ प्रणाली सदियों से वर्षा जल को संरक्षित कर भूजल स्तर बनाए रखती है। अर्धचंद्राकार मिट्टी के ये बांध वर्षा के अल्प जल को संचित कर उसे धरती में रिसने देते हैं। इतिहास बताता है कि यह प्रणाली लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुरानी है। आधुनिक समय में सामाजिक समूहों के प्रयासों से हजारों जोहड़ पुनर्जीवित किए गए, जिनसे सैकड़ों गांवों को जल सुरक्षा मिली।
एक औसत जोहड़ लाखों लीटर जल संचित कर सकता है, जिससे सिंचाई के लिए विद्युत या डीजल पंपों की आवश्यकता आधी रह जाती है। लोक कथाओं में जल देवी की पूजा इन संरचनाओं को सामाजिक और सांस्कृतिक सुरक्षा प्रदान करती है। यह दिखाता है कि जब संरक्षण को आस्था से जोड़ा जाता है, तो वह स्थायी बनता है। यही दृष्टि आधुनिक सौर आधारित सिंचाई और माइक्रो हाइड्रो परियोजनाओं में समुदाय की भागीदारी बढ़ा सकती है।
बिश्नोई समुदाय भारत में लोकज्ञान और ऊर्जा संरक्षण का एक जीवंत प्रतीक है। पंद्रहवीं शताब्दी में गुरु जंभोजी द्वारा प्रतिपादित 29 नियम प्रकृति संरक्षण की संहिता हैं। वृक्षों की रक्षा, जल का सम्मान और जीवों के प्रति करुणा इन नियमों का मूल है। बिश्नोई समुदाय आज भी गोबर को ईंधन के रूप में उपयोग करता है, जिससे लकड़ी की कटाई रुकती है और जैव ऊर्जा का संतुलित उपयोग होता है। आधुनिक बायोगैस तकनीक इसी विचार का वैज्ञानिक विस्तार है।
खेजड़ली का ऐतिहासिक बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि लोकज्ञान के लिए समुदाय किस हद तक प्रतिबद्ध हो सकता है। आज उपग्रह चित्रों से स्पष्ट है कि बिश्नोई क्षेत्रों में हरियाली आसपास के क्षेत्रों से अधिक है। यह हरियाली कार्बन को अवशोषित कर ऊर्जा संतुलन में योगदान देती है। यह दिखाता है कि जैव विविधता संरक्षण भी ऊर्जा संरक्षण का ही एक रूप है।
दक्षिण भारत में केरल के पवित्र वन, जिन्हें कावु कहा जाता है, लोक प्रथाओं का एक और उदाहरण हैं। ये छोटे वन क्षेत्र देवी देवताओं को समर्पित होते हैं और सदियों से मानव हस्तक्षेप से सुरक्षित रहे हैं। केरल में ऐसे हजारों कावु आज भी पश्चिमी घाट की जैव विविधता को संरक्षित किए हुए हैं। ये वन प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं और जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं।
लोक कथाओं में वन देवी की उपासना इन वनों को सामाजिक संरक्षण प्रदान करती है। आधुनिक दृष्टि से देखें तो यही क्षेत्र सतत बायोमास ऊर्जा और पारिस्थितिक संतुलन के आधार बन सकते हैं। शोध बताते हैं कि इन वनों में अनेक दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाती हैं और अप्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा चक्र को सहारा देती हैं।
छत्तीसगढ़ लोकज्ञान आधारित ऊर्जा दृष्टि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। राज्य का बड़ा भाग वनाच्छादित है और यहां बड़ी आदिवासी आबादी निवास करती है। वनवासी एवं अन्य समुदायों की जीवन पद्धतियां प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित हैं। बैगा जनजाति की बेवार खेती मिट्टी को पुनर्जीवित करने का अवसर देती है, जिससे भारी मशीनों और रासायनिक इनपुट्स की आवश्यकता कम होती है।
यहां नॉन टिंबर फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स का सतत संग्रह बायोमास ऊर्जा का एक प्राकृतिक स्रोत है। संयुक्त वन प्रबंधन के माध्यम से ग्राम सभाएं छोटे पवित्र वनों की रक्षा करती हैं, जो कार्बन को अवशोषित कर ऊर्जा संतुलन में योगदान देते हैं। पारंपरिक जल संरक्षण प्रथाएं भूजल स्तर बनाए रखती हैं, जिससे सिंचाई और लघु जलविद्युत के लिए ऊर्जा की बचत होती है।
आधुनिक प्रयासों में जब बायोगैस संयंत्र और सौर ऊर्जा को इन पारंपरिक प्रणालियों से जोड़ा जा रहा है, तब स्पष्ट होता है कि लोकज्ञान और आधुनिक तकनीक एक दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
भारत की पारंपरिक वास्तुकला भी ऊर्जा दक्षता का उत्कृष्ट उदाहरण है। वास्तु शास्त्र और स्थापत्य वेद में वर्णित सिद्धांत भवनों को प्राकृतिक प्रकाश, वायु और ताप के अनुरूप डिजाइन करने पर बल देते हैं। राजस्थान की हवेलियों के आंगन और जालियां प्राकृतिक शीतलन प्रदान करती हैं। गुजरात की बावड़ियां तापमान को नियंत्रित करती हैं। हिमालयी क्षेत्रों की जल चक्कियां प्राकृतिक ऊर्जा का उपयोग कर अनाज पीसती थीं।
आज जब शून्य ऊर्जा भवनों की चर्चा होती है, तब ये पारंपरिक मॉडल अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं। आधुनिक कूलिंग एक्शन प्लान भी इन्हीं सिद्धांतों को वैज्ञानिक रूप में अपनाने की बात करता है। निश्चित रूप से लोकज्ञान को आधुनिक ऊर्जा नीति में शामिल करने की राह में चुनौतियां हैं। शहरीकरण, वन क्षरण और जलवायु परिवर्तन ने कई पारंपरिक प्रणालियों को कमजोर किया है। फिर भी, अनेक क्षेत्रों में पुनरुद्धार के प्रयास आशा जगाते हैं। जब समुदाय को केंद्र में रखा जाता है, तब लोकज्ञान पुनः जीवित होता है।
अंततः यह स्पष्ट है कि भारत का लोकज्ञान ऊर्जा संकट का कोई वैकल्पिक समाधान नहीं, बल्कि उसकी मूल कुंजी है। यह हमें सिखाता है कि ऊर्जा केवल उत्पादन का विषय नहीं, बल्कि संतुलन, संयम और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। यदि नीतियों, शिक्षा और विकास योजनाओं में इस ज्ञान को स्थान दिया जाए, तो भारत न केवल ऊर्जा संकट से उबर सकता है, बल्कि दुनिया के लिए एक मानवीय और टिकाऊ मॉडल भी प्रस्तुत कर सकता है।

