छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के विरोध में ईसाई संगठन क्यों?

छत्तीसगढ़ राज्य में पिछले कई दशकों से विशेषकर बस्तर संभाग के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं जिनका सीधा प्रभाव स्थानीय जनसांख्यिकी पर पड़ रहा है। इन घटनाओं में गरीब जनजातीय परिवारों को स्वास्थ्य सेवाएं शिक्षा या आर्थिक सहायता का लालच देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित किया जा रहा है जिससे पारंपरिक सांस्कृतिक संतुलन बिगड़ रहा है और सामाजिक तनाव बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ सरकार ने 19 मार्च 2026 को विधानसभा में छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 पारित कर एक ऐतिहासिक कदम उठाया है।
यह विधेयक 1968 के पुराने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम को प्रतिस्थापित करता है जो पूर्ववर्ती मध्य प्रदेश से विरासत में मिला था और अब इसमें कठोर प्रावधान जोड़े गए हैं ताकि बल प्रलोभन धोखाधड़ी या गलत प्रतिनिधित्व के माध्यम से होने वाले अवैध धर्मांतरण पर पूर्ण अंकुश लगाया जा सके। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का मजबूत उपाय बताया है क्योंकि राज्य में जनजातीय क्षेत्रों में अवैध तरीकों से धर्मांतरण का पैटर्न स्पष्ट रूप से डेमोग्राफिक बदलाव का षड्यंत्र प्रतीत होता है।
विधेयक के मुख्य प्रावधानों को समझना आवश्यक है क्योंकि ये ही इस कानून की रीढ़ हैं। विधेयक स्पष्ट रूप से धर्मांतरण को उन सभी माध्यमों से प्रतिबंधित करता है जिनमें बल प्रयोग प्रलोभन धोखाधड़ी गलत प्रतिनिधित्व अनुचित प्रभाव विवाह का एकमात्र आधार या डिजिटल माध्यम जैसे सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक संचार शामिल हैं। किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन कराने वाले और परिवर्तित होने वाले दोनों को जिला मजिस्ट्रेट या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी जो अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट स्तर से नीचे नहीं हो को पूर्व सूचना देनी अनिवार्य है।
सूचना मिलने के बाद एक सप्ताह के अंदर नोटिस जारी किया जाएगा और मामले की जानकारी जिला की वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दी जाएगी ताकि कोई भी व्यक्ति आपत्ति दर्ज करा सके। अधिकृत अधिकारी एक माह के भीतर पूर्ण जांच करेगा कि कहीं इसमें प्रलोभन भय या दबाव तो नहीं है और उसके बाद ही धर्मांतरण की अनुमति मिलेगी। यदि जांच में अवैध साधनों का पता चला तो धर्मांतरण अवैध घोषित कर दिया जाएगा। विधेयक में पुनः अपने पूर्वजों की मूल धर्म में वापसी को धर्मांतरण नहीं माना गया है जिससे घर वापसी की प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगती। अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होंगे तथा पीड़ितों को अधिकतम दस लाख रुपये तक मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है। सरकारी सहायता या सुविधाएं प्राप्त करने वाले उल्लंघनकर्ताओं से सरकार सहायता वापस ले सकती है।
ये प्रावधान धर्मांतरण को रोकने में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे क्योंकि राज्य में मिशनरी संगठन मुख्य रूप से जनजातीय क्षेत्रों में सक्रिय हैं जहां अशिक्षा गरीबी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का फायदा उठाकर सामूहिक परिवर्तन कराए जा रहे हैं। विधेयक का पूर्व सूचना और जांच का प्रावधान ऐसे छिपे हुए अभियानों को रोक देगा क्योंकि अब कोई भी मिशनरी या मौलवी बिना सरकारी जांच के सामूहिक सभाएं या सहायता नहीं दे सकेगा। सामूहिक धर्मांतरण जिसे विधेयक में दो या अधिक व्यक्तियों के एक घटना में परिवर्तन के रूप में परिभाषित किया गया है पर दस वर्ष से आजीवन कारावास और पच्चीस लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान सीधे उन संगठनों को निशाना बनाता है जो एक साथ कई परिवारों को लक्षित करते हैं। दोहराए जाने वाले अपराधियों के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान पुनरावृत्ति को समाप्त कर देगा।
नाबालिग महिलाओं मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों अनुसूचित जाति जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के मामले में दस से बीस वर्ष की सजा और दस लाख रुपये का न्यूनतम जुर्माना उन कमजोर वर्गों की रक्षा करेगा जो प्रलोभन का सबसे बड़ा शिकार होते हैं। विवाह को धर्मांतरण का माध्यम बनाना भी अवैध घोषित किया गया है जिससे लव जिहाद या लव जिहाद जैसी रणनीतियों पर अंकुश लगेगा। डिजिटल माध्यमों पर प्रतिबंध ऑनलाइन प्रचार और व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से होने वाले गुप्त अभियानों को भी नियंत्रित करेगा। इस प्रकार विधेयक न केवल ईसाई मिशनरियों के प्रलोभन आधारित अभियान बल्कि मुस्लिम संगठनों के कथित सामुदायिक दबाव या आर्थिक सहायता के रूप में छिपे प्रयासों को भी प्रभावी ढंग से रोक देगा और डेमोग्राफिक बदलाव के षड्यंत्र को विफल कर देगा।
छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण का मुद्दा केवल धार्मिक नहीं बल्कि जनसांख्यिकीय सुरक्षा का भी है। बस्तर जैसे क्षेत्रों में जहां जनजातीय आबादी बहुसंख्यक है वहां ईसाई धर्म में परिवर्तनों से ग्राम सभाओं में कब्रिस्तान विवाद सामाजिक बहिष्कार और सांस्कृतिक टकराव बढ़ रहे हैं। सर्व जनजातीय समाज और स्थानीय पुलिस रिपोर्ट्स के अनुसार बस्तर संभाग में हजारों जनजातीय परिवारों का धर्मपरिवर्तन हो चुका है जो पारंपरिक देवता पूजा और सामुदायिक रीति रिवाजों को चुनौती दे रहा है। कांग्रेस शासन काल में सुकमा जिले के एसपी सुनील शर्मा और बस्तर कमिश्नर जी आर चुरेंद्र ने अपने मातहत अधिकारियों को लिखित चेतावनी दी थी कि मिशनरी घूम घूमकर जनजातीय लोगों को लालच देकर परिवर्तित कर रहे हैं और इससे कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है।
अब भाजपा सरकार ने इन चेतावनियों को कानूनी रूप देकर डेमोग्राफिक संतुलन बचाने का कदम उठाया है क्योंकि यदि अनियंत्रित परिवर्तन जारी रहे तो कुछ दशकों में जनजातीय क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान ही बदल जाएगी। विधेयक का मुआवजा प्रावधान पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाएगा और सरकारी सहायता वापसी का प्रावधान उन एनजीओ को हतोत्साहित करेगा जो विदेशी फंडिंग से चलकर परिवर्तन अभियान चला रहे हैं। इस तरह यह कानून संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत दी गई धार्मिक स्वतंत्रता को सही मायने में संरक्षित करता है क्योंकि स्वैच्छिक परिवर्तन पर कोई रोक नहीं है केवल अवैध साधनों पर अंकुश है।
विधेयक के पारित होने के तुरंत बाद ईसाई संस्थाओं ने इसका खुला विरोध शुरू कर दिया जो उनके छिपे धर्मांतरण एजेंडे को उजागर करता है। रायपुर में हजारों ईसाई अनुयायियों ने मशाल जुलूस निकाला और विधेयक को काला कानून बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की। ये विरोध प्रदर्शन और बयान स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि ईसाई संगठन अवैध परिवर्तन को अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा मानते हैं जबकि वास्तव में वे प्रलोभन और विदेशी फंडिंग पर आधारित अभियानों को बचाना चाहते हैं।कांग्रेस विपक्ष ने भी विधेयक को सिलेक्ट कमिटी को भेजने की मांग की और सदन बहिष्कार किया लेकिन सरकार ने इसे खारिज कर दिया क्योंकि ग्यारह राज्यों के समान कानून सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने के बावजूद राज्य अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कानून बना सकता है। ईसाई संस्थाओं का यह तीव्र विरोध उनके एजेंडे को उजागर करता है कि वे बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के जनजातीय क्षेत्रों में निरंतर विस्तार चाहते हैं चाहे उससे सामाजिक सद्भाव बिगड़े।
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 का महत्व केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। यह कानून उन हजारों जनजातीय परिवारों की रक्षा करेगा जो गरीबी और अशिक्षा के कारण प्रलोभन का शिकार हो रहे हैं। बस्तर जैसे क्षेत्रों में जहां ग्राम सभाएं पांचवीं अनुसूची के तहत स्वशासन का अधिकार रखती हैं वहां परिवर्तनों से सामुदायिक एकता टूट रही है। विधेयक के प्रावधानों से पुलिस और प्रशासन को स्पष्ट दिशा मिलेगी कि वे मिशनरी गतिविधियों पर नजर रखें और अवैध मामलों में तुरंत कार्रवाई करें। दोहराए जाने वाले अपराधियों पर आजीवन कारावास का प्रावधान उन बड़े संगठनों को डराएगा जो विदेशी फंडिंग से संचालित होते हैं। साथ ही पीड़ितों को मुआवजा और सरकारी सहायता वापसी का प्रावधान न्यायपूर्ण संतुलन बनाएगा।
यह कानून अन्य राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश और ओडिशा के समान कानूनों से प्रेरित है लेकिन छत्तीसगढ़ की जनजातीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर और कठोर बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामलों के बावजूद राज्य सरकार का यह कदम दिखाता है कि लोकतंत्र में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कानून बनाने का अधिकार राज्य को है। ईसाई संस्थाओं का विरोध इस बात की पुष्टि करता है कि वे स्वैच्छिक परिवर्तन की बात करते हुए वास्तव में संगठित अभियान को बचाना चाहते हैं जो डेमोग्राफिक बदलाव का आधार बन रहा है।
इस विधेयक से राज्य में धार्मिक सद्भाव मजबूत होगा क्योंकि अब कोई भी धर्म का प्रचार बल या लालच के बिना ही हो सकेगा। जनजातीय संस्कृति की रक्षा होगी और युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहेगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्वैच्छिक और बिना किसी दबाव का परिवर्तन पूरी तरह वैध रहेगा लेकिन प्रलोभन आधारित गतिविधियां अब दंडनीय होंगी। यह कानून अनुच्छेद 25 की सच्ची भावना को लागू करता है जहां धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। ईसाई संगठनों का जुलूस और बयानबाजी उनके एजेंडे को उजागर करती है कि वे बिना रुकावट के जनजातीय क्षेत्रों में विस्तार चाहते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे परिवर्तन सामाजिक तनाव पैदा कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय दूरदर्शी है क्योंकि यह न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान करता है बल्कि भविष्य में डेमोग्राफिक असंतुलन को भी रोकता है। राज्य के सभी नागरिकों विशेषकर जनजातीय समुदायों को अब कानूनी सुरक्षा मिलेगी और उनकी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहेगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के जानकार हैं।
