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शांत देवस्थलों में कोलाहल से नाराज हैं आदि-देव: बालोद विवाद में मधुमक्खियों के हमले को जनजातीय समाज मान रहा दैवीय चेतावनी

बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम विवाद के बीच मधुमक्खियों के हमले को लेकर जनजातीय समाज में उभर रही मान्यताओं, देवस्थलों की पवित्रता, प्रकृति-पूजा और पारंपरिक आस्थाओं पर आधारित विश्लेषण। जानिए स्थानीय ग्रामीण इसे किस दृष्टि से देख रहे हैं।

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परंपरा से खिलवाड़ का ‘अदृश्य’ न्याय? जानिए क्यों जामड़ीपाठ के बुजुर्ग ग्रामीणों ने कहा – “नाखुश हैं हमारे प्राकृतिक देवी-देवता

बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम (जामड़ीपाठ) विवाद पर आधारित विश्लेषण, जिसमें स्थानीय ग्रामीणों, पारंपरिक आदिवासी नेतृत्व, गोंड संस्कृति, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक हस्तक्षेप को लेकर उठ रहे सवालों की पड़ताल की गई है।

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बिखरता सामाजिक ताना-बाना: राजनीतिक लाभ के लिए आपसी भाईचारे को दांव पर लगाने की साजिश

बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम विवाद के संदर्भ में सामाजिक समरसता, आदिवासी-गैर आदिवासी संबंधों, ग्रामीण सौहार्द और राजनीतिक हस्तक्षेप पर केंद्रित विश्लेषण। जानिए कैसे सामाजिक एकता और भाईचारे को लेकर बहस तेज हुई है।

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गोंड संस्कृति की सात्विकता पर प्रहार: राजनीति के लिए पवित्र परंपराओं का अवमूल्यन

गोंड संस्कृति की सात्विक परंपराओं, प्रकृति-पूजा, देवस्थलों की पवित्रता और आदिवासी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित विश्लेषण। जानिए कैसे राजनीतिक हस्तक्षेप और वैचारिक संघर्ष के आरोपों के बीच सांस्कृतिक मूल्यों पर बहस खड़ी हुई है।

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वास्तविक गोंड संस्कृति पर प्रहार: रूढ़ि-परंपरा की आड़ में नए देवताओं और रीतों का घालमेल

बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम विवाद के बहाने आदिवासी संस्कृति, गोंड परंपराओं, मूर्ति पूजा, गौरी-गौरा उत्सव और सांस्कृतिक पहचान पर उठते सवालों का विश्लेषण। जानिए मूल परंपराओं और नए वैचारिक विमर्श के बीच चल रहे संघर्ष की पड़ताल।

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भ्रामक नैरेटिव का सच: मूर्ति स्थापना से लेकर विसर्जन तक, सब आदिवासी समाज का ही निर्णय

बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम विवाद की वास्तविकता पर आधारित विश्लेषण। जानिए कैसे मूर्ति स्थापना और उससे जुड़े निर्णय स्थानीय आदिवासी समाज के थे तथा बाहरी संगठनों द्वारा फैलाए गए भ्रामक नैरेटिव और राजनीतिक एजेंडे पर उठते सवाल।

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