साहित्य

नमामि बुद्धम्

बुद्ध प्रसन्न होंगे —
जब हम धरती को
प्राण वायु देने वाले
वृक्षों से सुशोभित कर
उसे पखेरुओं का स्वतंत्र मंच दें।

बुद्ध प्रसन्न होंगे —–
जब हम पिंजरे से मुक्त करें
उन तमाम गुलाम तोतों को
जिनके छीन लिए गए हैं
पंखों का आभास
जो स्वामी होते हुए
बन बैठे हैं दास।

बुद्ध प्रसन्न होंगे ——
निर्मल सरोवरों में अधडूबे
हंसों की तैराहट पर
जिसमें खेलती हो मछलियां
निर्द्वंद, निर्विरोध, निर्विवाद

बुद्ध प्रसन्न होंगे ——–
उन तमाम मछलियों की मुक्ति से
जो अपनी नयनप्रियता और
सौंदर्य के लिए कैद हैं
शीशे के घरों में विलासिता के लिए

बुद्ध प्रसन्न होंगे ——
सींगों, छालों, जबड़े,नख ,दांतों की
तस्करी रोकने से
जीव – दस्युता की रोक में
शामिल होगा शाकाहार भी ।

बुद्ध प्रसन्न होंगे ———-
नदियों की निर्मलता से
उनके जर्जर, कर्कग्रस्त शरीर से मुक्त होने पर
जिन्हें हम केवल अपने स्वार्थ के लिए
साधते जा रहे हैं।
बालुओं का होता शहरीकरण
अंग अपहरण है नदियों का

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बुद्ध प्रसन्न होंगे ——-
जंगलों को जीवन देती प्रविधियों से।
पंचतत्वों से छेड़छाड़ पसंद नहीं
चाहे वो स्व का ही क्यों न हो?

शुभदा पांडेय