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शिलालेखों और मंदिरों के माध्यम से बारसूर के इतिहास की पुनर्स्मृति : पुस्तक चर्चा

आचार्य ललित मुनि

“बस्तर विरासत – बारसूर : चक्रकोट की राजधानी” एक अत्यंत महत्वपूर्ण, शोधपरक और संग्रहणीय कृति है, जिसमें लेखक ओमप्रकाश सोनी ने बस्तर अंचल की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और पुरातात्विक धरोहर को प्रमाणों सहित व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक केवल बारसूर नगर का इतिहास नहीं बताती, बल्कि बस्तर की उस गौरवशाली परंपरा को सामने लाती है, जिसने भारतीय संस्कृति, स्थापत्य और आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध किया।

लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि बस्तर केवल जनजातीय जीवन और प्राकृतिक सौंदर्य का क्षेत्र ही नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी भी है। बस्तर अंचल के ऐतिहासिक महत्व को स्पष्ट करते हुए लेखक लिखते हैं –

“बस्तर अंचल अपनी जनजातीय संस्कृति और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
इस क्षेत्र का इतिहास और पुरातत्व भी उतना ही रोचक है।
इस अंचल का प्रत्येक स्थल एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है,
जहाँ मंदिरों, मूर्तियों और शिलालेखों का समृद्ध संग्रह मिलता है।”

यह कथन इस पुस्तक की मूल भावना को स्पष्ट करता है कि बस्तर की पहचान केवल वर्तमान सामाजिक संरचना से नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक परंपरा से भी जुड़ी हुई है।

पुस्तक का केंद्रीय विषय बारसूर नगर है, जिसे प्राचीन काल में चक्रकोट राज्य की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी। लेखक ने ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर यह बताया है कि बारसूर नगर न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र था। इस संदर्भ में पुस्तक में उल्लेख मिलता है –

“प्राचीन काल में यह अंचल महाकांतार और चक्रकोट के नाम से जाना जाता था।
चक्रकोट राज्य पर नल, छिंदक और काकतीय राजवंशों का शासन रहा।
बारसूर नगर को कई सदियों तक चक्रकोट राज्य की राजधानी का गौरव प्राप्त था।
इस नगर का वैभव मंदिरों और स्थापत्य कला से प्रकट होता है।”

यह उद्धरण स्पष्ट करता है कि बारसूर एक समृद्ध और विकसित नगर था, जहाँ स्थापत्य कला और धार्मिक जीवन का उत्कर्ष देखने को मिलता है।

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लेखक ने पुस्तक में विभिन्न राजवंशों जैसे नल, छिंदक नागवंश, काकतीय और चालुक्य वंश का उल्लेख करते हुए यह बताया है कि बस्तर क्षेत्र सदियों तक राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा। विशेष रूप से छिंदक नागवंश के शासकों ने मंदिर निर्माण, जल प्रबंधन और धार्मिक परंपराओं को संरक्षण प्रदान किया।

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें मंदिर स्थापत्य का अत्यंत विस्तार से वर्णन किया गया है। मामा-भांजा मंदिर, बत्तीस मंदिर, गणेश मंदिर, हरिहर मंदिर और चंद्रादित्य मंदिर जैसे स्थापत्य उदाहरण इस क्षेत्र की समृद्ध कला परंपरा को दर्शाते हैं। लेखक लिखते हैं –

“बारसूर में आज भी अनेक मंदिरों, मूर्तियों तथा ऐतिहासिक तथ्यों की उपलब्धता है।
इन मंदिरों में मामा-भांजा मंदिर, बत्तीस मंदिर, गणेश मंदिर, हरिहर मंदिर आदि प्रमुख हैं।
इन मंदिरों की स्थापत्य शैली तत्कालीन कला कौशल को दर्शाती है।
मूर्तिकला और शिलालेख इस क्षेत्र के समृद्ध इतिहास का प्रमाण हैं।”

इन मंदिरों का स्थापत्य न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि उस समय की उन्नत तकनीकी दक्षता का भी परिचायक है।

पुस्तक में विशाल गणेश प्रतिमा का उल्लेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लेखक बताते हैं कि यह प्रतिमा अपने आकार और शिल्प सौंदर्य के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है और पूरे छत्तीसगढ़ में इतनी विशाल गणेश प्रतिमा अन्यत्र नहीं मिलती। यह तथ्य उस समय की मूर्तिकला के उच्च स्तर को दर्शाता है।

लेखक ने केवल मंदिरों का वर्णन ही नहीं किया, बल्कि शिलालेखों और ताम्रपत्रों के माध्यम से ऐतिहासिक तथ्यों को प्रमाणित करने का प्रयास किया है। पुस्तक में चंद्रादित्य, सोमेश्वर देव, गंगा देवी आदि शासकों से संबंधित अभिलेखों का उल्लेख मिलता है, जो तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था और धार्मिक दान परंपरा को स्पष्ट करते हैं।

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उदाहरण के रूप में चंद्रादित्य से संबंधित शिलालेख का उल्लेख महत्वपूर्ण है –

“1060 ईस्वी के शिव मंदिर अभिलेख तथा ताम्रपत्रों से चंद्रादित्य के शासन की जानकारी मिलती है।
चंद्रादित्य ने मंदिरों के रखरखाव और पूजा व्यवस्था के लिए भूमि दान किया।
शिलालेखों में दान किए गए ग्रामों का उल्लेख प्राप्त होता है।
इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक संस्थाएँ राज्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग थीं।”

इसी प्रकार बत्तीस मंदिर से संबंधित अभिलेख छिंदक शासकों की धार्मिक आस्था का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं –

“1210 ईस्वी के बत्तीस मंदिर अभिलेख से सोमेश्वर देव और गंगा देवी के शासन की जानकारी मिलती है।
इस अभिलेख से मंदिर निर्माण में राजपरिवार की भूमिका स्पष्ट होती है।
शिलालेख धार्मिक दान और सांस्कृतिक संरक्षण की परंपरा को दर्शाते हैं।
इससे तत्कालीन समाज की धार्मिक संरचना का ज्ञान प्राप्त होता है।”

इन अभिलेखों के माध्यम से पुस्तक की प्रमाणिकता और अधिक सुदृढ़ हो जाती है।

लेखक ने बस्तर क्षेत्र के ऐतिहासिक विकास को समझाने के लिए नल वंश के शासनकाल का भी उल्लेख किया है। विभिन्न ताम्रपत्रों और अभिलेखों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि इस क्षेत्र में चौथी शताब्दी से लेकर कई शताब्दियों तक विभिन्न राजवंशों का प्रभाव रहा।

“बस्तर क्षेत्र में अनेक ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थल स्थित हैं।
गाँव-गाँव में प्राचीन मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं।
इन राजवंशों के शासनकाल का प्रभाव आज भी दिखाई देता है।
यह क्षेत्र धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है।”

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि लेखक ने बारसूर के ऐतिहासिक स्थलों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया है। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि इस क्षेत्र पर पर्याप्त लेखन उपलब्ध नहीं था।

“बारसूर ऐतिहासिक विरासतों का नगर है।
इस स्थल पर किसी भी प्रकार का विस्तृत लेखन उपलब्ध नहीं था।
इस पुस्तक के माध्यम से बारसूर जैसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल को दस्तावेजीकृत किया गया है।
यह पुस्तक इतिहास, पुरातत्व और पर्यटन के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।”

पुस्तक में बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता का भी अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है। इंद्रावती नदी, चित्रकोट जलप्रपात, घने वन और पर्वतीय क्षेत्र इस स्थान को विशेष बनाते हैं। लेखक ने इतिहास और प्रकृति के इस समन्वय को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।

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लेखक ने यह भी बताया है कि बस्तर क्षेत्र में जल प्रबंधन की उन्नत परंपरा रही है। छिंदक राजाओं द्वारा निर्मित तालाब आज भी उपयोग में हैं, जो उस समय की दूरदर्शी योजना को दर्शाते हैं।

पुस्तक की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और तथ्यपरक है। लेखक ने जटिल ऐतिहासिक तथ्यों को भी सहज शैली में प्रस्तुत किया है, जिससे सामान्य पाठक भी विषय को आसानी से समझ सकता है।

यह पुस्तक इतिहासकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, पर्यटन विशेषज्ञों तथा संस्कृति प्रेमियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इसमें प्रस्तुत शिलालेखों के संदर्भ पुस्तक की विश्वसनीयता को और अधिक मजबूत करते हैं।

समग्र रूप से यह कहा जा सकता है कि “बस्तर विरासत – बारसूर : चक्रकोट की राजधानी” बस्तर की ऐतिहासिक पहचान को पुनः स्थापित करने वाली अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। लेखक ने प्रमाणिक स्रोतों, शिलालेखों, मंदिरों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर बारसूर के गौरव को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया है।

यह पुस्तक न केवल अतीत की स्मृतियों को सुरक्षित करती है, बल्कि भविष्य के शोध कार्यों के लिए भी मार्ग प्रशस्त करती है। बस्तर की ऐतिहासिक धरोहर को समझने के लिए यह कृति एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्थापित होती है।

आचार्य ललित मुनि

पुस्तक- “बस्तर विरासत – बारसूर : चक्रकोट की राजधानी
लेखक – ओमप्रकाश सोनी
प्रकाशक- सरस्वती बुक्स भिलाई,
मुल्य – 250/-