अभयारण्य में भी बाघों को अभय नहीं
-सम्पादकीय
देश में बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की जैव विविधता, पर्यावरणीय संतुलन और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर चलाए जा रहे “प्रोजेक्ट टाइगर” का उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित आवास और संरक्षण की ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिस पर देश और दुनिया भरोसा कर सके। लेकिन इंद्रावती टाइगर रिजर्व में कैमरा ट्रैप की सूचनाएँ और बाघों की गतिविधियों का विवरण स्वयं वन विभाग के कुछ कर्मचारियों के माध्यम से शिकारियों तक पहुँचता रहा, तो यह केवल तीन बाघों की हत्या नहीं, बल्कि पूरे संरक्षण तंत्र की हत्या है।
वन विभाग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जंगल की रक्षा करना है। यदि उसी विभाग के भीतर बैठे लोग शिकारी गिरोहों के लिए “सूचना तंत्र” बन जाएँ, तो फिर जंगल को बचाने की उम्मीद किससे की जाए? यह अपराध किसी एक कर्मचारी की व्यक्तिगत गलती नहीं माना जा सकता। यह उस प्रशासनिक संस्कृति का परिणाम है, जहाँ जवाबदेही धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है और भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।
यह भी गंभीर प्रश्न है कि कैमरा ट्रैप जैसी अत्याधुनिक तकनीक, जिसे वन्यजीव संरक्षण का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है, वही तकनीक यदि शिकारियों के लिए “लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम” बन जाए तो तकनीक का नहीं, बल्कि उसे संचालित करने वाली व्यवस्था का दिवालियापन सामने आता है। तकनीक कभी अपराधी नहीं होती, उसका दुरुपयोग करने वाला तंत्र अपराधी होता है।
और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि कैमरों में अप्रैल और मई के दौरान बाघों की गतिविधियाँ रिकॉर्ड हुईं और उसके बाद शिकार की घटनाएँ सामने आईं। यदि यह घटनाक्रम सही है तो यह केवल संयोग नहीं कहा जा सकता। इससे यह संदेह और मजबूत होता है कि सूचना लीक होने का सिलसिला लंबे समय से चल रहा था। यदि ऐसा था तो उच्च अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था कहाँ थी? क्या किसी ने कैमरा डेटा तक पहुँच रखने वाले कर्मचारियों का ऑडिट किया? क्या संवेदनशील सूचनाओं की डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित की गई? यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर संस्थागत विफलता है।
वन विभाग में वर्षों से एक समस्या दिखाई देती रही है। अधिकांश मामलों में छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर दिया जाता है, विभागीय जांच बैठ जाती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इतने बड़े शिकारी नेटवर्क बिना उच्च स्तर की जानकारी या संरक्षण के वर्षों तक सक्रिय रह सकते हैं? यदि उत्तर “नहीं” है, तो कार्रवाई भी उसी स्तर तक पहुँचनी चाहिए जहाँ से जवाबदेही तय होती है।
इंद्रावती टाइगर रिजर्व पहले ही नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण अनेक चुनौतियों से जूझता रहा है। ऐसे क्षेत्र में वन कर्मचारियों का कार्य कठिन अवश्य है, लेकिन कठिन परिस्थितियाँ भ्रष्टाचार का लाइसेंस नहीं बन सकतीं। यदि सुरक्षा जोखिम अधिक हैं तो शासन का दायित्व भी उतना ही अधिक हो जाता है कि वह आधुनिक निगरानी, स्वतंत्र ऑडिट और पारदर्शी नियंत्रण व्यवस्था विकसित करे।
यह घटना शासन व्यवस्था पर भी उतना ही बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। क्या राज्य सरकारों ने वन विभाग को केवल बजट और योजनाओं तक सीमित कर दिया है? क्या नियमित सामाजिक और तकनीकी ऑडिट होते हैं? क्या टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों की समय-समय पर पृष्ठभूमि, संपत्ति और गतिविधियों की समीक्षा होती है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है तो सुधार की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए।
आज आवश्यकता केवल दोषियों को गिरफ्तार करने की नहीं, बल्कि पूरे वन प्रशासन में संरचनात्मक सुधार की है। कैमरा ट्रैप डेटा तक सीमित और डिजिटल रूप से सुरक्षित पहुँच हो। प्रत्येक कैमरे की गतिविधि का लॉग तैयार हो। संवेदनशील सूचनाओं का एन्क्रिप्शन अनिवार्य किया जाए। स्वतंत्र एजेंसियों से समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। जिन क्षेत्रों में संगठित शिकारी गिरोह सक्रिय हैं, वहाँ वन विभाग, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच वास्तविक समन्वय स्थापित किया जाए। साथ ही, स्थानीय वनवासियों और ग्राम समितियों को संरक्षण का भागीदार बनाया जाए, क्योंकि जंगल की पहली सुरक्षा पंक्ति वही लोग हैं।
इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। क्या हम वन्यजीव अपराधों को अभी भी सामान्य अपराध मानते रहेंगे? बाघ का शिकार केवल वन्यजीव संरक्षण कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राकृतिक धरोहर पर हमला है। ऐसे मामलों में त्वरित विशेष न्यायालय, आर्थिक संपत्ति की जब्ती और संगठित अपराध के समान कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है।
यदि इस घटना के बाद भी केवल निलंबन, जांच और औपचारिक बयानबाजी तक कार्रवाई सीमित रही, तो यह मान लेना चाहिए कि अगला कैमरा किसी और बाघ की अंतिम तस्वीर रिकॉर्ड करने की प्रतीक्षा कर रहा है। तब दोष केवल शिकारी का नहीं होगा, बल्कि उस व्यवस्था का भी होगा जिसने जंगल के सबसे बड़े रक्षकों को ही सबसे कमजोर कड़ी बनने दिया।
सम्पादक

