भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून क्यों आवश्यक है?

संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार भारत चीन को पीछे छोड़कर विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। जनसंख्या के आंकड़ों में प्रथम स्थान प्राप्त करना गर्व का विषय नहीं, बल्कि गंभीर चिंतन और दूरगामी नीति निर्माण का प्रश्न है। किसी देश की वास्तविक शक्ति केवल उसके नागरिकों की संख्या से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से निर्धारित होती है कि वह अपने नागरिकों को कैसी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार, आवास और जीवन स्तर उपलब्ध करा पा रहा है। जब जनसंख्या का आकार उपलब्ध संसाधनों और व्यवस्थाओं की क्षमता से अधिक होने लगे, तब बड़ी जनसंख्या शक्ति बनने के बजाय विकास की गति को प्रभावित करने लगती है।
भारत के सामने आज यही गंभीर चुनौती दिखाई दे रही है। जल, भूमि, वन, ऊर्जा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे बुनियादी संसाधनों तथा सुविधाओं पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग को केवल राजनीतिक बहस या चुनावी मुद्दे के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह देश के संसाधनों, विकास की प्राथमिकताओं और भावी पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
भारत का भूभाग विश्व के कुल भूभाग का लगभग ढाई प्रतिशत है, जबकि यहां विश्व की लगभग सत्रह प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। यह असंतुलन स्वयं बताता है कि भारत के सामने जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती कितनी गंभीर है। देश के पास भूमि सीमित है, जल स्रोत सीमित हैं और वन क्षेत्र को भी अनंत सीमा तक नहीं बढ़ाया जा सकता। दूसरी ओर जनसंख्या का दबाव निरंतर बढ़ने से इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता लगातार कम होती जाती है।
देश के अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर नीचे जा रहा है। कृषि योग्य भूमि पर शहरों, उद्योगों, सड़कों और अन्य निर्माण कार्यों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। महानगरों के आसपास की उपजाऊ कृषि भूमि तेजी से आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों में परिवर्तित हो रही है। शहरों की सीमाएं गांवों को निगल रही हैं और दूसरी ओर खाद्यान्न की मांग लगातार बढ़ रही है। यह विरोधाभास भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव केवल प्राकृतिक संसाधनों पर ही नहीं पड़ता। इसका सीधा संबंध नागरिक सुविधाओं की उपलब्धता से भी है। यदि किसी शहर की सड़कें, अस्पताल, विद्यालय, जलापूर्ति और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दस लाख लोगों की आवश्यकता के अनुसार विकसित की गई हो और कुछ वर्षों में वहां की जनसंख्या बीस लाख हो जाए, तो स्वाभाविक रूप से पूरी व्यवस्था दबाव में आ जाएगी। भारत के अनेक महानगरों में यातायात जाम, झुग्गी बस्तियों का विस्तार, वायु प्रदूषण, पेयजल संकट और सरकारी अस्पतालों में बढ़ती भीड़ इसी असंतुलन के अलग-अलग रूप हैं।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। युवा जनसंख्या को सामान्यतः देश की शक्ति कहा जाता है, लेकिन यह शक्ति तभी उपयोगी सिद्ध होती है, जब युवाओं के पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार उपलब्ध हों। केवल युवा जनसंख्या की विशाल संख्या अपने आप में जनसांख्यिकीय लाभांश नहीं बन जाती।
हर वर्ष बड़ी संख्या में युवा रोजगार के बाजार में प्रवेश करते हैं। अर्थव्यवस्था के लिए इतनी बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराना आसान नहीं है। रोजगार की तलाश में गांवों और छोटे शहरों से महानगरों की ओर होने वाला पलायन शहरों पर अतिरिक्त दबाव पैदा करता है। दूसरी ओर गांवों में कृषि भूमि के विभाजन के कारण जोत का आकार लगातार छोटा होता जाता है और परिवार के सभी सदस्यों के लिए खेती से सम्मानजनक आय प्राप्त करना कठिन होता जाता है।
यदि परिवार का आकार छोटा हो तो माता-पिता अपनी आय और संसाधनों का बेहतर उपयोग बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर कर सकते हैं। इसके विपरीत अत्यधिक बड़े परिवार में सीमित आय का बंटवारा अधिक सदस्यों के बीच होता है। इस प्रकार जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न केवल राष्ट्रीय संसाधनों से नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक समृद्धि और अगली पीढ़ी के जीवन स्तर से भी जुड़ा हुआ है।
भारत में जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कानून की मांग अचानक उत्पन्न हुआ विचार नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से संसद में अनेक बार दो बच्चों की नीति और जनसंख्या स्थिरीकरण से संबंधित निजी विधेयक प्रस्तुत किए गए हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस प्रकार की पहल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रही है। अलग-अलग समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कानूनी उपायों की आवश्यकता पर बल दिया है।
वर्ष 2019 में राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा ने जनसंख्या विनियमन से संबंधित निजी विधेयक प्रस्तुत किया था। इसमें छोटे परिवार को प्रोत्साहित करने और सरकारी कर्मचारियों को दो से अधिक संतान पैदा करने से हतोत्साहित करने जैसे प्रावधानों की चर्चा हुई। इसके बाद भी संसद में इस विषय पर निजी विधेयक और प्रस्ताव सामने आते रहे हैं।
इन प्रयासों से स्पष्ट है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। जनप्रतिनिधियों का एक वर्ग लंबे समय से यह महसूस करता रहा है कि केवल जागरूकता अभियानों के भरोसे देश की विशाल जनसंख्या से उत्पन्न चुनौतियों का समाधान पर्याप्त गति से नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रोत्साहन, उत्तरदायित्व और आवश्यक कानूनी व्यवस्था को एक साथ जोड़ने की आवश्यकता है।
केंद्रीय स्तर पर व्यापक जनसंख्या नियंत्रण कानून नहीं बनने के बावजूद अनेक राज्यों ने अपने स्तर पर छोटे परिवार को प्रोत्साहित करने के लिए अलग-अलग प्रावधान लागू किए हैं। कई राज्यों में पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनावों के संदर्भ में दो संतान से संबंधित पात्रता की शर्तें अलग-अलग समय पर लागू की गई हैं। कुछ राज्यों ने सरकारी नौकरियों और अन्य सुविधाओं के संदर्भ में भी जनसंख्या नीति से जुड़े प्रावधानों पर विचार किया है।
उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने वर्ष 2021 में जनसंख्या नियंत्रण, स्थिरीकरण एवं कल्याण से संबंधित विधेयक का प्रारूप तैयार किया था। इसमें दो बच्चों के मानक को प्रोत्साहित करने के साथ विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहन और कुछ प्रतिबंधों का प्रस्ताव रखा गया था। इसी अवधि में उत्तर प्रदेश की जनसंख्या नीति 2021-2030 भी सामने आई, जिसमें प्रजनन दर को कम करने और परिवार नियोजन सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया।
राज्य स्तर पर हुए इन प्रयासों का महत्व इस बात में है कि उन्होंने जनसंख्या को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाया। लंबे समय तक परिवार के आकार को पूरी तरह निजी प्रश्न मानकर छोड़ दिया गया, जबकि उसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पूरे समाज को प्रभावित करते हैं। किसी परिवार में बच्चों की संख्या का निर्णय व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन जब करोड़ों परिवारों के निर्णय मिलकर शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्यान्न, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों की राष्ट्रीय मांग निर्धारित करते हैं, तब जनसंख्या का प्रश्न सार्वजनिक नीति का विषय भी बन जाता है।
जनसंख्या नियंत्रण कानून के विरोध में सबसे प्रमुख तर्क यह दिया जाता है कि भारत की कुल प्रजनन दर घटकर प्रतिस्थापन स्तर के आसपास पहुंच चुकी है, इसलिए अब किसी कानून की आवश्यकता नहीं है। यह तर्क पहली दृष्टि में प्रभावशाली दिखाई देता है, लेकिन भारत की वास्तविक परिस्थितियों को केवल राष्ट्रीय औसत के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की जनसांख्यिकीय परिस्थितियां समान नहीं हैं। अनेक राज्यों ने शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार नियोजन के माध्यम से प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी प्राप्त की है, जबकि कुछ क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि की गति अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है। राष्ट्रीय औसत इन क्षेत्रीय अंतरों को छिपा देता है।
जनसंख्या नियंत्रण की नीति पर विचार करते समय एक व्यावहारिक पक्ष की उपेक्षा नहीं की जा सकती। समाज में एक ऐसा वर्ग भी है, जिसके परिवार संबंधी निर्णयों पर सरकारी सुविधाओं, आर्थिक प्रोत्साहनों अथवा सुविधाएं वापस लेने जैसे उपायों का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता। सामाजिक मान्यताओं, परिवार नियोजन के प्रति उदासीनता और भविष्य की आर्थिक असुरक्षा जैसे अनेक कारणों से कुछ परिवार अधिक संतान को समस्या के रूप में देखते ही नहीं हैं। ऐसे परिवार सरकारी नौकरी, चुनाव लड़ने की पात्रता अथवा कुछ विशेष सरकारी सुविधाओं से वंचित होने के बाद भी परिवार का आकार सीमित करने के लिए तैयार नहीं होते।
यही कारण है कि जनसंख्या नियंत्रण की कोई भी नीति केवल सरकारी कर्मचारियों, चुनाव लड़ने के इच्छुक व्यक्तियों अथवा सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि कानून का प्रभाव केवल संगठित और औपचारिक व्यवस्था से जुड़े नागरिकों पर पड़ेगा, जबकि बड़ी संख्या में लोग उसके प्रभाव क्षेत्र से बाहर रहेंगे, तो कानून अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाएगा। ऐसी स्थिति में नियमों का पालन करने वाले परिवार तो अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे, लेकिन जनसंख्या वृद्धि की वास्तविक चुनौती वाले क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आएगा।
इसलिए आवश्यक है कि प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण कानून पूरे देश के लिए स्पष्ट और समान सिद्धांतों पर आधारित हो। इसके साथ शिक्षा, विशेषकर महिला शिक्षा, विवाह की उचित आयु, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, परिवार नियोजन के साधनों की सहज उपलब्धता और छोटे परिवार के सामाजिक तथा आर्थिक लाभों के प्रति व्यापक जागरूकता को जोड़ा जाना चाहिए। कानून का उद्देश्य केवल सरकारी सुविधाओं से वंचित करना नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक वातावरण तैयार करना होना चाहिए जिसमें सीमित परिवार को जिम्मेदार नागरिक आचरण के रूप में स्वीकार किया जाए।
लोकतांत्रिक समाज में नागरिक अधिकारों का सम्मान सर्वोपरि है। परिवार और संतान से जुड़े निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्वपूर्ण विषय हैं। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न भी जुड़ा रहता है।
यदि सरकार प्रत्येक नागरिक को भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार के अवसर और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए उत्तरदायी है, तो नागरिक समाज को भी सीमित संसाधनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जनसंख्या नियंत्रण कानून का उद्देश्य नागरिकों के निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि छोटे और सक्षम परिवार की सामाजिक अवधारणा को मजबूत करना होना चाहिए।
इस कानून में दंडात्मक प्रावधानों से अधिक प्रोत्साहन आधारित व्यवस्था पर बल दिया जा सकता है। दो बच्चों के मानक का पालन करने वाले परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अन्य सुविधाओं में विशेष प्रोत्साहन दिया जा सकता है। साथ ही महिलाओं को परिवार नियोजन संबंधी निर्णयों में वास्तविक अधिकार देना आवश्यक है। कानून तभी प्रभावी होगा जब उसके साथ शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार भी हो।
भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग सीमित संसाधनों, बढ़ते शहरीकरण, रोजगार की चुनौतियों, कृषि भूमि पर बढ़ते दबाव और नागरिक सुविधाओं की सीमित क्षमता से उत्पन्न हुई है। यह केवल जनसंख्या की संख्या कम करने का प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता सुधारने, प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और भावी पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करने का विषय है। समय की मांग है कि भारत जनसंख्या के प्रश्न को भविष्य के भरोसे छोड़ने के बजाय एक संतुलित, मानवीय और प्रभावी कानूनी व्यवस्था की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़े।

