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गडकरी जी, E20 लागू कीजिए, लेकिन मेरी पुरानी कार का क्या होगा?

आचार्य ललित मुनि

भारत में कार खरीदना आज भी सामान्य परिवार के लिए बहुत बड़ा आर्थिक एवं पारिवारिक निर्णय है। व्यक्ति नौकरी या धंधे से वर्षों में बचत करता है। डाउन पेमेंट के लिए पैसे जोड़ता है। फिर पांच से सात वर्ष तक मासिक किस्त चुकाता है। कई परिवारों में कार खरीदने का निर्णय बच्चों की पढ़ाई, मकान की किस्त और घरेलू खर्च का हिसाब लगाकर किया जाता है। कई लोग पाई पाई जोड़कर बड़ा आदमी बनने के लिए भी पुरानी कार ले लेते हैं, जिसे कभी कभी चलाते हैं, जो हमेशा दुआरे पर खड़ी दिखाई देती है। अब इन पुराने वाहनों का क्या होगा?

भारत में E20 पेट्रोल के बढ़ते चलन और सरकार के दावों के बीच यह प्रश्न उन करोड़ों वाहन मालिकों का है, जिनके वाहन इस नए ईंधन के अनुकूल नहीं हैं। एक सामान्य भारतीय परिवार के लिए कार केवल आवागमन का माध्यम नहीं होती, बल्कि वर्षों की कड़ी मेहनत और बचत का परिणाम होती है। परिवार अपनी बुनियादी जरूरतों, बच्चों की शिक्षा और अन्य खर्चों में कटौती करके एक कार का सपना पूरा करते हैं। ऐसे में अचानक ईंधन नीति बदलकर यह अपेक्षा करना कि वे अपनी चलती हुई गाड़ी के भविष्य के प्रति खुद चिंतित हों, एक बड़ी चिंता का विषय है।

जब लोगों ने अपनी गाड़ियाँ खरीदी थीं, तब वे सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मानकों के अनुरूप थीं। उन्होंने पंजीकरण शुल्क, रोड टैक्स, बीमा और अन्य सभी सरकारी करों का भुगतान किया था। उस समय उपलब्ध ईंधन के आधार पर ही इन वाहनों का निर्माण हुआ था। ऐसे में, ईंधन के स्वरूप में बदलाव का पूरा जोखिम वाहन मालिक पर डाल देना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं लगता।

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भारत में सेकंड हैंड कारों का एक विशाल बाजार है, जो नई कारों की तुलना में कहीं अधिक बड़ा है। मध्यम और निम्न मध्यमवर्ग के लिए पुरानी कार खरीदना मजबूरी नहीं, बल्कि एक आर्थिक वास्तविकता है। कस्बों और छोटे शहरों में यही वाहन बच्चों को स्कूल छोड़ने, परिवार को अस्पताल ले जाने और कई लोगों के लिए आजीविका का साधन बनते हैं। यदि यह कार E20 के अनुकूल नहीं है, तो मालिक क्या करे? क्या वह अपनी गाड़ी को कबाड़ में बदल दे या फिर से भारी कर्ज लेकर नई गाड़ी खरीदे? सरकार के पास इन सवालों का ठोस उत्तर होना चाहिए।

वाहन उद्योग का दावा है कि E20 से इंजन खराब होने का कोई बड़ा प्रमाण नहीं है और माइलेज में मामूली कमी की संभावना है। किंतु, उपभोक्ता की चिंता केवल इंजन तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक E20 के उपयोग से ईंधन पाइप, रबर सील, गैस्केट, फ्यूल पंप और इंजेक्टर जैसे पुर्जों की उम्र पर क्या असर पड़ेगा? यदि कोई पुर्जा जो पांच साल चलना चाहिए था, वह ईंधन के कारण तीन साल में ही खराब हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? यदि कंपनियां और सरकार आश्वस्त हैं कि कोई नुकसान नहीं होगा, तो वे इसकी लिखित जिम्मेदारी क्यों नहीं लेतीं? यदि किसी वाहन की ईंधन प्रणाली में खराबी आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और मरम्मत के खर्च का वहन सरकार या निर्माता कंपनियों को करना चाहिए।

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आज के समय में नई कारें खरीदना पहले की तुलना में बहुत महंगा हो गया है। पिछले तीन वर्षों में ही नई कारों की कीमतों में भारी उछाल आया है। ऐसे में किसी पुरानी गाड़ी के मालिक को नई कार खरीदने की सलाह देना सुनने में तो सरल लगता है, लेकिन लाखों रुपये जुटाना आम आदमी के लिए बेहद कठिन है।

राष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोलियम आयात कम करना, वैकल्पिक ईंधन विकसित करना और किसानों को लाभ पहुंचाना निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम हैं। लेकिन किसी भी नीति का पूरा आर्थिक बोझ केवल एक वर्ग पर नहीं डाला जा सकता। यदि E20 से देश को विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है, तो उस बचत का एक हिस्सा पुराने वाहन मालिकों को संक्रमण के दौर से उबारने के लिए खर्च किया जाना चाहिए।

सरकार को प्रत्येक वाहन के मॉडल और निर्माण वर्ष के अनुसार उसकी E20 अनुकूलता का एक सार्वजनिक डेटाबेस जारी करना चाहिए। जो वाहन अनुकूल नहीं हैं, उनके लिए एक संक्रमण अवधि तक वैकल्पिक ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। साथ ही, पुर्जों को बदलकर वाहन को अनुकूल बनाने के लिए रियायती रेट्रोफिट योजनाएं शुरू की जानी चाहिए।

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पुराने वाहन मालिक इस समय एक अजीब से संकट में फंसे हैं। एक तरफ स्क्रैपिंग नीति का दबाव है, दूसरी तरफ ईंधन में हो रहा बदलाव है और तीसरी तरफ नई कारों की आसमान छूती कीमतें हैं। यदि कोई वाहन कानूनी रूप से फिट है, उसका प्रदूषण प्रमाणपत्र वैध है और वह सड़क पर चलने योग्य है, तो तकनीकी बदलाव के कारण उसकी उपयोगिता को कम करना न्यायसंगत नहीं है। पुरानी कार को समय से पहले कबाड़ बनाना भी पर्यावरण के दृष्टिकोण से हमेशा हितैषी नहीं होता, क्योंकि नई कार के निर्माण में भी बड़ी मात्रा में संसाधनों का उपयोग होता है।

सरकार को इस दिशा में स्पष्ट और जवाबदेह नीति बनानी होगी। E20 का विरोध एथेनॉल का विरोध नहीं है, बल्कि यह न्यायपूर्ण परिवर्तन की मांग है। लाभ पूरे देश को मिल रहा है, तो इसकी लागत केवल पुराने वाहन मालिक से क्यों वसूली जाए? सरकार E20 लागू करे, लेकिन पुराने वाहन मालिकों को विकल्प दे, तकनीकी सहायता उपलब्ध कराए और संभावित नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी ले। बिना इस प्रश्न का उत्तर दिए कि खराबी आने पर मरम्मत का बिल कौन भरेगा, इस नीति को पूरी तरह उपभोक्ता के हित में नहीं कहा जा सकता।