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कश्मीर के पूर्ण एकीकरण का वैचारिक आधार : डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी

आचार्य ललित मुनि

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी प्रसिद्ध शिक्षाविद् और न्यायाधीश सर आशुतोष मुखर्जी के पुत्र थे। उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता में हुआ था। वे उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। यह उपलब्धि भारतीय शिक्षा के इतिहास में अद्वितीय मानी जाती है। शिक्षा जगत में उनकी प्रतिष्ठा के बाद भी उनका मन राजनीति और राष्ट्र सेवा की ओर उन्मुख रहा। वे हिंदू महासभा में सक्रिय रहे और बाद में भारतीय जनसंघ के संस्थापक बने।

स्वतंत्रता के बाद जब देश विभाजन की त्रासदी से गुजर रहा था, कश्मीर का मुद्दा अत्यंत जटिल रूप ले चुका था। महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। यह विलय पूर्ण और बिना शर्त था। किंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच हुई सहमति के परिणामस्वरूप जम्मू कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के माध्यम से विशेष दर्जा प्रदान किया गया। यह अनुच्छेद एक अस्थायी प्रावधान के रूप में था, किंतु यह धीरे धीरे स्थायी स्वरूप लेता गया।

डॉ मुखर्जी ने प्रारंभ से ही इस व्यवस्था का विरोध किया। उनका स्पष्ट मत था कि एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं हो सकते। उन्होंने संसद में इस मुद्दे को बल प्रदान किया। 26 जून 1952 को लोकसभा में अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि कश्मीर की समस्या का समाधान केवल पूर्ण एकीकरण में निहित है। उनका यह विचार भारतीय संविधान की समानता और एकता के मूल सिद्धांतों पर आधारित था।

अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर के नागरिकों को विशेष अधिकार प्राप्त थे। भारत के अन्य नागरिक वहाँ संपत्ति नहीं खरीद सकते थे। राज्य का अलग संविधान और अलग ध्वज था। यह स्थिति संघीय ढांचे में एक विसंगति थी। डॉ मुखर्जी ने इसे राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा माना। उन्होंने तर्क दिया कि यदि एक राज्य को विशेष दर्जा मिलता है तो यह अलगाववाद की भावना को बढ़ावा दे सकता है। उनका विश्वास था कि समानता ही स्थायी एकता का आधार है।

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तत्कालीन राजनीतिक परिवेश में कश्मीर मुद्दे पर खुलकर बोलना साहस का कार्य था। नेहरू सरकार शेख अब्दुल्ला की स्वायत्तता की मांग को स्वीकार कर रही थी। शेख अब्दुल्ला का प्रभाव घाटी में अत्यधिक था। किंतु डॉ मुखर्जी ने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानते हुए अपना मत स्पष्ट रखा। उन्होंने कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इसे वैसे ही व्यवहार में लाया जाना चाहिए जैसे देश के अन्य राज्यों को।

1953 में डॉ मुखर्जी ने कश्मीर जाने का निर्णय लिया। उनका उद्देश्य स्थानीय जनता से मिलना और वहाँ की वास्तविक स्थिति को समझना था। उस समय जम्मू कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट की आवश्यकता होती थी। यह व्यवस्था भारतीय नागरिकों के लिए अपमानजनक थी। डॉ मुखर्जी ने बिना परमिट के ही कश्मीर जाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक को अपने ही देश में घूमने के लिए परमिट की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए।

11 मई 1953 को डॉ मुखर्जी जम्मू पहुंचे। उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर राज्य में अशांति फैलाने का आरोप लगाया गया। उन्हें श्रीनगर की एक कोठी में नजरबंद कर दिया गया। उनके साथियों और परिवार को उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई। स्वास्थ्य की स्थिति बिगड़ने पर भी उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।

उनके निधन की परिस्थितियाँ आज भी विवाद का विषय हैं। सरकारी रिपोर्ट में हृदयाघात बताया गया, किंतु उनके परिजनों और समर्थकों ने इस पर प्रश्न उठाए। अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में इस मुद्दे को उठाया और न्यायिक जांच की मांग की। अनेक इतिहासकार मानते हैं कि उनकी मृत्यु के पीछे राजनीतिक षड्यंत्र हो सकता है। जो भी हो, डॉ मुखर्जी ने अपने सिद्धांतों के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

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उनके विचारों पर अनेक राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने टिप्पणी की है। अटल बिहारी वाजपेयी ने डॉ मुखर्जी को एक सच्चे देशभक्त और दूरदर्शी नेता बताया। वाजपेयी ने कहा था कि डॉ मुखर्जी ने जो बात 1953 में कही थी, वह आज भी प्रासंगिक है। लाल कृष्ण आडवाणी ने उन्हें जनसंघ और राष्ट्रवादी विचारधारा का आधार स्तंभ माना। उन्होंने कहा कि डॉ मुखर्जी ने राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर कभी समझौता नहीं किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अनेक अवसरों पर डॉ मुखर्जी को श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने कहा कि डॉ मुखर्जी की दृष्टि स्पष्ट थी और उन्होंने देश के भविष्य को देखते हुए निर्णय लिए। 5 अगस्त 2019 को जब अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया, तब प्रधानमंत्री ने डॉ मुखर्जी के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि आज उस सपने को साकार किया गया है जिसके लिए डॉ मुखर्जी ने अपना जीवन समर्पित कर दिया था।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी डॉ मुखर्जी को एक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व बताया। उन्होंने कहा कि भले ही राजनीतिक विचारधारा में मतभेद हो, किंतु डॉ मुखर्जी की देशभक्ति और बौद्धिक क्षमता निर्विवाद है। उनकी शिक्षा और प्रशासन में योगदान भी उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित बनाया।

राजनीतिक विश्लेषक और इतिहासकार भी डॉ मुखर्जी के योगदान को महत्वपूर्ण मानते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार आरसी मजूमदार ने लिखा कि डॉ मुखर्जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे शिक्षाविद्, राजनेता और विचारक तीनों रूपों में सफल रहे। उनका कश्मीर पर दृष्टिकोण भावनात्मक नहीं, बल्कि संवैधानिक और तार्किक था। वे मानते थे कि कानून की दृष्टि से सभी राज्य समान होने चाहिए।

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डॉ मुखर्जी का वैचारिक आधार भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक और संवैधानिक समझ पर टिका था। वे मानते थे कि भारत की विविधता उसकी शक्ति है, किंतु इसका अर्थ कानूनी विभाजन नहीं होना चाहिए। उन्होंने हिंदू कोड बिल पर भी नेहरू से मतभेद रखा था। 1950 में उन्होंने नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। वे उन नेताओं में से थे जिन्होंने सिद्धांत के लिए पद का त्याग किया।

जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुई थी। डॉ मुखर्जी इसके प्रथम अध्यक्ष बने। उन्होंने संगठन को विचारधारा और अनुशासन का आधार दिया। जनसंघ ने कश्मीर, एकात्म मानववाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपने मुख्य सिद्धांतों में शामिल किया। आज का भारतीय जनता पार्ति उसी विचारधारा की विकसित रूप है।

उनके बलिदान ने कश्मीर मुद्दे को राष्ट्रीय चेतना में स्थायी रूप से स्थापित कर दिया। अनेक दशकों तक यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहा। समय समय पर अलगाववादी आंदोलन, आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता ने कश्मीर को चुनौती दी। किंतु डॉ मुखर्जी का विचार निरंतर प्रेरणा देता रहा।

5 अगस्त 2019 को जब भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त किया, तो यह डॉ मुखर्जी की दृष्टि का ऐतिहासिक साकार होना था। जम्मू कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। अब वहाँ भारत के संविधान और कानून पूर्ण रूप से लागू हैं। यह निर्णय राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है।

डॉ मुखर्जी की विरासत केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। उन्होंने राजनीति में सिद्धांतवादिता की नींव रखी। उन्होंने दिखाया कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, किंतु राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होना चाहिए। उन्होंने बौद्धिक विमर्श को राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाया।