महाप्रभु जगन्नाथ के रथ निर्माण की प्राचीन परम्परा

महाप्रभु जगन्नाथ के रथ निर्माण की प्राचीन परम्परा
भारतीय संस्कृति में ऐसे अनेक पर्व हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहते, बल्कि समाज, संस्कृति, कला और लोकजीवन के विराट उत्सव बन जाते हैं। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा ऐसा ही एक महापर्व है, जो सदियों से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है। पूर्वी भारत के ओड़िशा राज्य में समुद्र तट पर बसे श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में आयोजित होने वाली यह रथयात्रा केवल उत्कल प्रदेश की पहचान नहीं है, बल्कि संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन परंपरा का जीता जागता प्रतीक बन चुकी है।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रारंभ होने वाली यह यात्रा संसार की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। इस अवसर पर देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुँचते हैं। भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा तीन भव्य रथों में विराजमान होकर श्रीमंदिर से निकलते हैं और गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा करते हैं। यह यात्रा केवल देव विग्रहों का स्थान परिवर्तन मात्र नहीं है, बल्कि ईश्वर और भक्त के बीच प्रेम, समानता और सुलभता का अद्भुत संदेश भी है।
भगवान स्वयं भक्तों के बीच आते हैं
सनातन परंपरा में सामान्यतः भक्त भगवान के दर्शन के लिए मंदिर जाते हैं, किंतु जगन्नाथ रथयात्रा की विशेषता यह है कि यहाँ भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच चलकर आते हैं। लोकमान्यता है कि जो लोग किसी कारणवश मंदिर में प्रवेश कर भगवान के दर्शन नहीं कर पाते, उन्हें दर्शन देने के लिए महाप्रभु वर्ष में एक बार मंदिर से बाहर निकलते हैं।
इस प्रकार रथयात्रा सामाजिक समरसता और सर्वसुलभ भक्ति का संदेश देती है। जाति, वर्ग, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्र की सीमाएँ यहाँ मिट जाती हैं। भगवान के रथ को खींचने का अधिकार और सौभाग्य सभी को समान रूप से प्राप्त होता है। यही समरसता इस पर्व को केवल एक धार्मिक आयोजन से कहीं आगे ले जाती है और इसे भारत की सामूहिक चेतना का प्रतीक बना देती है।
तीन रथों की अद्भुत भव्यता
रथयात्रा के लिए प्रत्येक वर्ष तीन नए रथों का निर्माण किया जाता है। इन रथों का आकार, ऊँचाई और स्वरूप देखने वालों को चकित कर देता है।
नंदीघोष – यह भगवान जगन्नाथ का रथ है। इसकी ऊँचाई लगभग साढ़े पैंतालीस फीट होती है तथा इसमें सोलह विशाल पहिए लगाए जाते हैं। यह तीनों रथों में सबसे बड़ा और सबसे आकर्षक माना जाता है।
तालध्वज – यह भगवान बलभद्र का रथ है। इसकी ऊँचाई लगभग पैंतालीस फीट होती है और इसमें चौदह पहिए होते हैं।
दर्पदलन – इसे देवदलन के नाम से भी जाना जाता है और यह देवी सुभद्रा का रथ है। इसकी ऊँचाई लगभग साढ़े चवालीस फीट होती है तथा इसमें बारह पहिए लगाए जाते हैं।
इन तीनों रथों के आयाम, संरचना, रंग, प्रतीक और सजावट सदियों से निर्धारित हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन मापों में परंपरा के अनुसार कोई परिवर्तन नहीं किया जाता। रथ निर्माण में आज भी वही प्राचीन मानक अपनाए जाते हैं जो पूर्वजों ने तय किए थे। यह निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि भारतीय शिल्प परंपरा में मौखिक और व्यावहारिक ज्ञान किस प्रकार पीढ़ियों तक अक्षुण्ण बना रहता है।
रथ निर्माण की परंपरा
जगन्नाथ रथयात्रा का सबसे रोचक पक्ष रथ निर्माण की प्रक्रिया है। अधिकांश लोग केवल रथयात्रा देखते हैं, परंतु उन विशाल रथों के निर्माण में लगने वाले श्रम, कौशल और धार्मिक अनुष्ठानों की जानकारी बहुत कम लोगों को होती है।
रथ निर्माण केवल बढ़ईगिरी का कार्य नहीं है, बल्कि यह धार्मिक आस्था, शिल्पकला और सामूहिक श्रम का अनुपम उदाहरण है। निर्माण कार्य में अनेक पीढ़ियों से जुड़े शिल्पकार परिवार भाग लेते हैं, जिनके लिए यह कार्य केवल रोजगार नहीं बल्कि एक पवित्र दायित्व है।
वसंत पंचमी से प्रारंभ होती है तैयारी
रथ निर्माण की प्रक्रिया वसंत पंचमी के बाद प्रारंभ हो जाती है। सबसे पहले रथों के लिए उपयुक्त वृक्षों का चयन किया जाता है। इसके लिए श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन द्वारा एक विशेष दल गठित किया जाता है, जो वनों में जाकर उपयुक्त वृक्षों की पहचान करता है।
रथ निर्माण में मुख्यतः नीम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इस पवित्र काष्ठ को दारु कहा जाता है। वृक्षों के चयन में उनकी आयु, आकार, स्वास्थ्य और धार्मिक मान्यताओं का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि रथ केवल लकड़ी से नहीं बल्कि आस्था से तैयार होते हैं।
दशपल्ला के जंगलों से आती है लकड़ी
रथ निर्माण के लिए आवश्यक लकड़ी मुख्य रूप से ओड़िशा के नयागढ़ जिले के दशपल्ला क्षेत्र के वनों से प्राप्त की जाती है। वृक्षों की कटाई से पूर्व स्थानीय देवी देवताओं तथा वनदेवता की विधिवत पूजा की जाती है।
यह परंपरा भारतीय संस्कृति के उस दृष्टिकोण को दर्शाती है जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि पूजनीय शक्ति माना गया है। वृक्षों को काटने से पहले उनसे अनुमति और आशीर्वाद लेने की परंपरा आज भी जीवित है, जो प्रकृति के प्रति भारतीय समाज के आदर भाव को स्पष्ट रूप से प्रकट करती है।
अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है निर्माण
अक्षय तृतीया के दिन रथ निर्माण का औपचारिक शुभारंभ किया जाता है। इसी दिन चंदन यात्रा भी प्रारंभ होती है, जिससे यह दिन दोहरे महत्व का बन जाता है।
वैदिक मंत्रोच्चार के साथ लकड़ियों का पूजन किया जाता है। मंदिर के पुजारी चाँदी की कुल्हाड़ी से प्रतीकात्मक रूप से निर्माण कार्य आरंभ करते हैं। इसके बाद शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा का स्मरण कर निर्माण कार्य में जुट जाते हैं। यह अनुष्ठान इस बात को रेखांकित करता है कि रथ निर्माण केवल तकनीकी कार्य नहीं बल्कि एक पवित्र साधना है।
रथखाला जहाँ आकार लेते हैं रथ
श्रीमंदिर के निकट स्थित निर्माण स्थल को रथखाला कहा जाता है। यही वह स्थान है जहाँ रथों के विभिन्न हिस्से तैयार किए जाते हैं।
यहाँ कई महीनों तक सैकड़ों कारीगर दिन रात परिश्रम करते हैं। लकड़ियों की कटाई, छिलाई, पहियों का निर्माण, विभिन्न हिस्सों की जोड़ाई, सजावट और रंग रोगन का कार्य क्रमशः संपन्न होता है। पूरे मंदिर परिसर के आसपास का क्षेत्र इन महीनों में एक जीवंत कार्यशाला में बदल जाता है, जहाँ लकड़ी छीलने की आवाज और मंत्रोच्चार साथ साथ गूँजते रहते हैं।
शिल्पकारों की सामूहिक साधना
रथ निर्माण में अनेक प्रकार के परंपरागत सेवक और शिल्पकार अपनी भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक समूह का कार्य विशिष्ट और परस्पर पूरक होता है।
गुणकार लकड़ियों को काटकर और छीलकर उपयोग योग्य बनाते हैं। पहि महाराणा रथों के विशाल पहियों का निर्माण करते हैं। कमारकंट नायक, जिन्हें ओझा महाराणा भी कहा जाता है, लोहे की कील, पिन और अन्य धातु सामग्री तैयार करते हैं। चंदाकार रथ के विभिन्न भागों को जोड़कर उसकी संरचना तैयार करते हैं। रूपकार और मूर्तिकार रथों पर स्थापित होने वाली मूर्तियों और अलंकरणों का निर्माण करते हैं। चित्रकार रथों को पारंपरिक चित्रकला से सजाते हैं। दर्जी सेवक रथों के लिए रंग बिरंगे वस्त्र, ध्वज और आवरण तैयार करते हैं। भोई सेवक निर्माण कार्य में हर प्रकार से सहयोग प्रदान करते हैं।
इन सभी की संयुक्त मेहनत से रथ निर्माण का कार्य पूर्ण होता है। कोई भी एक व्यक्ति या समूह अकेले यह कार्य पूरा नहीं कर सकता, यही कारण है कि रथ निर्माण को सामूहिक साधना कहा जाता है।
विश्वकर्मा परंपरा की जीवित धरोहर
रथ निर्माण का कार्य महाराणा समुदाय के शिल्पकारों द्वारा किया जाता है, जो स्वयं को भगवान विश्वकर्मा का वंशज मानते हैं। यह ज्ञान पुस्तकों से नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित परंपरा से प्राप्त होता है। पिता से पुत्र और गुरु से शिष्य तक यह विद्या मौखिक रूप से और प्रत्यक्ष कार्य के माध्यम से आगे बढ़ती रहती है।
ओड़िशा के इतिहास में कोणार्क सूर्य मंदिर के महान शिल्पकार बिसु महाराणा का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि आज के महाराणा शिल्पकार उसी गौरवशाली परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। इस प्रकार रथ निर्माण की परंपरा ओड़िशा की समृद्ध शिल्पकला विरासत की एक जीवंत कड़ी है, जो सदियों से बिना किसी व्यवधान के चली आ रही है।
रथयात्रा का सांस्कृतिक महत्व
जगन्नाथ रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह भारतीय समाज की सामूहिकता, समानता और लोककल्याण की भावना का उत्सव है।
इस महापर्व में शिल्पकार, पुजारी, सेवक, कलाकार, किसान, व्यापारी, प्रशासन और श्रद्धालु सभी सहभागी बनते हैं। कोई भी वर्ग इस उत्सव से अछूता नहीं रहता। यह आयोजन दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति में धर्म केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग और सांस्कृतिक एकता का माध्यम भी है। रथ खींचने वाले भक्तों की भीड़ में जब समाज के विभिन्न वर्ग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं, तब भारतीय समाज की उस मूल भावना के दर्शन होते हैं जो विविधता में एकता की बात करती है।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा आस्था, शिल्पकला, लोकजीवन और सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय संगम है। जब महाप्रभु अपने विशाल रथों पर सवार होकर भक्तों के बीच आते हैं, तब उनके साथ सदियों पुरानी परंपराएँ, असंख्य शिल्पकारों का परिश्रम और करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा भी चलती है।
रथयात्रा हमें यह संदेश देती है कि ईश्वर केवल मंदिरों की सीमाओं में नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचने वाली करुणा, समरसता और लोकमंगल की भावना में भी निवास करते हैं। यही कारण है कि जगन्नाथ रथयात्रा आज भी भारत की जीवंत सांस्कृतिक चेतना का एक अनुपम प्रतीक बनी हुई है और आने वाली पीढ़ियों को भी यह संदेश देती रहेगी कि सच्ची भक्ति में भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं होता।
आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।

