प्रकृति के साथ खिलवाड़ अर्थात सामूहिक आत्महत्या

सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों की बढ़ती मात्रा के कारण धरती वीरान और बंजर हो सकती है। तापमान असाधारण रूप से बढ़ सकता है,जिससे बर्फ पिघलने से पृथ्वी पर जल प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। आगामी पीडियों को गंभीर अनुवांशिक क्षति का सामना करना पड़ सकता है। ‘म्यूटेशन’ जैसी विरल जेनेटिक घटनाएं सामान्य, स्वाभाविक बन सकती है, जिससे समस्त मनुष्य जाति में विलक्षण,विचित्र परंतु घातक परिवर्तन हो सकते हैं। इससे पेड़- पौधे भी सर्वथा अप्रभावित नहीं रह पाएंगे। रोग प्रतिरोधक क्षमता के नष्ट हो जाने से 80% वृक्ष- वनस्पतियां समाप्त हो सकती हैं। फसल- उत्पादन में भी इसका घातक असर बड़े बिना न रह सकेगा।
उपयुक्त संभावना व्यक्त की है कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मूर्धन्य रसायन शास्त्री शेरब्रुड़ रोलैंड ने यह उल्लेखनीय है कि उनने ही सर्वप्रथम क्लोरोफ्लोरोकार्बन( CFC)नामक रसायन की खोज की थी और यह पता लगाया था कि ओजोन जैसी धरती के रक्षा कवच को सर्वाधिक हानि पहुंचाने वाला पदार्थ यही है। इतना सब जानते समझते हुए भी अमेरिका ने ही सबसे पहले इस रसायन का प्रयोग एयरकंडीशनरों ,रेफ्रिजरेटरों जैसे विलासिता के अत्याधुनिक यंत्रों के निर्माण में करना शुरू किया। धीरे-धीरे इस अनुकरण को पश्चिम के अन्य देशों ने भी अपनाना प्रारंभ किया और औद्योगिक स्तर पर इंग्लैंड, जर्मनी ,फ्रांस जैसे विकसित राष्ट्रों में भी इसके उत्पादन आरंभ हुए। प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो एक प्रकार की श्रृंखला- प्रतिक्रिया इस क्षेत्र में शुरू हुई और इन दिनों लगभग समस्त विश्व में यह साधन- सामग्री बरसात की मखमली चादर की तरह छा गई है।
खतरे की घंटी तब बजी, जब रसायन की खोज के 44 वर्ष बाद इस संदर्भ में दी गई चेतावनी सन 1985 में पुस्ट होती नजर आई और पहले- पहल यह साबित हुआ कि ‘ओजोन’ परत में एक बड़ा भारी सूराख हो गया है। इससे उत्पादक देश में हलचल मच गई सबसे अधिक इसकी चिंता अमेरिका को हुई, अतः उसने इसके दो वर्ष बाद इस संबंध में विस्तृत अध्ययन और जानकारी उपलब्ध करने के लिए एक विशेष प्रकार का यान ‘यू-2 ‘ अंतरिक्ष के उक्त क्षेत्र में भेजा। इससे उपलब्ध आंकड़े चौंकाने वाले थे। अध्ययन से सुराख की सुनिश्चित जानकारी तो मिल गई पर साथ-साथ एक अन्य तत्व का भी पता चला, जिससे अमेरिकी प्रशासन और वैज्ञानिक सकते में आ गए। ज्ञात हुआ कि उक्त रसायन से उत्तरी ध्रुव के ओजोन कवच में जो छिद्र बना है उसका क्षेत्रफल अमेरिका की कुल भूभाग का तीन गुना है और उसके आकर- विस्तार में लगातार वृद्धि होती जा रही है एवं आने वाले कुछ वर्षों में इस विस्तार में दुगनी अभिवृद्धि की संभावना है।
इन आंकड़ों ने संपूर्ण विश्व में खलबली मचा दी, पर इससे सबसे ज्यादा बेचैन अमेरिका, ब्रिटेन एवं यूरोप के वे धनी देश ही हुए हैं, जहां क्लोरोफ्लयुरो कार्बन का सर्वाधिक उत्पादन और उपयोग होता है। पिछले दिनों तक ब्रिटेन यूरोप में सीएफसी का मुख्य निर्यातक देश रहा है। सन 1980 के दशक में उसने अकेले एक वर्ष में लगभग सवा सौ देशों को आधा लाख टन उक्त रसायन का निर्यात किया। विश्व भर में सीएफसी गैस के निर्माण एवं खपत संबंधी किए गए अध्ययन बताते हैं कि संसार भर में हर वर्ष इसका लगभग 8 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होता है। इसमें से अकेले अमेरिका 14% का निर्माण करता है शेष 86% में विश्व के सभी गरीब- अमीर देश सम्मिलित हैं, किंतु इन सबकी औसत खपत अमेरिका से कम ही है ।
जनसंख्या की दृष्टि से यदि इसके उत्पादन पर विचार किया जाए तो विश्व पोर्टल पर चीन और भारत ही ऐसे दो देश हैं, जो सबसे घनी आबादी वाले राष्ट्र हैं। इनमें विश्व की एक तिहाई जनसंख्या निवास करती है किंतु यहां सीएफसी की खपत कुल मिलाकर 5% ही होती है; जबकि ब्रिटेन की आबादी इन दोनों देशों की तुलना में नगण्य जितनी है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि औद्योगिक दृष्टि से विकसित देशों में इस रसायन का उपयोग और उत्पादन कितने खतरनाक स्तर पर होता है ;जबकि तीसरी दुनिया के अनेक ऐसे गरीब देश हैं, जहां अभी-अभी ही इस तकनीक का विकास हो पाया है। अत: वहां विलासिता के उत्पादों में खपने वाले इस रसायन का निर्माण कितने न्यून स्तर पर हो रहा होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
आरंभ में अमेरिकी यान ने आर्कटिक पोल का निरीक्षण कर मात्र यही बताया कि ओजोन परत में नुकसान सिर्फ इसी क्षेत्र तक सीमित है, पर जल्द ही यह पता चल गया कि ऐसे ही सुराख की निर्माण की प्रक्रिया दक्षिणी ध्रुव के रक्षा कवच में भी चल पड़ी है और आने वाले कुछ ही वर्षों में उससे भी बड़ा विवर हिंद महासागर के ऊपर अंटार्कटिका के आकाश में बनने जा रहा है । विशेषज्ञों के अनुसार यह विवर इस सदी के अंत तक अस्तित्व में आ गया। अध्ययन बताते हैं कि दक्षिणी गोलार्ध में ओजोन परत की छति लगभग 62% के आस-पास पहुंच चुकी है जबकि पिछले वर्ष के अंत तक उत्तरी गोलार्ध में यह हानि 74% के करीब आंकी गई थी।
इन हानियों को देखते हुए इस संदर्भ में समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होते रहे हैं, जिनमें इस बात पर आधिकारिक बल दिया जाता रहा है कि ओजोन छतरी को छति पहुंचने वाली इस गैस के निर्माण पर पूर्ण पाबंदी संपूर्ण विश्व में लगा दी जाए, पर इस संबंध में अब तक के प्रयास कोई उत्साह वर्धक नहीं रहे हैं। हां, पहले की तुलना में इसके उत्पादन में वर्तमान में उच्च सीमा तक कमी तो आई है, पर शून्य उत्पादन की आशा अब भी दुराशा बनी हुई है; यों संयुक्त राष्ट्र ने इसकी अंतिम समय सीमा सन 1997 निर्धारित की थी। देखना यह है कि इस निर्धारित अवधि में विश्व विनाश की ओर बढ़ते चरण को रोका जा सकता है क्या ? अपने उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है क्या, जिसकी दुहाई सन 1987 के प्रथम ‘मोंट्रियल’ सम्मेलन, सन 1989 के द्वितीय ‘हेलेंस्की’ एवं 1990 के तृतीय ‘लंदन’ सम्मेलनों तथा ‘रियोडीजेनेरियो’ सम्मेलन में दी जाती रही है ?
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हां उस घातक रासायनिक प्रतिक्रिया की चर्चा कर देना अप्रासंगिक न होगा जो CFC नामक उस विषैला व विनाशकारी रसायन समूह के ओजोन से मिलने पर होती है। जानने योग्य तथ्य है कि ओजोन गैस में ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं ,जब इसका समागम सीएफसी नामक कार्बनिक यौगिक से होता है तो यह योग ओजोन के ऑक्सीजन परमाणुओं से प्रतिक्रिया कर एक नया योग ‘ क्लोरीन मोनोऑक्साइड ‘ का निर्माण करता है। यह प्रतिक्रिया जब लगातार लंबे समय तक चलती रहती है तो उक्त क्षेत्र में ओजोन का स्तर घटते जाने के कारण अंततः उसकी सुरक्षा छतरी में छेद हो जाता है, जिससे सूर्य की पराबैंगनी जैसी विघातक किरणें धरती पर निर्विघ्न पहुंचने और वहां के पादप, प्राणियों को असाधारण हानि पहुंचाने लगती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के रसायनज्ञो शेरब्रुड़ रोलैंड एवं सहयोगी मारियोमार्लीस का कहना है कि क्लोरीन का एक परमाणु ओजोन के लक्षाधिक परमाणुओं को एक साथ एक समय में विनष्ट कर सकता है। क्लोरीन गैस का यह स्रोत लगभग 100 वर्ष तक अपना अस्तित्व बनाए रखने में सक्षम है और ओजोन विनाश की उक्त प्रक्रिया को लंबे समय तक जारी रख सकता है।
आखिर पराबैगनी किरणों में ऐसी क्या बात है, जो भयावह भूत की तरह संपूर्ण संसार को भयभीत किए हुए हैं? इस संबंध में विशेषज्ञों का कहना है कि सूर्य से आने वाली यह विकिरण वर्षा, वृक्ष, वनस्पतियों से लेकर जीव-जंतुओं तक को समान रूप से हानि पहुंचती है। उनके अनुसार मनुष्य में इसे आंख की बीमारियों व असाध्य कैंसर से लेकर अंधेपन तक की परेशानी पैदा हो सकती है अन्न उत्पादन में इसका बुरा असर पड़ सकता है ।पशुओं पर किए गए परीक्षणों से यह कैंसर जन्य भी साबित हुई है। इस आधार पर जीव विज्ञानियों का अनुमान है कि इसके सीधे संपर्क में आने से मनुष्यों में त्वचा कैंसर की संभावना बढ़ सकती है उनके अनुसार ओजोन में एक से डेढ़ प्रतिशत की कमी से पराबैंगनी किरणों की मात्रा में बढ़ोतरी होगी उससे दुनिया में त्वचा कैंसर के 65000 मरीज प्रतिवर्ष पैदा हो सकते हैं,ओजोन में 10% की कमी से 25% कैंसर मरीज पैदा होने का खतरा है। इस किरण की वेधक क्षमता कितनी अपार है, इसका अंदाज इसी से लगता है कि यह समुद्र तल की वनस्पतियों को भी अप्रभावित नहीं रहने देती और उन्हें भी हानि उठानी पड़ती है।
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि- इससे वायुमंडलीय तापमान बढ़ने के कारण बर्फ पिघलने से समुद्री जलस्तर के बढ़ने की संभावना बलवती होने लगती है । ‘यूनेप’ नामक एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण संस्थान का इस बारे में कहना है कि -बढ़ते तापमान का खाधान्न उत्पादन पर सबसे बड़ा असर पड़ेगा और इससे संपूर्ण विश्व प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। अगले दिनों विश्व के अनेक भू भागों पर भुखमरी ,अकाल, प्राण घातक बीमारियां, समुद्र तटीय महानगरों के जल समाधिस्त होने इत्यादि संकट उत्पन्न होने की प्रबल संभावना है।
जिन क्षेत्रों में इसका सबसे अधिक खराब प्रभाव पड़ेगा, वे हैं- दक्षिण पूर्व संयुक्त राष्ट्र अमेरिका। संस्थान के अनुसार इससे फ्रांस, कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के, जो अनाज का तीन चौथाई भाग विश्व के दूसरे देशों को निर्यात करते हैं, अन्न उत्पादन पर सबसे घातक असर पड़ेगा। एक अन्य अंतरराष्ट्रीय अध्ययन दल का कहना है कि- पिछले दशक से समस्त विश्व में हिमपात में महत्वपूर्ण गिरावट आते देखी जा रही है। इस अध्ययन दल के अनुसार भारत का गंगोत्री ग्लेशियर पिछली दो दशाव्दियों में सिकुड़ कर अत्यंत संकीर्ण हो गया है। वे सिकुड़न को 250 मीटर से भी ज्यादा बताते हैं। इस संकुचन का कारण अध्येता पराबैंगनी किरणों के परिमाण में होने वाली वृद्धि को बताते हैं।
इसके भयावह परिणामो को देखते हुए देश-विदेश में इससे बचने के तरह-तरह के उपाय- उपचार अपनाते देखे जा रहे हैं। न्यूजीलैंड के स्वास्थ्य विभाग ने स्कूली बच्चों को धूप के सीधे संपर्क में आने से बचने की सलाह दी है, इसके लिए उनके साथ टोपी पहनने की अनिवार्य शर्त जोड़ दी गई है। चिली में बच्चों को प्रातः 10 बजे से 3 बजे तक धूप में बाहर न निकलने का सुझाव दिया गया है। वहां दोपहर में होने वाले विभिन्न प्रकार के खेलों पर रोक लगा दी गई है। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ‘ सनबाथ’ से बचने की चेतावनी बार-बार अपने प्रचार माध्यमों से देशवासियों को दे रही है। डेनमार्क में लोगों को सिर पर हैट व गॉगल्स चश्मा लगाकर ही धूप में निकलने की अपील की जा रही है।
इसी प्रकार के कितने ही तरीके न जाने कितने देशों में अपनाये जा रहे हैं फिर भी मस्तिष्क में बार-बार एक ही प्रश्न उभरता है कि इतने भर से इस धरती को सुरक्षित रखा जा सकता है क्या ? इससे मनुष्य तो कुछ हद तक अपनी सुरक्षा कर लेगा पर ‘इंटरडिपेंडेंस’ पर आधारित इस पर्यावरण का क्या होगा? अन्य प्राणियों ,पादपो ,ऋतुओं एवं बढ़ते तापमान व ऊंचे समुद्री जलस्तर से बचाव किस भांति हो सकेगा ? यह सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। प्रकृति की हानि कर हम सुरक्षित कदापि नहीं रह सकते !! – इस बात पर हजार बार सोचा और विचार किया जाना चाहिए एवं विश्व स्तर पर ऐसा मानस मनाया जाना चाहिए जो प्रकृति की अक्षुण्णयता की महत्ता को समझ सके व वैसी ही रीति -नीति अपना सके। संपूर्ण विश्व का कल्याण “सर्वे संतु निरामया” इसी में है। यही आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार जीवन पद्धति अपनाने पर संपूर्ण वैश्विक समस्याओं का समाधान प्राप्त हो सकता है अन्यथा विनाश सुनिश्चित है।….

