कुटुम्ब में संवाद ही बाल सुरक्षा का आधार

भारतीय संस्कृति में कुटुम्ब एक ऐसा स्थान है जहाँ व्यक्ति का निर्माण होता है और जहाँ से वह दुनिया के प्रति अपने दृष्टिकोण का विकास करता है। आज के भौतिकवादी दौर में जब हम बच्चों की सुरक्षा को केवल आधुनिक तकनीकी उपकरणों या बाहरी सतर्कता तक सीमित मान बैठे हैं तब हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता है। भारतीय दर्शन स्पष्ट रूप से मानता है कि एक बालक की वास्तविक सुरक्षा उसके घर की दीवारों में नहीं बल्कि उसके भीतर विकसित किए गए संस्कारों और पारिवारिक संवाद की उस अदृश्य डोर में निहित होती है जो उसे हर संकट में अडिग रहने का संबल प्रदान करती है।
हमारे उपनिषदों में कहा गया है कि माता और पिता बालक के प्रथम गुरु होते हैं। यह गुरुत्व केवल शिक्षा देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह एक ऐसी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसे भारतीय परंपरा में संस्कार का नाम दिया गया है। जब हम परिवार के भीतर संवाद की बात करते हैं तो इसका अर्थ केवल सूचनाओं का आदान प्रदान नहीं होता। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम बच्चे के मन में भय के स्थान पर विश्वास का बीजारोपण करते हैं। जिस घर में संवाद का वातावरण होता है वहाँ बच्चा अपनी छोटी से छोटी समस्याओं को साझा करने से नहीं डरता। यही निडरता उसकी सुरक्षा का सबसे बड़ा ढाल बनकर उभरती है।
गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों का आधार माना गया है क्योंकि यहीं पर बालक धर्म और मर्यादा के पाठ सीखता है। जब अभिभावक अपने बच्चों के साथ बैठकर दिनभर की घटनाओं पर चर्चा करते हैं तो वे अनजाने में ही उन्हें जीवन की चुनौतियों से निपटना सिखा रहे होते हैं। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य हमें यही सिखाते हैं कि पारिवारिक संवाद ही संकट के समय में सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।
आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि जो बच्चे अपने माता पिता के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं वे बाह्य खतरों के प्रति अधिक जागरूक और सावधान रहते हैं। हमारे यहाँ कहा गया है कि संतान को पाँच वर्ष की आयु तक अमृत के समान प्रेम और स्नेह की छाया में रखना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें अनुशासन विहीन छोड़ दिया जाए बल्कि इसका गहरा अर्थ यह है कि उनके मन में सुरक्षा का ऐसा भाव घर कर जाए कि वे कभी भी अकेलापन अनुभव न करें। अकेलापन ही वह मुख्य कारण है जो बच्चे को गलत संगति या असुरक्षित रास्तों पर ले जाता है।
संवाद की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पहलू है सुनने की कला और धैर्य। जब अभिभावक अपने बच्चे की बातों को बिना किसी पूर्वाग्रह के सुनते हैं तो वे बच्चे के मन की सारी कुंठाओं को बाहर निकाल देते हैं। जो बच्चा अपनी बात खुलकर कह सकता है। वह मानसिक रूप से इतना स्वस्थ होता है कि वह बाहर की दुनिया में आने वाली किसी भी अनैतिक परिस्थिति को तुरंत पहचान लेता है। उसके संस्कार उसे बता देते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। यह विवेक ही उसकी सुरक्षा का सबसे पुख्ता प्रमाण है।
आज के डिजिटल युग में परिवार के सदस्य एक ही कमरे में बैठे होने के बावजूद अपने फोन में व्यस्त रहते हैं। यह चुप्पी बच्चों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। भारतीय दर्शन के अनुसार मौन का अपना महत्व है लेकिन संवाद के स्थान पर छाई हुई यह कृत्रिम चुप्पी बच्चे को भावनात्मक रूप से मृत कर देती है। बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए हमें पुनः भोजन की मेज पर या शाम को साथ बैठकर उन पुरानी कहानियों को दोहराने की जरूरत है जो हमारे मूल्यों का आधार हैं। ये कहानियाँ केवल किस्से नहीं हैं बल्कि ये जीवन के ऐसे सूत्र हैं जो विपरीत परिस्थितियों में बच्चे का मार्गदर्शन करते हैं।
संस्कारों की नींव संवाद से ही पड़ती है। जब हम बच्चे को बड़ों का सम्मान करना और छोटों से प्रेम करना सिखाते हैं तो हम वास्तव में उसे एक ऐसा सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान कर रहे होते हैं जो उसे हर जगह सम्मान और संरक्षण दिलाता है। परिवार की यह प्रतिष्ठा ही उसके लिए एक अदृश्य घेरा बन जाती है जिसके भीतर वह सुरक्षित रहता है।
जब हम बच्चों के साथ सत्य के धरातल पर संवाद करते हैं तो उनके मन में किसी भी प्रकार का छिपाव नहीं रहता। डर और झूठ का गहरा संबंध है और जहाँ संवाद की पारदर्शिता होती है वहाँ डर का कोई स्थान नहीं होता। यदि बच्चा अपनी किसी गलती को भी अभिभावक के सामने निर्भय होकर रख सकता है तो समझ लीजिए कि वह बच्चा सुरक्षित हाथों में है।
अंतत; कुटुम्ब संवाद कोई औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। यह वह डोर है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे संस्कारों को जीवित रखती है। सुरक्षित भविष्य की कल्पना बिना सुरक्षित बचपन के नहीं की जा सकती। सुरक्षित बचपन तब होता है जब बच्चा घर में प्रेम का अनुभव करता है जब उसे पता होता है कि उसकी आवाज को सुनने वाला कोई है और जब उसे यह विश्वास होता है कि चाहे कुछ भी हो जाए उसका परिवार उसके साथ चट्टान बनकर खड़ा है। इसलिए कुटुम्ब संवाद आवश्यक है। यही हमारे ऋषि मुनियों का संदेश था और यही आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

