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प्राचीन धरोहरों में संरक्षित दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक विरासत

आचार्य ललित मुनि

भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन सभ्यताएं सदैव से अपनी समृद्ध विरासत के लिए प्रसिद्ध रही हैं, और दक्षिण कोसल का क्षेत्र इनमें से एक अनमोल अध्याय है। यह भूमि आज के छत्तीसगढ़ राज्य का मूल आधार है, जहां इतिहास शिलालेखों, मंदिरों और प्राचीन नगरों की परंपरा में जीवंत रूप से विद्यमान हैं।

दक्षिण कोसल की विरासत केवल पुराने खंडहरों या धूल भरी कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का आधार स्तंभ बन चुकी है। जब हम इस विरासत को समझते हैं, तो स्पष्ट होता है कि यहां के राजवंशों की उपलब्धियां, व्यापार, धार्मिक सहिष्णुता और वास्तु कला ने एक ऐसी सांस्कृतिक धारा पैदा की, जो आज भी छत्तीसगढ़ के लोगों में गर्व का भाव जगाती है।

दक्षिण कोसल का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। पुराणों जैसे मत्स्य पुराण, बृहत संहिता और ब्रह्मांड पुराण में इस क्षेत्र को उत्तरी कोसल से अलग करके दक्षिणी भाग के रूप में वर्णित किया गया है। इसका विस्तार वर्तमान छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों और ओडिशा के पश्चिमी क्षेत्रों तक फैला हुआ था। इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख में समुद्रगुप्त द्वारा कोसल के राजा महेंद्र को पराजित करने का उल्लेख मिलता है, जो चौथी शताब्दी ईस्वी का है।

इससे पता चलता है कि गुप्त काल में भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण था। बाद में वाकाटक प्रभाव और स्थानीय राजवंशों ने यहां अपनी छाप छोड़ी। दक्षिण कोसल के राजनीतिक इतिहास की शुरुआत पांचवीं शताब्दी ईस्वी से मानी जाती है, जब शरभपुरिय वंश का उदय हुआ। इनकी मूल राजधानी शरभपुर थी, लेकिन बाद में उन्होंने श्रीपुर, अर्थात सिरपुर, को अपना केंद्र बनाया। शरभपुरिय राजाओं ने गजलक्ष्मी की मुद्रा वाले शिलालेख जारी किए, जो उनकी वैष्णव भक्ति को दर्शाते हैं।

शरभपुरिय वंश के बाद पाण्डुवंशी राजवंश ने दक्षिण कोसल पर शासन किया। यह वंश छठी से आठवीं शताब्दी ईस्वी तक सक्रिय रहा, और इसके राजाओं ने श्रीपुर को समृद्ध राजधानी बनाया। सबसे प्रसिद्ध राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन थे, जिनका शासन लगभग साठ वर्षों तक चला। उनके काल को दक्षिण कोसल का स्वर्ण युग कहा जाता है। पाण्डुवंशी राजाओं ने त्रिवरदेव जैसे शासक दिए, जिनके तीन ताम्रलेख प्राप्त हुए हैं। इन शिलालेखों में त्रिवरदेव ने कोसल, उत्कल और अन्य मंडलों पर विजय का उल्लेख किया है, तथा श्रीपुर से जारी आदेशों में भूमि अनुदान और प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन है।

एक लेख में कहा गया है कि त्रिवरदेव ने पाण्डु वंश की परंपरा को आगे बढ़ाया और धर्म तथा राज्य की रक्षा के लिए प्रयास किए। इन ताम्रपत्रों की भाषा संस्कृत है, और अक्षर शैली मध्य भारत की बॉक्स हेड वाली है, जो उस युग की लिपि का प्रमाण है। इन शिलालेखों से पता चलता है कि दक्षिण कोसल में राजकीय दान प्रथा प्रचलित थी, और ब्राह्मणों तथा मंदिरों को भूमि प्रदान की जाती थी।

श्रीपुर, अर्थात सिरपुर, दक्षिण कोसल का सबसे प्रमुख प्राचीन नगर था। यह महानदी के तट पर स्थित था और पांचवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक हिंदू, बौद्ध तथा जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने सन् 635 ईस्वी में यहां की यात्रा की और लिखा कि यहां हजारों बौद्ध भिक्षु अध्ययन करते थे। सिरपुर में खुदाई से कई विहार, मंदिर और स्तूप मिले हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्टों के अनुसार, यहां की खुदाई 1882 में एलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा शुरू हुई, और 1950 के दशक तथा 1990 के बाद और गहन रूप से हुई।

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सिरपुर को दक्षिण कोसल की राजधानी के रूप में शरभपुरिय और पाण्डुवंशी राजाओं ने स्थापित किया। यहां का लक्ष्मण मंदिर सातवीं शताब्दी ईस्वी का एक उत्कृष्ट ईंट का मंदिर है, जो भारत के प्रारंभिक संरचनात्मक मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में गर्भगृह, अंतरा और मंडप की संरचना है। गर्भगृह के द्वार पर विष्णु के दशावतार और कृष्ण लीला की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर की दीवारों पर दैनिक जीवन, युगल और मिथुन दृश्यों की नक्काशी है, जो उस युग की कलात्मक परिपक्वता को दर्शाती है। लक्ष्मण मंदिर का आधार पत्थर का जगती मंच है और यह विष्णु को समर्पित है। आसपास सूरंग टीला जैसे अन्य मंदिर परिसर भी हैं, जहां हिंदू देवी देवताओं की पूजा होती थी।

सिरपुर केवल हिंदू केंद्र नहीं था, बल्कि बौद्ध धर्म का भी महत्वपूर्ण स्थल था। यहां आनंद प्रभु कुटी विहार, पद्मपाणि विहार और स्वस्तिक विहार जैसे बौद्ध विहार मिले हैं। इनमें बुद्ध की मूर्तियां, अवलोकितेश्वर, तारा और अमोघसिद्धि जैसे बोधिसत्त्वों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। जैन मंदिरों के अवशेष भी यहां से मिले हैं, जो धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण देते हैं। सिरपुर का व्यापार महानदी के रास्ते गंगा घाटी से पूर्वी तट तक फैला हुआ था। यहां रोमन सिक्के और रत्नों के प्रमाण मिले हैं, जो दक्षिण कोसल की समृद्धि को दर्शाते हैं। प्राचीन नगरों की परंपरा में सिरपुर की शहर नियोजन व्यवस्था उल्लेखनीय है। मंदिरों, विहारों और बाजारों का विस्तार नदियों, जंगलों और व्यापार मार्गों के अनुरूप था।

दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत में मल्हार का महत्वपूर्ण स्थान है। वर्तमान में यह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल है, जिसे प्राचीन काल में मल्लल या मल्लाल के नाम से जाना जाता था। मल्हार का इतिहास लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक पहुंचता है, जिससे यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के सबसे प्राचीन निरंतर बसाहट वाले नगरों में से एक माना जाता है। यहां से प्राप्त पुरातात्विक अवशेष यह प्रमाणित करते हैं कि यह नगर प्राचीन काल में धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।

मल्हार में स्थित पातालेश्वर मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के कारण अत्यंत प्रसिद्ध है। यह मंदिर शैव परंपरा से संबंधित है और इसकी संरचना में प्राचीन काल की कलात्मक परिपक्वता दिखाई देती है। यहां प्राप्त मूर्तियों में देवी देवताओं की अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी देखने को मिलती है, जो उस समय के शिल्प कौशल को दर्शाती है। मल्हार से अनेक प्राचीन शिलालेख, प्रतिमाएं और सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र मौर्य, शुंग, सातवाहन, गुप्त तथा कलचुरी काल तक निरंतर विकसित होता रहा।

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दक्षिण कोसल के अन्य प्राचीन नगर भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे। तुम्मन या तूमान, कोरबा जिले में स्थित था और कलचुरी वंश का प्रारंभिक केंद्र रहा। कलचुरी राजाओं ने तूमान से रतनपुर को राजधानी बनाया। रतनपुर आज बिलासपुर से लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर है, और यहां जजल्लदेव प्रथम का 1114 ईस्वी का शिलालेख मिला है। इस शिलालेख में कलचुरी राजा रतनदेव प्रथम द्वारा शिव मंदिर निर्माण का उल्लेख है।

रतनपुर में मंदिरों का समूह कलचुरी काल का है, और इनकी वास्तुकला नागर शैली को दर्शाती है। मल्हार भी एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहां बौद्ध अवशेष और शिव मंदिर मिले हैं। राजिम में नरनारायण मंदिर और अन्य संरचनाएं पाण्डुवंशी काल की हैं। इन नगरों की परंपरा में सामुदायिक जीवन, व्यापार और धार्मिक उत्सवों का संगम था। लोग मंदिरों के आसपास एकत्रित होते थे और ज्ञान का आदान प्रदान होता था।

शिलालेख दक्षिण कोसल की विरासत के सबसे विश्वसनीय स्रोत हैं। पाण्डुवंशी राजाओं के ताम्रपत्र, जैसे राजिम ताम्रपत्र, त्रिवरदेव द्वारा जारी किया गया था, जिसमें सातवें शासन वर्ष का उल्लेख है। इसमें भूमि दान की व्याख्या है और राजकीय आदेशों का विवरण है। बालोदा ताम्रपत्र नौवें वर्ष का है, और इसमें कोसलाधिपति की उपाधि का प्रयोग किया गया है। इन शिलालेखों की भाषा संस्कृत है और वे प्रशस्ति शैली में लिखे गए हैं।

कलचुरी काल के शिलालेख, जैसे रतनपुर शिलालेख, जजल्लदेव प्रथम के काल का है, जो 1114 ईस्वी का है। इसमें रतनदेव द्वारा मंदिर निर्माण और राज्य विस्तार का वर्णन है। अरंग शिलालेख भी भीमसेन द्वितीय का है, जो छठी शताब्दी ईस्वी का है। इन शिलालेखों से प्रशासनिक व्यवस्था, राजकीय धर्म और सामाजिक संरचना का पता चलता है। विद्वान अजय मित्र शास्त्री ने इन शिलालेखों का संकलन किया है, और उनकी पुस्तक शरभपुरिय पाण्डुवंशिन और सोमवंशिन के शिलालेख इनका महत्वपूर्ण संदर्भ है।

मंदिर दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। लक्ष्मण मंदिर सिरपुर में सातवीं शताब्दी ईस्वी का है, और यह ईंटों से निर्मित भारत के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इसका गर्भगृह पत्थर की चौखट से घिरा है, और द्वार पर शेषशायी विष्णु तथा दशावतार की नक्काशी है। मंदिर की छत और मंडप के खंभे अब खंडहर हो चुके हैं, लेकिन शेष संरचना वास्तु कला की उत्कृष्टता दिखाती है।

भोरमदेव मंदिर कवर्धा जिले में स्थित है, और ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी का है। यह शिव को समर्पित है और कलचुरी प्रभाव से युक्त है। भोरमदेव मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है, क्योंकि इसमें नागर शैली की सप्त रथ संरचना और भूमा शिखर है। यहां की मूर्तियां वैष्णव, शैव और जैन कलाकृतियों से भरी हैं। मंदिर का निर्माण फणिनागवंशी राजाओं द्वारा किया गया था, लेकिन कलचुरी प्रभाव स्पष्ट है। आसपास के क्षेत्रों में जनजातीय देवता भोरमदेव की पूजा आज भी होती है, जो प्राचीन परंपरा की निरंतरता दर्शाती है।

सिरपुर के अन्य मंदिर, जैसे गंधेश्वर मंदिर और सूरंग टीला परिसर, भी उल्लेखनीय हैं। गंधेश्वर मंदिर में शिव की पूजा होती थी और यहां की नक्काशी दैनिक जीवन के दृश्य दिखाती है। इन मंदिरों की वास्तुकला में गुप्त और वाकाटक शैली का मिश्रण है, जो दक्षिण कोसल की स्वतंत्र कलात्मक पहचान को रेखांकित करता है। मंदिरों में उत्कीर्ण शिलालेख कभी कभी निर्माण काल और राजकीय संरक्षण का उल्लेख करते हैं। उदाहरणस्वरूप सिरपुर के कुछ मंदिरों में पाण्डुवंशी राजाओं के नाम मिलते हैं।

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दक्षिण कोसल की यह विरासत आधुनिक छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान से सीधे जुड़ी है। जब 2000 ईस्वी में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ, तब लोगों ने अपनी जड़ों को दक्षिण कोसल से जोड़ा। राज्य की सांस्कृतिक पहचान में मंदिर, उत्सव और लोक कथाएं इस प्राचीन विरासत से प्रेरित हैं। सिरपुर अब पुरातत्व पर्यटन का केंद्र है, और यहां यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामांकन की प्रक्रिया चल रही है। राज्य सरकार ने सिरपुर की खुदाई और संरक्षण के लिए डिजिटल प्रदर्शनियां और पर्यटक सुविधाएं विकसित की हैं। भोरमदेव मंदिर भी पर्यटकों को आकर्षित करता है, और यहां के मेलों में जनजातीय और मुख्यधारा संस्कृति का संगम होता है।

छत्तीसगढ़ की लोक कला, नृत्य और संगीत में दक्षिण कोसल की परंपरा झलकती है। जनजातियों की पूजा पद्धतियां प्राचीन शिव और विष्णु मंदिरों से जुड़ी हैं। राज्य की भाषा छत्तीसगढ़ी और लोकगीतों में प्राचीन नगरों की कथाएं जीवित हैं। शिक्षा में इतिहास के पाठ्यक्रमों में दक्षिण कोसल को शामिल किया गया है, जिससे युवा पीढ़ी अपनी विरासत से जुड़ रही है। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और स्थानीय संस्थाएं मंदिरों और शिलालेखों के संरक्षण में सक्रिय हैं। रतनपुर और मल्हार जैसे स्थलों पर खुदाई जारी है, जो नई जानकारी प्रदान कर रही है।

आज के युग में जब वैश्वीकरण संस्कृतियों को मिटाने को आतुर है, तब दक्षिण कोसल की विरासत छत्तीसगढ़ को अपनी पहचान का बल प्रदान करती है। प्राचीन नगरों की परंपरा हमें सिखाती है कि शहरों का विकास पर्यावरण और धर्म के साथ संतुलन में होना चाहिए। शिलालेख प्रशासनिक पारदर्शिता और न्याय की याद दिलाते हैं। मंदिर कला और भक्ति के केंद्र के रूप में आज भी प्रेरणा देते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार की पहल, जैसे सिरपुर का विकास और भोरमदेव संरक्षण, इन प्रयासों का हिस्सा हैं। पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ रही है।

इस प्रकार प्राचीन दक्षिण कोसल की विरासत इतिहास, शिलालेख, मंदिर और प्राचीन नगरों की परंपरा के रूप में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाती है। यह विरासत केवल अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य का मार्गदर्शक भी है। जब हम सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के खंडहरों को देखते हैं या भोरमदेव के शिखर को निहारते हैं, तो महसूस होता है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी हैं। छत्तीसगढ़ के नागरिकों का दायित्व है कि वे इस विरासत को संजोएं और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। इससे न केवल सांस्कृतिक गर्व बढ़ेगा, बल्कि पर्यटन, शिक्षा और सामाजिक सद्भाव भी मजबूत होगा। दक्षिण कोसल की यह धरोहर छत्तीसगढ़ को भारत की सांस्कृतिक विविधता में एक अनुपम स्थान दिलाती है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।