संघर्ष से सफलता तक: देबी डायमारी ने जीता रजत, मेहनत से लिखी अपनी कहानी
असम की महिला पहलवान देबी डायमारी ने अपने संघर्ष और मेहनत के दम पर खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में रजत पदक जीतकर एक प्रेरक मिसाल पेश की है। महिलाओं के 62 किलोग्राम वर्ग में हासिल यह सफलता उनके वर्षों के कठिन परिश्रम का परिणाम है।
गोलाघाट जिले के सिसुपानी स्थित दिनेशपुर गांव की रहने वाली 28 वर्षीय देबी का जीवन बचपन से ही चुनौतियों से भरा रहा। महज सात साल की उम्र में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण चाचा-चाची ने किया। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने अपने खेल के सपने को जिंदा रखा।
देबी ने साल 2022 में कुश्ती की शुरुआत की। इससे पहले वह पावरलिफ्टिंग और आर्म रेसलिंग में हाथ आजमा चुकी थीं। बोकाखात स्थित खेलो इंडिया सेंटर में कोच अनुस्तूप नाराह के मार्गदर्शन में उन्होंने कुश्ती के गुर सीखे और जल्द ही अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
शुरुआती दौर में आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उन्हें किराया देने के लिए नौकरी करनी पड़ी। उन्होंने पहले एक स्टोर में कम वेतन पर काम किया और बाद में काजीरंगा के एक रिसॉर्ट में स्विमिंग पूल की देखरेख का काम संभाला। दिनभर काम करने के बाद वह शाम को सीमित समय में अभ्यास करती थीं, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया।
कोच अनुस्तूप नाराह ने भी उनकी मेहनत और लगन को पहचानते हुए उन्हें हर संभव मदद दी। उनकी सलाह पर देबी ने कुश्ती को गंभीरता से अपनाया और कम समय में ही राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई। 2022 में उन्होंने सीनियर चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया और 2024 में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक भी हासिल किया।
हाल ही में खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में रजत पदक जीतने के बाद भी देबी संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है और अब उनका लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करना है।
देबी के इस सफर में उनके परिवार और पति का भी अहम योगदान रहा है, जो उन्हें लगातार प्रोत्साहित करते हैं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार न मानने वाली देबी डायमारी की कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।

