मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव, 193 सांसदों के हस्ताक्षर
देश की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम के तहत विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की पहल की है। इस संबंध में 193 सांसदों के हस्ताक्षरों वाला नोटिस संसद के दोनों सदनों में सौंपा गया है। बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव का समर्थन कुल 17 विपक्षी दलों ने किया है।
जानकारी के मुताबिक इस नोटिस पर लोकसभा के 130 सांसदों और राज्यसभा के 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं।
विपक्ष ने अपने प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। इनमें कथित अनुचित आचरण, पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण व्यवहार, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी कार्रवाई तथा बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने के आरोप शामिल हैं। इसके अलावा नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल, चुनावी गड़बड़ियों की जांच में बाधा डालने और सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना जैसे आरोप भी लगाए गए हैं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने इस पहल में प्रमुख भूमिका निभाई है। पार्टी के वरिष्ठ सांसदों ने विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों से संपर्क कर इस प्रस्ताव के समर्थन में हस्ताक्षर जुटाए।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया कई राज्यों में विवाद का विषय बनी हुई है, खासकर पश्चिम बंगाल में इसे लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं।
हालांकि संसद में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम मानी जा रही है। फिर भी आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इस कदम को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चुनाव आयोग जल्द ही पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर सकता है।
कैसे हटाया जा सकता है मुख्य चुनाव आयुक्त
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान होती है। इसके लिए संसद के किसी भी सदन में प्रस्ताव पेश किया जाता है, जिस पर आवश्यक संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद सदन के अध्यक्ष या सभापति द्वारा तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है। यह समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट सदन को सौंपती है।
यदि रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाते हैं, तो प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा और मतदान होता है। प्रस्ताव पारित होने के लिए दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। इसके बाद प्रस्ताव राष्ट्रपति को भेजा जाता है, जिनकी मंजूरी के बाद ही पद से हटाने की प्रक्रिया पूरी होती है।

