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क्या सचमुच बंगाल को बचाने की ज़रूरत है ?

-गोपाल सामंतो

आज जब सम्पूर्ण देश राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम्” की पंक्तियों के बीच एक सम्पूर्ण जीवन शैली की खोज और प्रसंस्करण में व्यस्त है, ठीक उसी समय बंगाल — उस पुण्यभूमि में जहाँ यह गीत लिखा गया था — इस गीत के माध्यम से पुनः एक क्रांति की आवश्यकता महसूस की जा रही है। निश्चित ही इस बार की लड़ाई में कोई विदेशी ताकत या सेना सामने नहीं है, अपितु यह वैचारिक अंतर्द्वंद से उपजा एक वृहद् सांस्कृतिक विचलन है, जिससे एक आम बांग्लाभाषी जूझता हुआ नज़र आ रहा है।

बंगाल की बात हो और देश के प्रति उसके ऐतिहासिक योगदान की चर्चा न हो, तो कोई भी विमर्श अधूरा लगता है। अध्यात्म से विज्ञान तक और औद्योगिकीकरण से चलचित्र तक — बंगाल और बंगालियों के योगदान को समेटकर लिखने में ही दशकों बीत जाएँगे। सम्पूर्ण विश्व पटल पर जिस प्रकार आज स्वामी विवेकानन्द सनातन के प्रतीक हैं, ठीक उसी प्रकार नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और खुदीराम बोस भी बलिदान के अमर चिह्न के रूप में हर भारतीय के हृदय में बसते हैं।

बंगाल वह भूमि है जिसने असंख्य सपूत भारत माँ के चरणों में अर्पित किए हैं, ताकि देश सुरक्षित रहे और राष्ट्रप्रेम जागृत बना रहे। आज भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं से प्रेरित होकर सिनेमा बन रहे हैं। ज़रा सोचिए — उनके विचार सौ वर्षों से भी अधिक पुराने होने के बावजूद आज भी कितने प्रासंगिक हैं।

ऋषि अरविन्द ने एक बार कहा था कि रास्ते पर ठोकर लगने से ही मनुष्य चलना सीखता है। लेकिन यदि बंगाल की वर्तमान पृष्ठभूमि को देखा जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि बांग्लाभाषी भद्रलोक ने ठोकरों में ही अपना जीवन खोज लिया है और इन सब बातों से ऊपर उठकर एक काल्पनिक विचारधारा गढ़ ली है।

एक समय था जब मूलभूत विषयों के लिए पूरा भारतवर्ष बंगाल की ओर देखता था — चाहे वह स्वास्थ्य हो या मशीनी उपकरण। इसलिए कहा जाता था कि “जो बंगाल आज सोचता है, शेष भारत उसे कल सोचता है।”

शायद इन्हीं बातों ने बंगाल के अस्तित्व को नज़र लगा दी और आज बंगाल उस स्थिति में पहुँच गया है जहाँ उसका रक्तरंजित वर्तमान उसके गौरवशाली इतिहास को मिटाने में लगा हुआ है। जिस भद्रलोक ने बंगाल का स्वर्णिम इतिहास रचा था, आज उसी के हाथों में जबरन स्याही पोतकर नया इतिहास लिखवाने की चेष्टा की जा रही है।

ऐसी भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी गई है कि बंगालियों का एक बड़ा वर्ग वैभव की आकांक्षा छोड़कर दरिद्रता की प्रतियोगिता में अपनी पूरी बौद्धिक क्षमता झोंक रहा है। 35 वर्षों के कम्युनिज़्म के मीठे ज़हर को चखते-चखते दो-तीन पीढ़ियाँ समाप्त हो गईं और जब उसके बाद नए फ्लेवर में ममता काल आया, तो आम बंगाली को इस मायाजाल में फँसने का एहसास ही नहीं हो पाया।

ज़रा समझिए कि इस बौद्धिक समाज ने स्वयं को कैसे विभाजित कर लिया है — कई टुकड़ों में। शायद इन्हीं कारणों से इस समाज और बांग्लाभूमि में दो बार राजनीतिक विभाजन और एक बार सामूहिक विस्थापन संभव हो सका। आज भी हम उसी राह पर चल रहे हैं।

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बांग्लादेश से 1947 के पहले आए बंगालियों को “बांगाल” कहा जाता है। 1947 के बाद जो बंगाली भारत आए, उन्हें “रिफ्यूजी बंगाली” कहा जाता है। बंगाल के बाहर बसे हुए बंगालियों को “प्रवासी बंगाली” कहा जाता है और इन सबके ऊपर एक वर्ग है — “ऐदेशी बंगाली”, जिनके पूर्वज पश्चिम बंगाल में ही रहे और जिनका पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) से कोई संबंध नहीं रहा।

विडम्बना देखिए कि इस विभाजन को आज भावनाओं का जामा पहनाकर फुटबॉल टीमों के नामों तक में बाँट दिया गया है।

अपने मातृभूमि के इस पतन के विरुद्ध हर बांग्लाभाषी के भीतर रोष है और कुछ कर गुजरने की इच्छा भी। इन्हीं इच्छाओं को एकत्रित करके कुछ  बंगालियों ने “Save Bengal Save India” नामक मुहिम की शुरुआत की है। इस मुहिम के पीछे मुख्यतः प्रवासी बंगाली ही हैं, जो बंगाल को उस दृष्टि से देख पा रहे हैं जहाँ से बंगाल के भीतर रहने वाला व्यक्ति नहीं देख पा रहा।

जिस प्रकार किसी स्थान का सटीक नक्शा बनाने के लिए उसका एरियल व्यू लिया जाता है, उसी प्रकार यदि बंगाल की वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करना हो तो वे लोग अधिक सक्षम हैं जो बंगाल को पूरे देश के संदर्भ में देख और समझ सकते हैं।

सच कहा जाए तो आज यह एक स्वर में कहा जा सकता है कि जो बांग्लाभाषी बंगाल के बाहर रहते हैं, वे अधिक खुशहाल और संपन्न हैं। यह सम्पन्नता केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि बौद्धिक भी है।

इसी कारण बंगाल के बाहर रहने वाले बंगाली स्वयं को अलग से “हिन्दू बंगाली” कहकर परिभाषित नहीं करते। जबकि बंगाल में आज बांग्लाभाषियों की सबसे बड़ी समस्या स्थायी पहचान की हो गई है, इसलिए उन्हें कहना पड़ता है कि वे “हिन्दू बंगाली” हैं।

“बंगाली” शब्द स्वयं में एक सांस्कृतिक पहचान का परिचायक है। सामान्यतः इस्लाम में भाषाई समुदायों के आधार पर अलग पहचान नहीं बनती। ईरान हो, बांग्लादेश हो या फिर पश्चिम बंगाल—इस्लाम धर्म में कलमा भी एक है और आराध्य भी एक ही है। फिर भी बंगाल में बसे मुस्लिमों को कम्युनिस्ट काल से “मुस्लिम बंगाली” की परिभाषा देकर भद्रलोक समाज ने अनजाने में अपनी ही धार्मिक पहचान और अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

बंगाल के बाहर बसे बंगालियों को मूल रूप से चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहला वर्ग उन बंगाली परिवारों का है जो सौ वर्षों से भी अधिक समय पहले बंगाल से अलग हो चुके हैं। अंग्रेज़ों ने इन्हें उनकी शैक्षणिक योग्यताओं के कारण देश के विभिन्न प्रांतों में बसाया और समाजहित में स्वास्थ्य, शिक्षा और अभियांत्रिकी जैसे क्षेत्रों में लगाया।

दूसरा वर्ग उन बंगाली परिवारों का है जो बेहतर पेशेवर अवसरों की तलाश में बंगाल से बाहर दूसरे राज्यों में पहुँचे और वहीं बस गए। कहा जा सकता है कि यह बौद्धिक पलायन नक्सल आंदोलन के दौर में तेज़ हुआ। इनके पलायन के साथ ही बंगाल के औद्योगिक ढाँचे के कमजोर होने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई।

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तीसरा वर्ग उन परिवारों का है जो बेरोज़गारी और बंगाल के आर्थिक पतन के कारण मजबूर होकर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए। इस वर्ग में उच्च शिक्षित लोग भी हैं और श्रमिक वर्ग से जुड़े लोग भी।

आज ये तीनों वर्ग भले ही बंगाल के बाहर रहते हों, लेकिन बंगाल की संस्कृति से उनका जुड़ाव आज भी जीवंत है। बंगालियों के आहार-विहार में भौगोलिक परिस्थितियों का बहुत कम प्रभाव पड़ता है। बंगाली चाहे न्यूयॉर्क में रहे या कोलकाता में, वह पंचांग के अनुसार पुष्पांजलि देना नहीं भूलता। आज भी “महालया” की आवाज़ भर से हर बंगाली के मन में उत्सव का उत्साह भर जाता है।

“Save Bengal Save India” मुहिम पूरी तरह एक डिजिटल अभियान के रूप में शुरू हुई। शुरूआती कुछ ही हफ्तों में इसने छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों के बंगाली समाज के सदस्यों के बीच अपनी जगह बना ली। इसके बाद यह अभियान मध्य प्रदेश के कुछ जिलों तक भी डिजिटल रूप से पहुँच गया।

इस मुहिम का उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों में बसे बंगाली समाज को एक मंच पर लाना है। भावनात्मक विभाजनों से ऊपर उठकर उन्हें पुनः बंगाल से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही बंगाल में रहने वाले लोगों के बीच यह विचार स्थापित करना भी इस अभियान का लक्ष्य है कि बंगाली चाहे कहीं भी हो, वह पहले एक है और राष्ट्रीयता की भावना से जुड़ा हुआ है।

यह भी आश्चर्य की बात है कि केंद्र सरकार ने बांग्ला भाषा को देश में “क्लासिकल भाषा” का दर्जा दिया, लेकिन बंगाल में रहने वाले अधिकांश लोग इस बात से या तो अनभिज्ञ रहे या इसके महत्व को समझ नहीं पाए। राजनीतिक मायाजाल के कारण वहाँ के लोग प्राप्त सम्मान को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं।

लेकिन हमें यह समझना होगा कि इसका प्रतिकूल प्रभाव हम जैसे बंगालियों पर पड़ता है, क्योंकि हमें बंगाल के बाहर भी जीवनयापन करना है। नॉन-बंगालियों के साथ हमारा संबंध इतना गहरा हो चुका है कि अब हम बंगाली होने के साथ-साथ भारतीय होने की पहचान को भी समान रूप से जी रहे हैं।

यह भारतीयता और राष्ट्रीयता की भावना को बंगाल के लोगों के बीच स्थापित करने का कार्य प्रवासी बंगाली अपेक्षाकृत अधिक सहजता और तार्किकता से कर सकते हैं।

बंगाल आज भी वह राज्य है जहाँ से हर वर्ष लगभग 50,000 युवा भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा का संकल्प लेते हैं। यह आँकड़ा इस बात का प्रमाण है कि बंगाल के गाँव-गाँव में आज भी राष्ट्रीयता जीवित है।

“Save Bengal Save India” अभियान के माध्यम से छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में स्थित लगभग 130 बंगाली कालीबाड़ियों में पहुँचकर वहाँ के सदस्यों के साथ बैठकें की गईं और उन्हें इस अभियान से जोड़ा गया। सदस्यता प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए बारकोड आधारित सदस्यता प्रणाली शुरू की गई। इस बारकोड को पोस्टरों पर छापकर हर कालीबाड़ी में लगाया गया, जिससे बड़ी संख्या में लोग इस अभियान से जुड़ सके।

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मध्य प्रदेश के जबलपुर और भोपाल जैसे शहरों में भी यह अभियान पहुँच चुका है और वहाँ के बंगाली समाज के बीच यह काफी लोकप्रिय हो गया है। इस अभियान से जुड़ने वाला प्रत्येक बंगाली कहीं न कहीं बंगाल के खोए हुए वैभव को पुनः स्थापित होते देखना चाहता है।

आज बंगाल में धार्मिक और सामाजिक उदारीकरण के नाम पर हो रहे सांस्कृतिक पतन से देश और दुनिया में बसे अनेक बंगाली चिंतित हैं। वे परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उसमें अपनी भागीदारी निभाना चाहते हैं।

इसी क्रम में रायपुर में “छत्तीसगढ़ हिंदू बंग सम्मेलन” का आयोजन भी किया गया, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में पद्मश्री कार्तिक महाराज उपस्थित रहे। उन्होंने बंगाली समाज को यह समझाने का प्रयास किया कि यदि इस अंतिम संघर्ष में आम बंगाली हार गया, तो बंगाल एक नए विभाजन की ओर बढ़ सकता है और लाखों लोग फिर एक त्रासदी का सामना करने को मजबूर हो सकते हैं।

इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कई जिलों से बंगाली समुदाय के लोगों ने स्वस्फूर्त भागीदारी की। यह इस बात का संकेत है कि बंगाली समाज के हर व्यक्ति के मन में अन्याय के खिलाफ एक लौ जल रही है, लेकिन उस लौ को मशाल में बदलने के लिए अभी पर्याप्त मंच उपलब्ध नहीं है।

कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि बंगाल को बचाने की आवश्यकता आखिर क्यों है। इसके उत्तर में कुछ उदाहरण पर्याप्त होंगे।

जिस बंगाल को माँ दुर्गा की पुण्यभूमि कहा जाता है, वहीं दुर्गा विसर्जन यात्रा के लिए कई बार न्यायालय का आदेश लेना पड़ता है। विसर्जन यात्रा को “कार्निवल” का नाम देकर उसे एक अलग स्वरूप दे दिया गया है।

मुर्शिदाबाद में बंगालियों के घरों में आग लगा दी गई, जिसमें कई लोग ज़िंदा जल गए। संदेशखाली की घटनाओं ने भी पूरे समाज को झकझोर दिया, जहाँ महिलाओं के साथ अत्याचार के आरोप सामने आए।

कोलकाता जैसे भद्र शहर में खुलेआम बीफ की बिक्री होने लगी है। बंगाल में गौ-हत्या के आरोपों और सीमा पार से घुसपैठ को लेकर भी लगातार बहस होती रही है। कई क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलाव भी एक राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

बंगाल सरकार के बजट में मदरसा बोर्ड के लिए 5713 करोड़ रुपये का प्रावधान भी बहस का विषय बना है। आलोचक प्रश्न उठाते हैं कि इन संस्थानों से समाज को किस प्रकार का भविष्य मिलेगा।

यह सूची बहुत लंबी है। सांकेतिक रूप से इतने उदाहरण ही पर्याप्त हैं यह समझने के लिए कि कुछ लोगों के अनुसार बंगाल के भविष्य को लेकर चिंताएँ क्यों व्यक्त की जा रही हैं।

यदि आज भी बंगाली समाज नहीं जागा, तो संभव है कि बहुत देर हो जाए।

— गोपाल सामंतो

फाउंडर

Save Bengal Save India मूवमेंट