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हिंदू समाज की सुरक्षा और एकता में शत्रुबोध की आवश्यकता

आचार्य ललित मुनि

मानव जीवन की एक बड़ी सच्चाई यह है कि बिना शत्रुबोध के कोई भी समुदाय या व्यक्ति अपनी सुरक्षा नहीं कर पाता। शत्रुबोध यानी संभावित खतरों, बाहरी आघातों या आंतरिक कमजोरियों के प्रति सतर्कता की वह भावना न केवल आत्मरक्षा का हथियार है, बल्कि विकास का उत्प्रेरक भी। प्राचीन चीनी दार्शनिक सुन त्ज़ु ने ठीक ही कहा था कि “अपने शत्रु को जान लो, तो सौ युद्धों में विजय निश्चित है।” यह जागरूकता हमें निष्क्रियता से बचाती है, एकजुट करती है और आंतरिक शक्ति जगाती है।

विकासवादी दृष्टि से देखें तो यह ‘लड़ो या भागो’ की प्राकृतिक प्रतिक्रिया है, जो मानव को शिकारियों या प्रतिद्वंद्वियों से बचाती रही। मनोवैज्ञानिक रूप से, यह हमें कमजोरियों का सामना करने की हिम्मत देती है, जैसे कोई कार्यस्थल का प्रतिस्पर्धी हमें बेहतर बनाने को प्रेरित करता है। सामाजिक स्तर पर, साझा शत्रु की अवधारणा समुदाय को बांधती है, जबकि दार्शनिक रूप से जैसे स्टोइक विचारक मार्कस ऑरेलियस के अनुसार दुश्मनों से सीखना ही सबसे बड़ा बदला है।

लेकिन जब बात हिंदू समाज की आती है, तो यह शत्रुबोध एक खोई हुई धरोहर की तरह लगता है, जो सदियों की उपेक्षा और आधुनिक भ्रमों से लुप्त हो चुकी है। फिर भी, आज की परिस्थितियां चीख चीखकर बता रही हैं कि इसे जागृत करना अब अनिवार्य हो गया है। हिंदू समाज, जो विश्व का सबसे प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक तंत्र है, आज बाहरी आघातों जैसे धार्मिक कट्टरता, सांस्कृतिक अपहरण और आंतरिक कमजोरियों जैसे जातिगत विभाजन, सेकुलर होने के भ्रम से जूझ रहा है। शत्रुबोध जागृत करना इनसे निपटने का प्रथम कदम है, जो अस्तित्व की रक्षा से लेकर सामूहिक एकता तक सब कुछ सुनिश्चित करता है।

शत्रुबोध की अवधारणा को समझने के लिए हमें मानव इतिहास की गहराइयों में उतरना होगा। प्राचीन काल से ही मानव मस्तिष्क में यह भावना विकसित हुई है, जो पर्यावरण के खतरों से निपटने में सहायक रही। उदाहरण के लिए, अफ्रीकी सवाना में शिकारियों से बचने के लिए विकसित ‘फाइट ऑर फ्लाइट’ तंत्र आज भी हमारे डीएनए में बसा है। लेकिन मानव समाजों में यह केवल शारीरिक खतरे तक सीमित नहीं रहा; यह सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भी फैला।

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अब्राहमिक धर्मों ईसाई, इस्लाम, यहूदी में यह स्पष्ट रूप से दिखता है। इस्लाम की ‘उम्माह’ अवधारणा मुसलमानों को गैर मुसलिमों (काफिर) के खिलाफ एकजुट रखती है, जबकि ईसाई क्रूसेड्स ने ‘अविश्वासियों’ को शत्रु घोषित कर सदियों तक युद्ध छेड़े। यहूदी समाज ने होलोकॉस्ट जैसी त्रासदी से शत्रुबोध को इतना मजबूत किया कि आज इजरायल की रक्षा नीति उसका प्रतीक है। इन धर्मों में शत्रुबोध न केवल रक्षा का साधन है, बल्कि सामूहिक पहचान का आधार भी। इसके विपरीत, हिंदू समाज में यह भावना अपेक्षाकृत कमजोर रही, जो दार्शनिक सहिष्णुता और ऐतिहासिक पराधीनता का परिणाम है। लेकिन क्या यह कमी प्राकृतिक है या थोपी गई? और क्या आज के दौर में इसे जागृत न करना हिंदू अस्तित्व के लिए घातक सिद्ध होगा?

हिंदू दर्शन की मूल प्रकृति सहिष्णु और समावेशी है, जबकि अब्राहमिक धर्मों में ‘एकमात्र सत्य’ की अवधारणा शत्रु को स्पष्ट परिभाषित करती है। अहिंसा का सिद्धांत, जो महाभारत और भगवद्गीता में संतुलित रूप में वर्णित है ‘अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च’ गांधीजी के नेतृत्व में अतिरेकी हो गया। इससे हिंदू ‘अंधी अहिंसा’ की ओर झुक गए, जो शत्रुबोध को दबाता है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को शत्रुबोध से ही युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन आधुनिक व्याख्याओं में यह ‘सार्वभौमिक भाईचारा’ में बदल गया। परिणामस्वरूप, हिंदू समाज ने आक्रमणों के समय प्रतिकार की बजाय अनुकूलन को चुना, जो लंबे समय तक पराधीनता का कारण बना।

ऐतिहासिक रूप से देखें तो हिंदू समाज पर 1000 ईस्वी से 1850 तक चले इस्लामी आक्रमणों ने शत्रुबोध की कमी को उजागर किया। इतिहासकार के.एस. लाल के अनुसार, इस काल में अनुमानित 6 करोड़ से 8 करोड़ हिंदू मारे गए। महमूद गजनवी के 17 सोमनाथ हमलों से लेकर तैमूर के 1398 के दिल्ली नरसंहार तक, जहां 1 लाख हिंदू कैदियों को मार दिया गया, इन घटनाओं में लाखों मंदिरों को ध्वस्त किया। औरंगजेब के शासन में ही 46 लाख हिंदू मारे गए, जैसा कि इतिहासकारों द्वारा अनुमानित है। ब्रिटिश काल में भी, 1857 के विद्रोह को दबाने के लिए 10 लाख हिंदू मारे गए।

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सबसे घातक प्रहार आजादी के बाद के सेकुलरिज्म की अवधारणा ने किया, जिसे हिंदू समाज ने एक चूरण की तरह चाट लिया। 1947 के विभाजन के बाद नेहरू युग में सेकुलरिज्म को संवैधानिक आधार दिया गया, लेकिन यह पश्चिमी मॉडल फ्रांसीसी लाइसिटे जैसा था, जो हिंदू बहुसंख्यक समाज की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता। कांग्रेस ने इसे “सभी धर्मों के प्रति समान दूरी” के रूप में पेश किया, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” बन गया। विभाजन की त्रासदी जिसमें 10 लाख हिंदू मारे गए के बावजूद, हिंदू नेताओं ने “भाईचारे” का नारा देकर शत्रुबोध को दबा दिया। सेकुलरिज्म ने हिंदू को सिखाया कि “सभी धर्म समान” हैं, जिससे बाहरी खतरों जैसे जिहादी तत्व या मिशनरी कन्वर्जन को नजरअंदाज करना सामान्य हो गया।

शिक्षा प्रणाली में हिंदू इतिहास को विकृत किया गया। आक्रमणों को “सांस्कृतिक आदान प्रदान” कहा गया, जबकि नालंदा विश्वविद्यालय का 1193 में विनाश किया गया,  जिसमें 90 लाख पांडुलिपियां जलाने को भुला दिया गया। मीडिया ने भी भूमिका निभाई, जहां हिंदू अत्याचारों को कमतर आंका गया। राजनीतिक रूप से, यह तुष्टिकरण हिंदू को दोयम दर्जे का बना देता है जैसे समान नागरिक संहिता (UCC) को टालना या कश्मीर अपराधियों को “राजनीतिक कैदी” कहना। 1950-2000 के बीच, मंदिरों पर राज्य नियंत्रण ने हिंदू धार्मिक संस्थाओं को कमजोर किया, जबकि अल्पसंख्यक संस्थान स्वतंत्र रहे।

सेकुलरिज्म ने जातिगत विभाजन को बढ़ावा दिया “सामाजिक न्याय” के नाम पर आरक्षण ने हिंदू एकता को तोड़ा। परिणाम? हिंदू समाज आंतरिक कलह में उलझा रहा, जबकि अन्य धर्म एकजुट रहे। आज सोशल मीडिया पर हुई चर्चाएं बताती हैं कि सेकुलरिज्म को “हिंदुओं के खिलाफ हथियार” माना जा रहा है, जो उनकी आस्था पर चोट करने का काम करता है। पहले 50 वर्षों में भारत ने बहुलवाद को बनाए रखा, लेकिन अब हिंदुत्व बनाम सेकुलरिज्म की जंग में हिंदू पहचान दांव पर लगी है। आलोचक तर्क देते हैं कि यह “रेडिकल मेजॉरिटेरियनिज्म” को जन्म देता है, लेकिन वास्तव में, यह हिंदू को निष्क्रिय बनाता है।

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सेकुलरिज्म का यह “चूरण” हिंदू मनोविज्ञान को गहराई से प्रभावित करता है। युवा पीढ़ी, जो स्कूलों में विकृत इतिहास पढ़ती है, शत्रु नहीं पहचान पाती। सोशल मीडिया पर हिंदू “सेकुलर” बने रहते हैं, जबकि मुस्लिम या ईसाई समुदाय अपनी पहचान मजबूत रखते हैं। उदाहरण के लिए, केरल में हिंदू बीफ खाकर “मॉडर्न” बनने की प्रवृत्ति शत्रुबोध की कमी का प्रतीक है। राजनीतिक दलों ने भी इसका फायदा उठाया कांग्रेस जैसे दलों ने हिंदू को “दोयम दर्जे” का बनाया, जैसे सांप्रदायिक हिंसा बिल में। वामपंथी इतिहासलेखन ने हिंदुत्व को “खतरा” बताया, जिससे आंतरिक कलह बढ़ा। राम मंदिर विवाद में विलंब इसी का परिणाम था। सेकुलरिज्म ने “सार्वभौमिक भाईचारा” का भ्रम बुना, लेकिन यह हिंदू विरोधी ताकतों को मजबूत करता रहा। वैश्विक संदर्भ में, भारत का सेकुलर मॉडल अनोखा है ज्यादातर बहुसंख्यक देशों में राज्य धर्म से जुड़ा होता है। लेकिन भारत में यह बहुसंख्यकों को ही नुकसान पहुंचाता है।

शत्रुबोध जागृत करने के लाभ अनेक हैं। व्यक्तिगत स्तर पर, यह आत्मविश्वास जगाता है जैसे कोई व्यक्ति प्रतिद्वंद्वी से सीखकर मजबूत होता है। सामाजिक स्तर पर, साझा खतरा एकता पैदा करता है, जो जाति आधारित विभाजनों को तोड़ सकता है। विचारक कहते हैं कि “वर्ण और जाति आधारित विभाजन के होते हुए भी, हिंदू एकता संभव है, लेकिन इसके लिए शत्रुबोध का मजबूत आभास होना आवश्यक है।” अंत में, शत्रुबोध नफरत नहीं, बल्कि जागृति है एक ऐसा दर्पण जो हमें अपनी ताकत दिखाता है। अब सोचने का समय है, सदियों की उपेक्षा से उबरकर, इतिहास में घटे विस्थापन को सबक बनाकर, हम फिर से मजबूत हो सकते हैं। यदि न जागे, तो खोई धरोहरें कभी लौटेंगी नहीं। लेकिन यदि जागे, तो न केवल बचेंगे, बल्कि विश्व को फिर से प्रेरित करेंगे। यह समय है शत्रुबोध को अपनाने का, अपनी रक्षा का। हिंदू एकता का सपना साकार करने का।