पश्चिमी विकास मॉडल के विकल्प के रूप में एकात्म मानववाद

पश्चिमी विकास मॉडल के विकल्प के रूप में एकात्म मानववाद की अवधारणा आज के समय में विशेष महत्व रखती है, क्योंकि विश्व भर में भौतिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरणीय संकट, सामाजिक असमानता, मानसिक स्वास्थ्य की गिरावट और नैतिक मूल्यों का क्षय जैसे मुद्दे गहराते जा रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा 1965 में मुंबई में दिए गए चार व्याख्यानों में प्रतिपादित यह दर्शन पूंजीवाद की अंधी व्यक्तिवादी प्रतिस्पर्धा और साम्यवाद की केंद्रीकृत सामूहिकता दोनों से अलग एक समग्र, भारतीय जड़ों वाला मार्ग प्रस्तुत करता है। यह दर्शन व्यक्ति को केवल आर्थिक या राजनीतिक इकाई नहीं मानता, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के एकीकरण पर जोर देता है, जहां विकास का अर्थ केवल धन-संपत्ति का संचय नहीं, बल्कि पूर्ण मानवीय गरिमा, सद्भाव और सृष्टि के साथ एकात्मता है।
यह विचारधारा पश्चिमी मॉडल की कई मूलभूत कमियों की ओर इशारा करती है, जैसे कि व्यक्ति और समाज, मानव और प्रकृति, भौतिक और आध्यात्मिक के बीच कृत्रिम द्वंद्व पैदा करना। एकात्म मानववाद इन द्वंद्वों को समाप्त कर एकता और संतुलन की बात करता है। यह भारत की प्राचीन परंपरा से प्रेरित है, जहां ‘धर्म’ को अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों की सिद्धि के रूप में देखा जाता है। वर्तमान वैश्विक संदर्भ में यह दर्शन जलवायु परिवर्तन, बढ़ती असमानता और उपभोगवाद से उत्पन्न संकटों के बीच एक आशा की किरण के रूप में उभरता है, जो सतत, समावेशी और मानव-केंद्रित विकास का वैकल्पिक रास्ता दिखाता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जब 1965 में एकात्म मानववाद का प्रतिपादन किया, तब विश्व दो बड़े वैचारिक खेमों में बंटा हुआ था। एक ओर पूंजीवाद था, जो अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में प्रबल था और जहां व्यक्ति की स्वतंत्रता, बाजार की अदृश्य शक्ति और अधिकतम लाभ को सर्वोच्च स्थान दिया जाता था। दूसरी ओर समाजवाद और साम्यवाद था, जो सोवियत संघ और चीन जैसे देशों में राज्य के केंद्रीकरण, वर्ग-संघर्ष और सामूहिक स्वामित्व पर आधारित था। भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन दोनों में से किसी एक को अपनाने के दबाव में था। नेहरूवादी नीतियां समाजवादी झुकाव वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था की ओर गईं, लेकिन मूल में पश्चिमी औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की नकल पर टिकी थीं। दीनदयाल जी ने इन दोनों को भारतीय संदर्भ में अपर्याप्त और खंडित माना। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद व्यक्ति को आर्थिक प्राणी बना देता है, जहां प्रतिस्पर्धा और उपभोग मुख्य मूल्य बन जाते हैं, जबकि समाजवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुंठित कर राज्य को सर्वशक्तिमान बना देता है। दोनों में ही मानव का समग्र विकास उपेक्षित रह जाता है।
एकात्म मानववाद का मूल आधार यह है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है। उसके चार आयाम हैं, शरीर जो भौतिक आवश्यकताओं से जुड़ा है, मन जो भावनाओं और संबंधों का केंद्र है, बुद्धि जो विचार और निर्णय की शक्ति है, और आत्मा जो आंतरिक शांति और नैतिकता का स्रोत है। इन चारों का एकीकरण ही पूर्ण मानव बनाता है। यदि विकास केवल शरीर की भूख मिटाने तक सीमित रहे, तो मन उदास, बुद्धि भटकी हुई और आत्मा खोखली हो जाती है। पश्चिमी मॉडल में यही हुआ है, भौतिक समृद्धि बढ़ी, लेकिन अवसाद, अकेलापन और नैतिक संकट भी बढ़े। एकात्म मानववाद कहता है कि विकास इन चारों आयामों को साथ लेकर चलना चाहिए।
यह दर्शन व्यक्ति और समाज के बीच भी कोई विरोध नहीं देखता। पश्चिमी व्यक्तिवाद में व्यक्ति सर्वोपरि है और समाज केवल व्यक्तियों का योग होता है, जबकि साम्यवाद में समाज या राज्य सर्वोच्च है और व्यक्ति उसकी सेवा में बाध्य। दीनदयाल जी ने कहा कि व्यक्ति और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं, जैसे सर्पिलाकार मंडल जहां केंद्र में व्यक्ति है, फिर परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व और अंत में अनंत ब्रह्मांड। हर स्तर एक-दूसरे से जुड़ा है और एक-दूसरे के विकास से ही अपना विकास करता है। यदि व्यक्ति स्वार्थी हो जाए, तो समाज टूटता है; यदि समाज व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ले, तो रचनात्मकता मर जाती है। एकात्म मानववाद सहयोग और सद्भाव पर आधारित समाज की कल्पना करता है, जहां वर्ग-संघर्ष की जगह सह-अस्तित्व होता है।
आर्थिक दृष्टि से यह दर्शन विकेंद्रीकरण पर जोर देता है। पश्चिमी पूंजीवाद बड़े उद्योगों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और केंद्रीकृत पूंजी पर टिका है, जिससे धन कुछ हाथों में केंद्रित हो जाता है और ग्रामीण भारत जैसे क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं। एकात्म मानववाद छोटे-कुटीर उद्योगों, ग्राम-केंद्रित अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता की बात करता है। दीनदयाल जी का मानना था कि छोटे उद्योग व्यक्ति की रचनात्मकता को बढ़ावा देते हैं, अधिक रोजगार पैदा करते हैं और पर्यावरण का कम दोहन करते हैं। बड़े उद्योग केवल उन क्षेत्रों में होने चाहिए जहां आवश्यक हो, अन्यथा वे पर्यावरण और सामाजिक संतुलन बिगाड़ देते हैं। अंत्योदय का सिद्धांत यहां महत्वपूर्ण है, सबसे पिछड़े व्यक्ति का उत्थान ही समाज का सच्चा विकास है। यह गांधीजी के सर्वोदय से प्रेरित है, लेकिन इसमें भारतीय चिंतन की गहराई है।
प्रकृति के साथ संबंध में एकात्म मानववाद पश्चिमी मॉडल की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर करता है। पश्चिम में ‘प्रकृति पर मानव की विजय’ का विचार प्रमुख रहा है। औद्योगीकरण ने जंगलों को काटा, नदियों को प्रदूषित किया और वायु को जहरीला बनाया। आज जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता की हानि और प्राकृतिक आपदाएं इसी का परिणाम हैं। एकात्म मानववाद प्रकृति को मां मानता है, न कि शोषण की वस्तु। यह सह-अस्तित्व और संयम की बात करता है। उपभोगवाद के बजाय संतोष और आवश्यकता-आधारित जीवन पर जोर देता है। यह विचार आज के सतत विकास लक्ष्यों से मेल खाता है, जहां पर्यावरण संरक्षण विकास का हिस्सा है, न कि उसका विरोधी।
राजनीतिक स्तर पर यह दर्शन लोकतंत्र को धर्म पर आधारित बनाना चाहता है। यहां धर्म का अर्थ नैतिकता और कर्तव्यबोध है, न कि संकीर्ण धार्मिकता। राज्य सेवा-भाव से कार्य करे, शक्ति का केंद्र न बने। सत्ता का विकेंद्रीकरण हो, ग्राम पंचायत से लेकर केंद्र तक अधिकार और जिम्मेदारियां बंटी हों। दीनदयाल जी कहते थे कि राजनीति साधन है, साध्य नहीं। आज जब राजनीति सत्ता-सुख का खेल बन गई है, तब यह विचार और प्रासंगिक हो जाता है।
एकात्म मानववाद शिक्षा, संस्कृति और नैतिकता को भी केंद्र में रखता है। शिक्षा केवल रोजगार के लिए नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण और समग्र विकास के लिए होनी चाहिए। मातृभाषा में शिक्षा, भारतीय मूल्यों का समावेश और व्यावहारिक ज्ञान पर बल दिया गया है। संस्कृति को विकास का आधार माना गया है, क्योंकि बिना सांस्कृतिक जड़ों के कोई समाज मजबूत नहीं रह सकता। पश्चिमी मॉडल ने सेक्यूलरिज्म के नाम पर आध्यात्मिकता को हाशिए पर धकेल दिया, लेकिन एकात्म मानववाद आध्यात्मिकता को जीवन का अभिन्न अंग मानता है।
वर्तमान विश्व में यह दर्शन अत्यंत प्रासंगिक है। कोविड महामारी ने दिखाया कि केवल भौतिक समृद्धि पर्याप्त नहीं, सामाजिक एकजुटता और आंतरिक शक्ति जरूरी है। जलवायु संकट ने उपभोगवाद की सीमाएं उजागर की हैं। बढ़ती असमानता ने पूंजीवाद की विफलता दिखाई है। भारत जैसे देश में जहां विविधता है, वहां पश्चिमी मॉडल की एकरूपता फिट नहीं बैठती। एकात्म मानववाद विविधता में एकता का सम्मान करता है। आत्मनिर्भर भारत, सबका साथ सबका विकास जैसी नीतियां इसी दर्शन से प्रभावित दिखती हैं।
हालांकि, इस दर्शन को लागू करने में चुनौतियां हैं। वैश्वीकरण के दौर में विकेंद्रीकरण और छोटे उद्योगों को बनाए रखना कठिन है। तकनीकी प्रगति को संतुलित करना पड़ता है। व्यावहारिक नीति-निर्माण में आदर्श और वास्तविकता के बीच सामंजस्य बिठाना आवश्यक है। फिर भी, यह दर्शन कोई स्थिर सिद्धांत नहीं है, यह गतिशील है और समय के अनुसार अनुकूलित हो सकता है। यह केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक विकल्प है, जहां विकास का अर्थ पूर्ण मानवता का उत्थान है, न कि केवल आर्थिक संख्याएं।
एकात्म मानववाद हमें याद दिलाता है कि सच्चा विकास वह है जो व्यक्ति को पूर्ण बनाए, समाज को सद्भावपूर्ण बनाए, प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखे और आध्यात्मिक उन्नति को भौतिक प्रगति के साथ जोड़े। आज के संकटपूर्ण समय में यही दर्शन एक नई उम्मीद जगाता है एक ऐसे विश्व की, जहां मानव केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि सृष्टि का संरक्षक और सहयात्री हो।
