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वैश्विक उथल-पुथल के बीच आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बजट 2026-27

प्रहलाद सबनानी

भारत की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने रविवार के दिन दिनांक 1 फरवरी 2026 को भारतीय संसद में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया। इस बजट में की गई घोषणाओं के माध्यम से वैश्विक स्तर पर घटित हो रही आर्थिक उथल-पुथल से भारत को सुरक्षित रखने का स्पष्ट प्रयास दिखाई देता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपने द्वितीय कार्यकाल में वर्ष 2025 के दौरान अनेक देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगातार टैरिफ लगाए गए। इसके प्रत्युत्तर में कई देशों ने भी अमेरिका से आयात पर प्रतिकारी टैरिफ लगाने की घोषणाएँ कीं। चीन ने तो प्रतिशोध स्वरूप अमेरिका को दुर्लभ खनिज पदार्थों की आपूर्ति तक रोक दी थी। इससे पहले अमेरिका ने भी चीन को सेमीकंडक्टर एवं चिप्स की आपूर्ति बाधित करने का प्रयास किया था। कुल मिलाकर, कई देश आपस में विभिन्न वस्तुओं के आयात-निर्यात को सीमित करने के प्रयासों में लगे रहे, जिससे वैश्विक आर्थिक वातावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

इसी क्रम में ट्रम्प प्रशासन ने भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न वस्तुओं के निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया, जो अन्य देशों की तुलना में संभवतः सबसे अधिक है।

इन वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बजट 2026-27 में तीन प्रमुख कर्तव्यों को केंद्र में रखा गया है। पहला, विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करते हुए भारत की आर्थिक विकास दर को और तेज करना, ताकि वैश्विक अस्थिरता का प्रभाव कम किया जा सके। दूसरा, भारतीय युवाओं में कौशल विकास को बढ़ावा देना, जिससे वे तकनीकी क्षेत्र में हो रहे वैश्विक परिवर्तनों के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सकें। तीसरा, समावेशी विकास को सुनिश्चित करना, ताकि देश का कोई भी नागरिक, नगर या राज्य आर्थिक विकास की मुख्यधारा से बाहर न रहे।

इन प्रतिकूल वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ती रही है। किंतु इस गति को आने वाले वर्षों में भी बनाए रखने के उद्देश्य से बजट 2026-27 में कई महत्वपूर्ण घोषणाएँ की गई हैं।

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भारत वर्तमान में दुर्लभ खनिज पदार्थों तथा सेमीकंडक्टर और चिप्स का भारी मात्रा में आयात करता है। आज चिप्स को आधुनिक उत्पादों के निर्माण में तेल के समान आवश्यक माना जाने लगा है। इन दोनों क्षेत्रों में चीन और अमेरिका का लगभग एकाधिकार है। भारत स्वयं को इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाना चाहता है। इसी दृष्टि से बजट में ओड़िशा, केरल, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश की खदानों से कच्चे माल के निष्कर्षण एवं उसके प्रसंस्करण हेतु एक विशेष कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा की गई है, जिससे देश में ही दुर्लभ खनिज पदार्थों का उत्पादन बढ़ सके।

इसी प्रकार, भारत में ही सेमीकंडक्टर और चिप्स के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए विनिर्माण इकाइयों की स्थापना हेतु कई उपाय घोषित किए गए हैं। इस उद्देश्य से 40,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 लागू करने की घोषणा भी की गई है। इससे इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को बल मिलेगा।

हाल के वर्षों में भारत ने अनेक देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए हैं, जिनमें यूरोपीय यूनियन के 27 देशों के समूह के साथ किया गया समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है, क्योंकि यह 28 देशों के बीच एक साथ किया गया सबसे बड़ा समझौता है। इन समझौतों से वस्त्र एवं परिधान, समुद्री उत्पाद, चमड़ा, खिलौना तथा जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योगों को विशेष लाभ मिलने की संभावना है। इन क्षेत्रों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की बड़ी भागीदारी है।

इन्हीं संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए बजट में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को रियायतें देने का प्रयास किया गया है। इसके लिए 10,000 करोड़ रुपये का एसएमई फंड भी स्थापित किया गया है। टेक्सटाइल उद्योग को विशेष प्रोत्साहन दिया गया है, ताकि भारत में निर्मित वस्त्र और परिधान वैश्विक बाजार में मजबूती से अपनी पहचान बना सकें। इसके अतिरिक्त, बायोफार्मा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए “बायोफार्मा शक्ति” के रूप में 10,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फंड भी प्रस्तावित किया गया है, जिससे भारतीय दवा उद्योग को वैश्विक स्तर पर और मजबूती मिलेगी।

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किसी भी अर्थव्यवस्था की प्रगति में मजबूत आधारभूत संरचना की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण बजट 2026-27 में पूंजीगत व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में पूंजीगत व्यय के लिए 11.2 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किए गए थे, जिन्हें बढ़ाकर 12.20 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो लगभग 9 प्रतिशत की वृद्धि है। वर्ष 2014-15 में यह राशि मात्र 2 लाख करोड़ रुपये थी। पिछले 13 वर्षों में पूंजीगत व्यय में छह गुना से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

पूंजीगत व्यय में वृद्धि से विभिन्न क्षेत्रों में सरकारी निवेश बढ़ता है और इसके परिणामस्वरूप रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं। अब निजी क्षेत्र को भी अपने निवेश में वृद्धि करनी होगी, क्योंकि उत्पादन क्षमता का उपयोग 80 प्रतिशत से अधिक होने की स्थिति में नई विनिर्माण इकाइयों की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होगी। इससे विदेशी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

भारत में वस्तुओं के आवागमन में रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी को ध्यान में रखते हुए बजट में सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा की गई है। ये कॉरिडोर मुंबई-पुणे, पुणे-हैदराबाद, हैदराबाद-बेंगलुरु, हैदराबाद-चेन्नई, चेन्नई-बेंगलुरु, दिल्ली-वाराणसी तथा वाराणसी-सिलीगुड़ी के बीच बनाए जाएंगे। ये क्षेत्र भविष्य में विकास के नए केंद्र बन सकते हैं।

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भारत को वैश्विक लॉजिस्टिक हब बनाने के उद्देश्य से 10,000 करोड़ रुपये का विशेष फंड स्थापित किया जा रहा है, जिससे देश में ही कंटेनर निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। मेडिकल टूरिज्म को प्रोत्साहित करने के लिए पाँच हब विकसित किए जाएंगे, जिनमें निजी क्षेत्र और राज्यों की भी भागीदारी होगी। इससे उच्च गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएँ किफायती दरों पर उपलब्ध होंगी और विदेशी नागरिक भारत की ओर आकर्षित होंगे। इसी प्रकार, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु बौद्ध सर्किट का विकास किया जा रहा है, जिससे बौद्ध धर्म के अनुयायी भारत आने के लिए प्रेरित होंगे।

वैश्विक स्तर पर एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट, गेमिंग और कॉमिक्स उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय युवाओं को इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बजट में इस क्षेत्र को विशेष प्रोत्साहन दिया गया है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र में 20 लाख युवाओं की आवश्यकता होगी। इसके लिए विद्यालयों और महाविद्यालयों में संबंधित शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है।

आयकर की दरों में किसी प्रकार की वृद्धि प्रस्तावित नहीं की गई है। इसके विपरीत, आयकर नियमों को सरल बनाया गया है। नई कर व्यवस्था के अंतर्गत 12 लाख रुपये तक की आय पर शून्य आयकर लागू किया गया है। आयकर रिटर्न दाखिल करने की समय-सीमा भी बढ़ाई जा रही है।

वित्तीय अनुशासन इस बजट की एक अन्य प्रमुख विशेषता है। बजटीय घाटे को नियंत्रित रखते हुए वित्तीय वर्ष 2025-26 में इसे सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 प्रतिशत तक सीमित रखा गया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में इसे और घटाकर 4.3 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि इसी दौरान पूंजीगत व्यय में 1.1 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि भी प्रस्तावित है। यह संतुलन भारत की आर्थिक मजबूती को दर्शाता है।