सामाजिक समरसता और नवजीवन का त्योहार वासन्ती नव सस्येष्टि पर्व

भारतीय जीवन पद्धति में उत्सव केवल उल्लास का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे समाज, प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन स्थापित करने वाले सांस्कृतिक विधान रहे हैं। भारत का प्रत्येक पर्व किसी न किसी जीवन सत्य से जुड़ा हुआ है। होली भी ऐसा ही पर्व है, जिसकी जड़ें केवल पौराणिक कथा में नहीं बल्कि वैदिक कृषि संस्कृति और सामूहिक जीवन व्यवस्था में गहराई तक समाई हुई हैं।
समय के साथ जब परम्पराओं का मूल अर्थ विस्मृत होने लगता है, तब उनके प्रतीकों को लेकर भ्रम भी उत्पन्न होने लगते हैं। होली का त्योहार आते ही वामपंथी एवं नव बौद्धों द्वारा आज होलिका दहन को लेकर अनेक प्रकार के वैचारिक प्रश्न उठाए जाते हैं और इसे किसी स्त्री के दहन से जोड़कर देखा जाता है। किंतु भारतीय परम्परा का अध्ययन स्पष्ट करता है कि होली का मूल स्वरूप किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि नव अन्न, ऋतु परिवर्तन और सामूहिक यज्ञ परम्परा से जुड़ा हुआ है।
होली का प्राचीनतम नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है। संस्कृत में ‘सस्य’ का अर्थ अन्न और ‘येष्टि’ का अर्थ यज्ञ होता है। अर्थात् वसन्त ऋतु में उत्पन्न नई फसल को अग्नि में समर्पित कर देवताओं और पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना। भारतीय कृषक जीवन में यह नियम रहा कि नया अन्न पहले प्रकृति और देव शक्तियों को अर्पित किया जाए, उसके बाद ही मनुष्य उसका उपभोग करे। यह परम्परा केवल धार्मिक विश्वास नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति थी।
वेदों में कहा गया है—
“अग्निर्वै देवानां मुखम्।”
अर्थात् अग्नि देवताओं का मुख है।
अन्न जब अग्नि में समर्पित किया जाता है तो वह सूक्ष्म रूप में समस्त सृष्टि तक पहुँचता है। यही कारण है कि नवान्न को अग्नि में अर्पित करने की परम्परा विकसित हुई, जिसे आगे चलकर होलिकोत्सव कहा गया।
संस्कृत कोशों में ‘होलक’ शब्द का उल्लेख मिलता है।
तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलकः।
अर्थात् तिनकों की अग्नि में भुना हुआ अधपका नया अन्न ‘होलक’ कहलाता है।
आयुर्वेद ग्रंथ भावप्रकाश में इसका स्वास्थ्य संबंधी महत्व भी बताया गया है—
अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृणभ्रष्टैश्च होलकः
होलकोऽल्पानिलो मेदः कफदोष श्रमापहः॥
अर्थ यह है कि इस प्रकार भुना हुआ नया अन्न शरीर के दोषों को संतुलित करता है और ऋतु परिवर्तन से उत्पन्न रोगों को कम करता है।
यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि होली मूलतः कृषि और स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़ा उत्सव था।
लोक परम्परा में ‘होलिका’ शब्द का अर्थ भी प्रतीकात्मक है। किसी भी अनाज का बाहरी आवरण, जो भीतर के बीज की रक्षा करता है, उसे होलिका कहा गया। जब चना, जौ या गेहूँ अग्नि में भुने जाते हैं तो सबसे पहले उनका बाहरी छिलका जलता है, जबकि भीतर का जीवन सुरक्षित रहता है। इसी को लोक ने प्रह्लाद और होलिका के प्रतीक में व्यक्त किया। बाहरी आवरण स्वयं नष्ट होकर जीवन को बचाता है। इसीलिए लोक में “होलिका माता की जय” कहा गया, जो त्याग और संरक्षण का भाव है, न कि दमन का।
भारतीय ऋषियों ने ऋतु परिवर्तन के प्रभाव को भी गहराई से समझा था। आयुर्वेद का सिद्धांत है—
“ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते।”
अर्थात् ऋतुओं के संधिकाल में रोग उत्पन्न होते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा हेमन्त और वसन्त के मिलन का समय है। वातावरण में संक्रमण बढ़ने की संभावना रहती है। इसलिए सामूहिक अग्नि, औषधीय धूम्र और यज्ञ का आयोजन किया जाता था। तिल, जौ, गोबर, लकड़ी और औषधीय वनस्पतियों का दहन वातावरण को शुद्ध करता था। इस प्रकार होलिका दहन समाज की सामूहिक स्वास्थ्य रक्षा की प्रक्रिया भी था।
वैदिक परम्परा में वर्ष के तीन प्रमुख यज्ञ काल निर्धारित थे—आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन पूर्णिमा। शास्त्रों में उल्लेख है—
“फाल्गुन्या पौर्णमास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत।”
अर्थात् फाल्गुन पूर्णिमा पर यज्ञ का अनुष्ठान किया जाना चाहिए। यह काल नए संवत्सर के आरम्भ का भी संकेत माना जाता था।
होली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी सामाजिक संरचना थी। यह ऐसा पर्व था जिसमें सम्पूर्ण ग्राम समाज एक साथ सम्मिलित होता था। सभी वर्ग, सभी परिवार और सभी आयु समूह एक ही अग्नि के चारों ओर एकत्र होते थे। होलिका में डाले जाने वाले ‘आखत’ वास्तव में अक्षत अर्थात् चावल की आहुति थे। परिक्रमा करना यज्ञ प्रक्रिया का अंग था। सामूहिक अग्नि से घर-घर अग्नि ले जाकर छोटे हवन किए जाते थे। इससे समाज में एकता और सहभागिता की भावना विकसित होती थी।
होली के अगले दिन रंगोत्सव का आयोजन भी सामाजिक मनोविज्ञान से जुड़ा था। रंग मनुष्य के बाहरी भेद मिटा देते हैं। जाति, पद, वर्ग और सामाजिक दूरी समाप्त हो जाती है। लोग गले मिलते हैं और मन के द्वेष समाप्त करते हैं। यही कारण है कि होली को सामाजिक समरसता का पर्व कहा गया।
पौराणिक कथा में हिरण्यकश्यपु, प्रह्लाद और होलिका का प्रसंग वास्तव में दार्शनिक प्रतीक है। हिरण्यकश्यपु अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है, प्रह्लाद सत्य और आस्था का, जबकि होलिका शक्ति के दुरुपयोग का प्रतीक है। संदेश स्पष्ट है कि अन्याय के साथ खड़ी शक्ति अंततः नष्ट होती है और सत्य सुरक्षित रहता है।
भारतीय संस्कृति में अग्नि विनाश का नहीं, संस्कार का प्रतीक है। विवाह से लेकर यज्ञ तक अग्नि साक्षी होती है। होली की अग्नि भी मनुष्य के भीतर संचित अहंकार, ईर्ष्या और वैमनस्य को जलाने का प्रतीक है।
कृषि दृष्टि से देखें तो यह किसान का उत्सव है। नई फसल पक चुकी होती है। खेतों में जीवन लौट आता है। प्रकृति नवयौवन से भर उठती है। किसान जौ की बालियाँ और चने भूनकर प्रसाद के रूप में बाँटता है। यह धरती और अन्न के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।
भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र रहा है—
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
अर्थात् सभी सुखी हों और सभी निरोग रहें।
होली इसी सामूहिक मंगल भावना की अभिव्यक्ति है। यह किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने की परंपरा है।
आज आवश्यकता है कि होली को उसके मूल स्वरूप में पुनः समझा जाए। पर्यावरण अनुकूल सामग्री, औषधीय यज्ञ, प्राकृतिक रंग और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से इस पर्व को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
होली वस्तुतः यह स्मरण कराती है कि जीवन तभी सुरक्षित रहता है जब समाज सामूहिक रूप से उत्सव मनाता है, प्रकृति का सम्मान करता है और अपने अहंकार को अग्नि में समर्पित करता है।
इस दृष्टि से होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस जीवित परंपरा का प्रतीक है जिसमें पहले समर्पण है, फिर उपभोग; पहले समाज है, फिर व्यक्ति; और पहले प्रकृति है, फिर मानव।
इसीलिए कहा जा सकता है कि वैदिक काल से आज तक होली भारतीय समाज को जोड़ने वाली समरसता, कृतज्ञता और नवजीवन की अग्नि रही है। सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं एवं हार्दिक बधाई॥
