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भारतीय ज्ञान परम्परा में धूम्रपान चिकित्सा पद्धति

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU

वर्तमान समय में युवाओं, वृद्धों और अन्य सभी के मन, मस्तिष्क, शरीर, आदत इत्यादि से धूम्रपान को पूर्णतः समाप्त तो नहीं किया जा सकता है, अपितु वैदिक धूम्रपान चिकित्सा पद्धति या सनातन ग्रन्थ संबंधित धूम्रपान केंद्रित चिकित्सा प्रणाली को विकसित किया जा सकता है। और धूम्रपान के माध्यम से विभिन्न प्रकार की औषधीय गुणों को युवाओं, वृद्धों और अन्य सभी के मन, मस्तिष्क, शरीर, आदत और प्रतिदिन के व्यवहार में लाया जा सकता है। मनुष्य नशा रोगयुक्त ना करे, अपितु नशा औषधि युक्त करें। मानव शरीर में नशा के द्वारा विभिन्न प्रकार की औषधीय गुण जाएं, उनके शरीर में बीमारी और प्रदूषण ना जाए। इसलिए नशा औषधि युक्त हो, वैदिक नशा हो, सनातन नशा हो।

औषधियों के धूम्र को पान करने की एक चिकित्सा पद्धति भी आयुर्वेदिक ग्रन्थोंमें वर्णित है। यज्ञों द्वारा अग्निकुण्ड से निकले पवित्र होतव्य द्रव्य से उद्दीप्त वायुद्वारा सम्पूर्ण वायुमण्डल को पवित्रता सर्वविश्रुत ही है। इस धूमसे न केवल देवता आप्यायित होते हैं, अपितु सम्पूर्ण प्राणिजगत् लाभान्वित होता है। प्राचीन कालमें नित्य हवनकी परम्परा थी। जिससे पूरा परिसर सुगन्धित रहता था। आयुर्वेदके आचार्योंने रोगोंके उपशमनके लिये विशेष प्रकारको औषधियोंद्वारा धूम्रवर्तिकाका निर्माण करके पुनः उसे प्रज्वलित कर विधिपूर्वक धूम्रके सेवनका विधान किया है, जिससे अनेक रोग शान्त हो जाते हैं। यह धूम्रपान आजके तथाकथित पतनकारी और अनारोग्यकारक धूम्रपानसे सर्वथा भिन्न है।

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इसमें यह सिद्धान्त है कि जब मादक द्रव्योंको गन्ध अग्रिके संसर्गसे तीव्र होकर शरीरको अधिक हानि पहुँचाती है तथा नये विकार उत्पन्न करती है तो रोगनाशक या पौष्टिक द्रव्य निश्चय ही अग्निके माध्यमसे विखण्डित हो, धूम्रपानद्वारा शरीरको पुष्टि तथा आरोग्य प्रदान करेंगे।

धूम्रपानके लाभके विषयमें आचार्य चरक बताते हैं- धूम्रपान करनेसे सिरका भारीपन, शिरःशूल पोनस, अर्थाव-भेदक (Hemicrania), शूल, कास, हिचकी, दमा, गलग्रह, दाँतोंकी दुर्बलता, कान, नाक, नेत्रोंसे दोषजन्य-लावका होना, पूतिघ्राण (नाकसे दुर्गन्धका निकलना Ogoena), आस्यगन्ध (Foul smell of mouth), दाँतका शूल, खालित्य, केशोंका पीला होना, केशोंका गिरना (इन्द्रलुप्त), छींक आना, अधिक तन्द्रा होना, बुद्धि (ज्ञानेन्द्रियों) का व्यामोह होना तथा अधिक निद्रा आना आदि अनेक रोग शान्त होते हैं। बाल, कपाल, इन्द्रियोंका तथा स्वरका बल अधिक बढ़ता है, जो व्यक्ति मुखसे धूम्र-सेवन करता है, उसे जत्रु (ठोड़ी)-के ऊपरी भागमें होनेवाले रोग विशेषकर शिरोभागमें वात-कफजन्य बलवती व्याधियाँ नहीं होती हैं। (चरक सू० ५। २७-३३।)

यदि सिर, नाक और नेत्रगत दोष हो और धूम्र पीने योग्य पुरुष हो तो उसे नासिकासे धूम्रपान करना चाहिये और यदि कण्ठगत दोष हो तो मुखसे धूम्र पोना चाहिये। नासिकासे धूम्र पीनेके बाद धूम्रको मुखसे हो निकालना चाहिये। धूम-कवल (घूँट) मुखसे लेनेपर नासिकासे कभी न निकाले; क्योंकि विरुद्ध मार्गमें गया हुआ धूम नेत्रोंको नष्ट कर देता है।
धूमयोग्यः पिबेद्दोपे शिरोघ्राणाक्षिसंश्रये ॥

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घ्राणेनास्येन कण्ठस्थे मुखेन घ्राणपो वमेत्। आस्येन धूमकवलान् पिबन् घ्राणेन नोद्वमेत् ॥ प्रतिलोमं गतो ह्याशु धूमो हिंस्याद्धि चक्षुषी। (चरक सूत्र० ५/४६-४८)

औषधिके धूम्रपानकी विधिका वर्णन करते हुए लिखा गया है कि रोगके अनुसार निर्धारित औषधियोंको कूट-छानकर एक सरकंडेके ऊपर लपेटकर जौके आकारकी (बीचमें मोटी आदि-अन्तमें पतली) अँगूठेके समान मोटी तथा आठ अंगुल लम्बी वर्ति (बत्ती) बनानी चाहिये। छायामें रखनेपर जब बत्ती सूख जाय तो सीकको निकालकर घृत, तेल आदि स्नेहसे उसे आर्द्रकर धूमनेत्र (Cigarette Holder) में रखकर अग्निसे जलाकर इस सुखकारी प्रायोगिक धूम्रका धीरे-धीरे तीन या नौ बार सुखपूर्वक सेवन करना चाहिये। धूम्रपानहेतु योग (मिश्रणहेतु औषधियों) का वर्णन करते हुए महर्षि चरक लिखते हैं-

हरेणुकां प्रियङ्गु च पृथ्वीकां केशरं नखम् ॥ ह्रीवेरं चन्दनं पत्रं त्वगेलोशीरपद्मकम् । ध्यामकं मधुकं मांसीं गुग्गुल्वगुरुशर्करम् ॥ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षलोध्रत्वचः शुभाः। वन्यं सर्जरसं मुस्तं शैलेयं कमलोत्पले ॥ श्रीवेष्टकं शल्लकीं च शुकबर्हमथापि च। (चरक सूत्र० ५।२०-२३)

अर्थात् हरेणुका, प्रियंगुफूल, पृथ्वीका (काला जीरा), केशर, नख, ह्रीवेर, सफेद चन्दन, तेजपत्र, दालचीनी, छोटी इलायची, खश, पद्मांक, ध्यामक, मुलहठी, जटामासी, गुग्गुल, अगर, शर्करा, बरगदकी छाल, गूलरकी छाल, पीपलकी छाल, पाकड़की छाल, लोधकी छाल, वन्य, सर्जरस (राल), नागरमोथा, शैलेय, श्वेत कमलपुष्प, नीलकमल, श्रीवेष्टक, शल्लकी तथा शुकबर्ह — इन औषधियोंकी वर्तिका बनानी चाहिये।

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शिरोविरेचनार्थ (सिरके भारी होनेपर छींक लेने-हेतु) निम्न धूम्रपान-योग बताया गया है –

श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालं मनःशिला ।। गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमं मूर्धविरेचने । (चरक सू० ५।२६-२७)

अर्थात् अपराजिता, मालकाँगनी, हरताल, मैनसिल, अगर तथा तेजपत्र- इन औषधियों की वर्तिका बनाकर धूम्रपान करनेसे शिरोविरेचन होता है। यह चिकित्सा-पद्धति अब लुप्तप्राय हो गयी है, पर प्राचीन समयमें यह मुख्य आरोग्यविधि थी।
आधुनिक समय में उपरोक्त औषधियों का प्रयोग करके विभिन्न भारतीय और विदेशी कंपनियों को Smoking करने वाली वस्तुएं बनाना चाहिए, जिससे समाज को और विभिन्न रोगयुक्त युवाओं को स्वास्थ्य वर्धक लाभ हो सके। तथा विभिन्न प्रकार की औषधीय गुण धूम्रपान के माध्यम से रोगयुक्त युवाओं के शरीर में प्रवेश करें, और सभी प्रकार के रोगों का नाश कर सके। अतः विभिन्न प्रकार की कमानियों को विद्वानों से संपर्क करके इस प्रकार की धूम्रपान वाली वस्तुएं बनानी चाहिए जिससे कि विश्व समाज के युवा, वृद्ध और अन्य समुदाय सभी धूम्रपान के माध्यम से औषधीय गुणों को ग्रहण करके विभिन्न रोगों को समाप्त करें।