संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान के हमलों की निंदा वाला प्रस्ताव पारित, भारत ने भी किया समर्थन
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने ईरान द्वारा खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों और जॉर्डन पर किए गए हमलों की कड़ी निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है। इस प्रस्ताव को भारत ने भी सह-प्रायोजित किया है और ईरान से सभी हमलों को तुरंत रोकने की मांग की गई है।
15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद, जिसकी इस समय अध्यक्षता अमेरिका कर रहा है, ने बुधवार को इस प्रस्ताव को पारित किया। मतदान में 13 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि चीन और रूस ने मतदान से दूरी बनाते हुए परहेज किया। प्रस्ताव के खिलाफ कोई वोट नहीं पड़ा।
भारत का रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान के अनुरूप माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए गए हमलों की निंदा की थी। भारत ने बहरीन की अगुवाई में पेश किए गए इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसे दुनिया के 130 से अधिक देशों का भी समर्थन प्राप्त हुआ।
प्रस्ताव में बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति समर्थन दोहराया गया है। साथ ही इन देशों पर हुए हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा बताया गया है।
सुरक्षा परिषद ने ईरान से मांग की है कि वह खाड़ी देशों और जॉर्डन के खिलाफ सभी सैन्य हमलों को तत्काल बंद करे और पड़ोसी देशों के खिलाफ किसी भी प्रकार की उकसावे वाली गतिविधियों से दूर रहे। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा का उल्लेख करते हुए प्रस्ताव में चेतावनी दी गई है कि इन क्षेत्रों में नौवहन को बाधित करने या बंद करने की किसी भी कोशिश की कड़ी निंदा की जाएगी।
इसके अलावा प्रस्ताव में नागरिक क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों पर भी चिंता व्यक्त की गई है, जिनसे आम नागरिकों को नुकसान पहुंचा है। परिषद ने प्रभावित देशों और उनके नागरिकों के प्रति एकजुटता भी जताई।
दूसरी ओर रूस द्वारा प्रस्तुत एक अलग प्रस्ताव आवश्यक समर्थन नहीं जुटा सका। उस प्रस्ताव में संघर्ष में शामिल किसी भी देश का नाम नहीं लिया गया था और केवल सैन्य गतिविधियां रोकने की सामान्य अपील की गई थी, जिसके कारण उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया।

