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ट्रम्प की टैरिफ नीति से नुकसान अमेरिका को, फायदा शेष विश्व को

वैश्विक अर्थव्यवस्था में टैरिफ नीति को अक्सर राष्ट्रहित का हथियार माना जाता है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव कई बार अपेक्षाओं से उलट होते हैं। यह आलेख डॉनल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में अपनाई गई अमेरिकी टैरिफ नीति का तथ्यात्मक और तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आँकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि संरक्षणवाद का भार किस पर पड़ा और किसे लाभ मिला। साथ ही, यह आलेख भारत के लिए उभरते अवसरों और आगे की दिशा पर भी गंभीर विमर्श करता है। – सम्पादक

प्रहलाद सबनानी

दिनांक 20 जनवरी 2025 को डॉनल्ड ट्रम्प अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति बने। वर्ष 2024 का राष्ट्रपति चुनाव उन्होंने “Make America Great Again”, अर्थात “अमेरिका को पुनः महान बनाएं” के नारे के साथ जीता। वर्ष 2025 का पूरा वर्ष विश्व ने ट्रम्प को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हुए देखा, जिसमें उनकी आर्थिक नीतियों का सबसे प्रमुख आधार विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले आयात पर टैरिफ लगाना रहा।

लगभग पूरे वर्ष 2025 में ट्रम्प प्रशासन ने मित्र देशों सहित अनेक राष्ट्रों के उत्पादों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाए। उनका मानना था कि आयात पर शुल्क बढ़ाने से अमेरिका को होने वाला विदेशी निर्यात कम होगा और इससे देश के भीतर ही उत्पादन प्रारंभ होगा। ट्रम्प का यह भी विश्वास था कि इस नीति से अमेरिका की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और शेष विश्व पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। किंतु वर्ष 2025 के आर्थिक आंकड़े इस सोच की पुष्टि नहीं करते।

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वास्तव में, टैरिफ का प्रभाव अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर लगभग नगण्य रहा, जबकि इसका प्रतिकूल असर सीधे अमेरिकी नागरिकों पर पड़ा। अमेरिका में उत्पादों की कीमतों में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई, जिससे मुद्रास्फीति में तेजी आई। पिछले पाँच वर्षों की तुलना में अमेरिकी नागरिक आज खाद्य सामग्री पर लगभग 30 प्रतिशत अधिक खर्च कर रहे हैं। उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में औसतन 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि खाद्य पदार्थों और आवास की कीमतें लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। वर्ष 2025 में अमेरिका की मुद्रास्फीति दर 3 से 4 प्रतिशत के बीच बनी रही, जो पिछले कई वर्षों की तुलना में काफी अधिक है।

अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ का असर उसकी आर्थिक वृद्धि दर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वर्ष 2024 में अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 2.8 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2025 में घटकर 2.1 प्रतिशत रह गई। इसके विपरीत, वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 2024 और 2025 दोनों वर्षों में 2.8 प्रतिशत बनी रही। भारत में वर्ष 2024 में सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 7.2 प्रतिशत हो गई।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2024 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के 52 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर अमेरिका से अधिक थी, जबकि वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 76 प्रतिशत हो गया। इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिका के बाहर की अर्थव्यवस्थाएँ अपेक्षाकृत अधिक तेजी से आगे बढ़ रही हैं।

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पूंजी यानी शेयर बाजार में भी वर्ष 2025 अमेरिका के लिए अपेक्षाकृत कमजोर रहा। अमेरिकी निवेशकों को औसतन 18 प्रतिशत प्रतिफल प्राप्त हुआ, जबकि यूरोप में निवेशकों को 35 प्रतिशत, उभरती अर्थव्यवस्थाओं में 34 प्रतिशत, अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व में 32 प्रतिशत और चीन में 31 प्रतिशत प्रतिफल मिला। अमेरिका में नागरिकों का शेयर बाजार में निवेश अनुपात लगभग 32 प्रतिशत है, जो अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है। ऐसे में कम प्रतिफल का सीधा असर अमेरिकी नागरिकों की संपत्ति पर पड़ा।

टैरिफ नीति का प्रभाव अमेरिका के राजकोषीय संतुलन और विदेशी व्यापार पर भी पड़ा है। वर्ष 2024 में अमेरिका का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 6.9 प्रतिशत था, जो 2025 में घटकर 6 प्रतिशत हुआ। हालांकि, शोध बताते हैं कि टैरिफ का लगभग 96 प्रतिशत भार अमेरिकी नागरिकों ने वहन किया है और इससे आयात में अपेक्षित कमी नहीं आई। अमेरिका का चालू खाता घाटा बढ़कर लगभग 1.3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया है। आज भी अमेरिका में उत्पादन की तुलना में उपभोग कहीं अधिक है, जो दीर्घकालिक आर्थिक असंतुलन को दर्शाता है।

विदेशी व्यापार के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं। अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व के निर्यात में वर्ष 2025 में 6.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि अमेरिका के निर्यात की वृद्धि दर घटकर 4.1 प्रतिशत रह गई। कई देशों ने आपसी मुक्त व्यापार समझौते कर नए बाजार खोजे और अपने निर्यात को बढ़ाया। स्पष्ट है कि टैरिफ नीति ने अमेरिका की तुलना में अन्य देशों को अधिक अवसर प्रदान किए।

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इस समग्र परिदृश्य को देखें तो अमेरिका की टैरिफ नीति “Make America Great Again” के लक्ष्य को हासिल करती हुई नहीं दिखती। इसके विपरीत, विश्व के अनेक देश आर्थिक रूप से सशक्त होते दिखाई दे रहे हैं। व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाए तो ट्रम्प की नीतियाँ “Make Earth Great Again (MEGA)” की दिशा में अधिक प्रभावी सिद्ध होती प्रतीत होती हैं।

इन वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था निरंतर मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। भारत का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 में 5.5 प्रतिशत से घटकर 2025 में 4.8 प्रतिशत हुआ है और 2026 में इसके 4.4 प्रतिशत रहने की संभावना है। यदि भारत को विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है, तो उसे सकल घरेलू उत्पाद में 12 से 14 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करनी होगी, जैसा कि चीन ने लंबे समय तक किया। इसके लिए भारत को आंतरिक उपभोग के साथ-साथ निर्यात को भी समान महत्व देना होगा। यदि अमेरिका सहयोगी नहीं बनता, तो भारत को नए वैश्विक बाजारों की ओर बढ़ते हुए अपने निर्यात सामर्थ्य का बेहतर

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009