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स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना: आत्मगौरव से राष्ट्रनिर्माण तक

आचार्य ललित मुनि

भारतीय राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की आकांक्षा नहीं रहा है, बल्कि यह एक गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना से निर्मित विचारधारा है। इस चेतना को आधुनिक युग में जिन महान व्यक्तित्वों ने स्वर दिया, उनमें स्वामी विवेकानंद का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे ऐसे चिंतक थे, जिन्होंने भारत को केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता के रूप में देखा। उनका राष्ट्रवाद पश्चिमी ढांचे की नकल नहीं था, बल्कि भारतीय परंपरा, दर्शन, आत्मगौरव और मानवता के व्यापक मूल्यों से उपजा हुआ था। विवेकानंद का राष्ट्रवाद आत्मबोध, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सेवा-भाव से जुड़ा हुआ था, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज के भारत तक गहरी छाप छोड़ी है।

स्वामी विवेकानंद के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ सत्ता परिवर्तन या शासन व्यवस्था बदलना मात्र नहीं था। उनके अनुसार राष्ट्र का निर्माण व्यक्तियों से होता है और व्यक्तियों का निर्माण चरित्र से। इसलिए वे कहते थे कि “राष्ट्र पहले मनुष्यों के भीतर बनता है, बाद में संस्थाओं में।” उनका राष्ट्रवाद आत्मगौरव पर आधारित था, न कि किसी अन्य राष्ट्र के प्रति घृणा पर।

उन्होंने भारत की आत्मा को उसकी संस्कृति में देखा। वे मानते थे कि यदि भारत को जागृत होना है तो उसे अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। वे वेदांत को भारत की आत्मा और सेवा को उसका प्राण मानते थे। इस प्रकार विवेकानंद का राष्ट्रवाद आध्यात्मिक होते हुए भी कर्मप्रधान था।

उन्नीसवीं शताब्दी का भारत सांस्कृतिक हीनभावना से ग्रस्त था। औपनिवेशिक शासन ने भारतीयों को यह विश्वास दिला दिया था कि उनकी संस्कृति पिछड़ी हुई है। विवेकानंद ने इस मानसिक गुलामी को सबसे बड़ा अभिशाप माना। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि भारत ने विश्व को सहिष्णुता, करुणा और आध्यात्मिकता का संदेश दिया है।

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1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में उनका प्रसिद्ध उद्घाटन संबोधन भारतीय सांस्कृतिक चेतना का वैश्विक उद्घोष था। “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका” के एक वाक्य ने न केवल पश्चिम को, बल्कि भारत को भी उसकी खोई हुई पहचान का बोध कराया। यह घटना भारतीय राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई।

विवेकानंद का राष्ट्रवाद वेदांत दर्शन से गहराई से जुड़ा हुआ था। वेदांत के अनुसार हर जीव में वही एक चेतना व्याप्त है। इस दर्शन से उन्होंने सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का आधार निर्मित किया। उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ था सबको साथ लेकर चलना, विशेषकर समाज के अंतिम व्यक्ति को।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक गरीब, दलित और वंचित वर्ग सशक्त नहीं होंगे, तब तक भारत महान नहीं बन सकता। यही कारण है कि वे सेवा को साधना मानते थे। उनका प्रसिद्ध कथन, “दरिद्र नारायण की सेवा ही सच्ची पूजा है,” उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सार है।

विवेकानंद के राष्ट्रवाद में धर्म का विशेष स्थान था, किंतु उनका धर्म संकीर्ण नहीं था। वे किसी एक पंथ की श्रेष्ठता की बात नहीं करते थे, बल्कि धर्म को मानवता के उत्थान का साधन मानते थे। उनके अनुसार भारत की विशेषता उसकी धार्मिक सहिष्णुता है।

उन्होंने कहा कि भारत का धर्म जीवन से अलग नहीं है। यही धर्म भारत को एक सूत्र में बांधता है। इस दृष्टि से उनका राष्ट्रवाद सांप्रदायिक नहीं, बल्कि समन्वयकारी था। वे मानते थे कि विभिन्न मत और पंथ मिलकर भारत की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करते हैं।

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स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को राष्ट्र निर्माण का केंद्र माना। उनका विश्वास था कि युवा शक्ति में अपार ऊर्जा है, जिसे सही दिशा मिले तो राष्ट्र का कायाकल्प संभव है। वे युवाओं से कहते थे कि पहले स्वयं पर विश्वास करो, तभी राष्ट्र पर विश्वास कर सकोगे।

उनका आदर्श युवा निर्भीक, चरित्रवान और सेवा-भाव से युक्त होता है। वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति के संतुलन पर जोर देते थे। यही कारण है कि आज भी राष्ट्रीय युवा दिवस उनके जन्मदिन पर मनाया जाता है। उनका राष्ट्रवाद युवाओं के चरित्र निर्माण से प्रारंभ होता है।

विवेकानंद की दृष्टि में शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि आत्मविकास का माध्यम थी। वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे, जो आत्मविश्वास जगाए और चरित्र का निर्माण करे। उनका मानना था कि विदेशी शिक्षा प्रणाली ने भारतीयों को अपनी संस्कृति से दूर कर दिया है।

उन्होंने भारतीय शिक्षा को भारतीय मूल्यों से जोड़ने की बात कही। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य यह होना चाहिए कि व्यक्ति अपने भीतर निहित शक्ति को पहचाने। यह विचार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव को मजबूत करता है।

विवेकानंद जाति-भेद और सामाजिक असमानता के प्रखर आलोचक थे। वे मानते थे कि जब तक समाज के एक हिस्से को दबाया जाएगा, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता। उनका राष्ट्रवाद सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ था।

उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। इसलिए गांव, गरीब और श्रमिक को केंद्र में रखे बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं। यह दृष्टिकोण उन्हें एक संवेदनशील राष्ट्रवादी चिंतक बनाता है।

विवेकानंद ने प्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया, लेकिन उनके विचारों ने एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया। महात्मा गांधी से लेकर सुभाष चंद्र बोस तक अनेक नेताओं ने स्वीकार किया कि विवेकानंद के विचारों ने उनके जीवन को दिशा दी।

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उनका राष्ट्रवाद राजनीतिक क्रांति से पहले मानसिक और सांस्कृतिक क्रांति की बात करता है। यही कारण है कि उनका प्रभाव स्थायी और गहन रहा।

विवेकानंद का राष्ट्रवाद वैश्विक मानवता से टकराता नहीं, बल्कि उससे संवाद करता है। वे भारत को विश्व गुरु के रूप में देखते थे, लेकिन अहंकार के साथ नहीं, बल्कि सेवा के भाव के साथ। उनका मानना था कि भारत विश्व को आध्यात्मिक दृष्टि दे सकता है।

यह दृष्टि आज के वैश्विक युग में और अधिक प्रासंगिक हो जाती है, जहां राष्ट्रवाद और वैश्वीकरण के बीच संतुलन की आवश्यकता है।

आज जब राष्ट्रवाद को संकीर्ण अर्थों में समझा जाने लगा है, विवेकानंद का समन्वयकारी राष्ट्रवाद हमें नई दिशा देता है। उनका राष्ट्रवाद नफरत नहीं, आत्मगौरव सिखाता है। वह विभाजन नहीं, बल्कि एकता का संदेश देता है।

सांस्कृतिक चेतना के बिना आर्थिक या राजनीतिक प्रगति अधूरी है। विवेकानंद का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना सौ वर्ष पहले था।

स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद भारत की आत्मा से उपजा हुआ था। वह सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और सेवा-भाव का संगम था। उन्होंने हमें सिखाया कि राष्ट्र निर्माण की शुरुआत आत्मनिर्माण से होती है। उनका विचार आज भी भारत के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विमर्श को दिशा दे रहा है। यदि भारत को सशक्त और समरस बनाना है, तो विवेकानंद के राष्ट्रवाद को केवल स्मरण नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारना होगा।