आघातों के बीच अडिग सनातन आस्था का शाश्वत प्रतीक सोमनाथ
इतिहास के अनुसार 1000 वर्ष पूर्व सन् 1026 के जनवरी माह में आततायी मेहमूद गजनवी ने 5000 मुगलों को लेकर बड़ा आक्रमण करते हुए सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने का प्रयत्न किया और अकूत स्वर्ण संपदा को लूट लिया था। तब मंदिर की रक्षा के लिए संघर्ष में आसपास के गांवों से दौड़कर आए हजारों निहत्थे लोग मारे गए थे। इससे पूर्व तथा पश्चात भी सोमनाथ पर अनेक आक्रमण हुए। अलाउद्दीन खिलजी, मुजफ्फरशाह, अहमद शाह, औरंगजेब आदि ने भी यहां तोड़फोड़ और लूटपाट मचाई। पर यह शिव की महिमा ही है कि यह ज्योतिर्लिंग अनेक आघात सहते हुए भी आज विश्वभर की सनातन आस्था का प्रमुख केन्द्र बन गर्व से अडिग खड़ा हुआ है।
अनेक राजाओं ने इस मंदिर के पुनर्निर्माण में समय-समय पर योगदान दिया। 1783 में मालवा की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने भी यहां जीर्णोद्धार का काम करवाया। आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने मंदिर पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, फिर 1951 में पुनर्निर्माण का कार्य पूर्ण हुआ। 1890 में स्वामी विवेकानन्द ने सोमनाथ के दर्शन करने के उपरान्त 1897 में चेन्नई में दिए भाषण में कहा कि ‘सोमनाथ जैसे मंदिर भारत के इतिहास और राष्ट्रीय चेतना को पुस्तकों से बेहतर समझाते हैं।’
भारत की आस्था, आत्मगौरव और स्वाभिमान के प्रतीक द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वाच्च माने जाने वाले गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर को शिवपुराण में स्वयंभू कहा गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार दक्ष प्रजापति के श्राप से कोढ़ रोग से ग्रसित हुए चंद्रदेव ने दक्षिण को पितृलोक से जोड़ने वाले इस पावन प्रभास क्षेत्र में शिवलिंग स्थापित कर तप किया। तब शिवजी ने दर्शन देकर उन्हें रोगमुक्त किया। चंद्रमा को सोम कहा जाता है, इसीलिए इस शिवलिंग को सोमनाथ कहा गया। ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है। यहां की महिमा महाभारत और श्रीमद्भागवत में भी कही गई है। स्कंद पुराण में श्रीकृष्ण के देहोत्सर्ग की पावन भूमि प्रभास क्षेत्र का वर्णन किया गया है।
