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भारत के एकीकरण के शिल्पकार और लौह इच्छाशक्ति स्वामी सरदार वल्लभभाई पटेल

आचार्य ललित मुनि

गुजरात के नर्मदा तट को जैसे ही सर्द हवाओं का झोंका स्पर्श करता है, वहां की मिट्टी एक कहानी सुनाने लगती है। यह कहानी केवल अतीत की नहीं, बल्कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य से जुड़ी हुई है। यह कहानी सरदार वल्लभभाई पटेल की है, जिनकी पुण्य तिथि हर वर्ष 15 दिसंबर को आती है। यह तिथि केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। यह हमें याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण केवल युद्ध, घोषणाओं या कूटनीतिक समझौतों से नहीं होता, बल्कि एक व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और दूरदृष्टि से भी होता है।

सरदार पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को मुंबई के बिरला हाउस में हृदयाघात से हुआ। उनका जाना किसी युग का अंत नहीं था, बल्कि एक ऐसी विरासत की शुरुआत थी जो समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती चली गई। आज जब हम उनकी पुण्य तिथि पर उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह प्रश्न भी है कि एक साधारण किसान परिवार में जन्मा व्यक्ति किस तरह भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश को एक मजबूत राजनीतिक और प्रशासनिक इकाई में ढाल सका।

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक लेवा पाटीदार परिवार में हुआ। उनके पिता झवेरभाई पटेल किसान होने के साथ स्थानीय प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभाते थे, जबकि माता लाडबा धार्मिक प्रवृत्ति की सरल और अनुशासित महिला थीं। परिवार में कुल छह भाई बहन थे और वल्लभभाई उनमें चौथे थे। बचपन से ही उन्होंने परिश्रम, आत्मनिर्भरता और अनुशासन का जीवन जिया। खेतों में काम करना, परिवार की जिम्मेदारियों को समझना और सीमित संसाधनों में शिक्षा प्राप्त करना उनके व्यक्तित्व का आधार बना।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा करमसद और पेटलाड में हुई। आर्थिक तंगी के कारण उनकी पढ़ाई में व्यवधान आया, लेकिन उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। 1897 में मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई का निश्चय किया। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने स्वयं धन जुटाया और इंग्लैंड जाकर मिडिल टेम्पल से बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की। केवल दो वर्षों में यह उपलब्धि हासिल करना उस समय असाधारण माना जाता था। 1913 में भारत लौटकर उन्होंने अहमदाबाद में वकालत शुरू की और शीघ्र ही अपनी तार्किक क्षमता, निर्भीकता और न्यायप्रियता के कारण प्रतिष्ठित वकील बन गए।

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हालांकि वकालत में मिली सफलता उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं थी। 1917 में महात्मा गांधी से हुई मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। गांधीजी की अहिंसा और सत्याग्रह की अवधारणा ने उन्हें प्रभावित किया, लेकिन पटेल का स्वभाव व्यावहारिक था। वे आदर्शों के साथ कठोर निर्णय लेने में भी विश्वास रखते थे। इसी वर्ष वे अहमदाबाद नगर पालिका से जुड़े और नगर सुधार, स्वच्छता, जल आपूर्ति तथा शहरी प्रशासन में उल्लेखनीय कार्य किए। वे 1917 से 1924 तक अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष रहे और महामारी तथा अकाल के समय प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया।

खेड़ा सत्याग्रह ने सरदार पटेल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। 1918 में जब फसल खराब होने के बावजूद अंग्रेज सरकार ने कर वसूली पर जोर दिया, तब पटेल ने किसानों को संगठित किया। उन्होंने गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसक संघर्ष किया और अंततः ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। यह आंदोलन केवल आर्थिक राहत नहीं था, बल्कि किसानों के आत्मसम्मान और संगठन शक्ति का प्रतीक बना।

1928 का बारडोली सत्याग्रह सरदार पटेल के नेतृत्व कौशल का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। भूमि राजस्व में अत्यधिक वृद्धि के खिलाफ उन्होंने किसानों को संगठित किया और आंदोलन को अनुशासन, धैर्य और रणनीति के साथ आगे बढ़ाया। महिलाओं और बुजुर्गों की भागीदारी ने इस आंदोलन को सामाजिक आधार दिया। ब्रिटिश दमन, संपत्ति की नीलामी और हिंसा के बावजूद आंदोलन अडिग रहा। अंततः सरकार को जांच आयोग गठित करना पड़ा और कर वृद्धि वापस लेनी पड़ी। इसी आंदोलन के बाद जनता ने उन्हें स्नेहपूर्वक सरदार की उपाधि दी।

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इसके बाद सरदार पटेल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन और कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में उनकी भूमिका निर्णायक रही। 1931 के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्तावों को मजबूती दी। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने संयम और संतुलन बनाए रखा।

स्वतंत्रता से ठीक पहले और बाद का समय भारत के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण था। 1947 में देश का विभाजन हुआ, सांप्रदायिक हिंसा फैली और सैकड़ों रियासतें स्वतंत्र अस्तित्व का दावा कर रही थीं। इसी समय सरदार पटेल का वास्तविक योगदान सामने आया। स्वतंत्र भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में उन्होंने रियासतों के एकीकरण का दायित्व संभाला। वी पी मेनन के साथ मिलकर उन्होंने 562 रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराया। यह कार्य न केवल राजनीतिक कुशलता, बल्कि अदम्य साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति की मांग करता था।

जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसे मामलों में उन्होंने स्पष्ट और कठोर निर्णय लिए। हैदराबाद में पुलिस कार्रवाई कर भारत की अखंडता सुनिश्चित की गई। एक वर्ष के भीतर भारत को एकीकृत प्रशासनिक ढांचे में ढाल देना सरदार पटेल की ऐतिहासिक उपलब्धि है। यदि यह कार्य सफल नहीं होता, तो आज भारत का मानचित्र और भविष्य दोनों अलग होते।

सरदार पटेल ने केवल राजनीतिक एकीकरण ही नहीं किया, बल्कि प्रशासनिक नींव भी मजबूत की। भारतीय प्रशासनिक सेवा और पुलिस सेवा जैसी संस्थाओं की स्थापना में उनकी भूमिका निर्णायक थी। वे मानते थे कि एक सशक्त और निष्पक्ष प्रशासन ही लोकतंत्र की रीढ़ होता है। विभाजन के बाद शरणार्थियों के पुनर्वास, कानून व्यवस्था की बहाली और सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण में उनके प्रयास निर्णायक रहे।

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स्वास्थ्य की गिरावट के बावजूद वे अंतिम समय तक राष्ट्रहित में चिंतन करते रहे। 15 दिसंबर 1950 को उनके निधन से देश स्तब्ध रह गया। लाखों लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी। उनकी मृत्यु पर पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई, क्योंकि भारत ने अपने सबसे मजबूत स्तंभों में से एक को खो दिया था।

आज सरदार पटेल की विरासत स्मारकों से कहीं अधिक व्यापक है। 2018 में नर्मदा तट पर स्थापित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। 1991 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया और 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सरदार पटेल की पुण्य तिथि हमें यह सिखाती है कि राष्ट्र निर्माण केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि कठोर निर्णयों, अनुशासन और दूरदृष्टि से होता है। वे गांधीजी के नैतिक मार्गदर्शक थे, नेहरू के सहयोगी थे, लेकिन सबसे बढ़कर भारत के एकीकरण के शिल्पकार थे। आज जब भारत अनेक सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब सरदार पटेल का जीवन हमें साहस, संयम और राष्ट्रीय एकता का मार्ग दिखाता है।

जैसे नर्मदा की धारा निरंतर बहती रहती है, वैसे ही सरदार पटेल की प्रेरणा भी समय के साथ बहती रहेगी। उनकी पुण्य तिथि केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का अवसर है कि हम भी अपने कर्तव्यों को उतनी ही निष्ठा और दृढ़ता से निभाएं, जितनी उन्होंने राष्ट्र के लिए निभाई थी।