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पाश्चात्य बनाम सनातन दृष्टि: अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नई विश्व व्यवस्था पर उठता विमर्श

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था एक गहरे वैचारिक और संरचनात्मक संकट से गुजर रही है। बीते तीन सौ वर्षों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति जिस वेस्टफेलियाई राज्य-व्यवस्था पर आधारित मानी जाती रही है, वह आज अनेक चुनौतियों से घिरी हुई दिखाई देती है। संप्रभु राष्ट्रों की अवधारणा, शक्ति-संतुलन की राजनीति और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दावे के बावजूद विश्व लगातार संघर्षों, असुरक्षा और अविश्वास की स्थिति में फँसा हुआ है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, बढ़ता परमाणु खतरा और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय संबंधों का ढाँचा शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने में पूर्णतः सफल नहीं रहा है।

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU

यह समस्या केवल राजनीतिक या कूटनीतिक नहीं है। इसके पीछे एक गहरा बौद्धिक कारण भी है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का शैक्षणिक अनुशासन मुख्यतः यूरोप के ऐतिहासिक अनुभवों से निर्मित हुआ है। 1648 की वेस्टफेलिया संधि, औपनिवेशिक विस्तार और शीत युद्ध की द्विध्रुवीय राजनीति को आधार बनाकर विश्व राजनीति के सिद्धांत विकसित किए गए। धीरे-धीरे इन सिद्धांतों को सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया, मानो विश्व की सभी सभ्यताओं का राजनीतिक अनुभव एक जैसा हो।
परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन यूरो-केंद्रित दृष्टिकोण तक सीमित हो गया। एशिया, अफ्रीका और अन्य सभ्यताओं की राजनीतिक परंपराएँ, दर्शन और ऐतिहासिक अनुभव इस विमर्श में गौण हो गए। यह स्थिति एक प्रकार की ज्ञानमीमांसीय संकीर्णता को जन्म देती है, जहाँ पश्चिमी अनुभवों को ही वैश्विक मानक मान लिया जाता है।
पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांतों में मुख्यतः तीन प्रमुख धाराएँ दिखाई देती हैं — यथार्थवाद (Realism), उदारवाद (Liberalism) और संरचनावाद (Constructivism)। यथार्थवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था मूलतः अराजक है और प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा और अस्तित्व की रक्षा के लिए शक्ति अर्जित करने का प्रयास करता है। इस दृष्टिकोण में “Survival of the Fittest” और “Balance of Power” जैसे सिद्धांत केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
उदारवाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सहयोग पर बल देता है, जबकि संरचनावाद विचारों और पहचानों की भूमिका को रेखांकित करता है। फिर भी इन सभी सिद्धांतों का मूल ढाँचा शक्ति और सुरक्षा की राजनीति से ही संचालित होता है। इन सिद्धांतों में नैतिकता, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका सीमित रहती है।
यही कारण है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सिद्धांत कई महत्वपूर्ण प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर देने में असमर्थ रहा है। उदाहरण के लिए, किसी राष्ट्र के नेतृत्व का नैतिक चरित्र उसकी विदेश नीति को किस प्रकार प्रभावित करता है? सत्ता की वैधता का आधार केवल शक्ति है या उसके पीछे कोई नैतिक और आध्यात्मिक आधार भी होना चाहिए? विजय के बाद संयम और न्याय की नीति किस प्रकार स्थापित की जा सकती है? इन प्रश्नों का समाधान पश्चिमी सिद्धांतों में अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
इसके विपरीत भारतीय शास्त्रीय परंपरा राजनीति और राज्य को एक व्यापक नैतिक दृष्टि से देखती है। यहाँ राज्य केवल शक्ति-संचय का साधन नहीं, बल्कि समाज के समग्र कल्याण का माध्यम माना गया है। भारतीय दर्शन में जीवन के चार पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — को संतुलित रूप से साधना ही आदर्श व्यवस्था का लक्ष्य माना गया है।
इसी कारण भारतीय राजनीतिक चिंतन में राज्य का उद्देश्य केवल अपने अस्तित्व की रक्षा करना नहीं, बल्कि समाज के व्यापक हित की रक्षा करना भी है। इस विचार को “लोकसंग्रह” की अवधारणा में व्यक्त किया गया है, जिसका अर्थ है — समष्टि के हित और संतुलन को बनाए रखना।
महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि किसी भी राज्य की विदेश नीति उसके नेतृत्व के नैतिक चरित्र से गहराई से प्रभावित होती है। राजा का स्वभाव, उसका आत्मसंयम और उसका नैतिक दृष्टिकोण राज्य की नीतियों को दिशा प्रदान करता है।
मानवीय प्रवृत्तियाँ — जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — केवल व्यक्तिगत जीवन को ही प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी प्रभावित करती हैं। इसीलिए भारतीय शास्त्रों में नेतृत्व के आत्मसंयम को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है —
“इन्द्रियजयाज्ज्ञानवृद्धिः।”
अर्थात् इन्द्रियों पर विजय प्राप्त किए बिना राजनीतिक विवेक संभव नहीं है।
भारतीय शास्त्रीय परंपरा में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कई ऐसे सिद्धांत विकसित किए गए थे जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। इनमें षाड्गुण्य नीति, उपायचतुष्टय, योगक्षेम और मंडल सिद्धांत प्रमुख हैं।
षाड्गुण्य नीति के अंतर्गत संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव जैसे विकल्पों के माध्यम से राज्य अपनी कूटनीतिक रणनीति तय करता है। इसी प्रकार उपायचतुष्टय — साम, दाम, दंड और भेद — राजनीतिक व्यवहार के चार प्रमुख साधन माने गए हैं।
कौटिल्य का मंडल सिद्धांत आधुनिक भू-राजनीति के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। इसमें यह बताया गया है कि किसी राज्य के लिए उसके पड़ोसी संभावित प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं, जबकि पड़ोसी का पड़ोसी संभावित सहयोगी हो सकता है। यह सिद्धांत आज भी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को समझने में सहायक सिद्ध होता है।
इसके साथ ही भारतीय परंपरा राजनीति में नैतिकता को भी अत्यंत महत्व देती है। अर्थशास्त्र में कहा गया है —
“प्रजासुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।”
अर्थात् प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही उसका हित निहित है।
यदि इस सिद्धांत को अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्तर पर लागू किया जाए तो विश्व राजनीति का उद्देश्य केवल शक्ति संतुलन नहीं, बल्कि वैश्विक कल्याण होना चाहिए।
आज विश्व एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इस परिवर्तन के साथ विभिन्न सभ्यताओं की वैचारिक परंपराओं का महत्व भी पुनः बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन को यूरो-केंद्रित सीमाओं से मुक्त करके एक व्यापक सभ्यतागत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
भारत की शास्त्रीय परंपरा इस दिशा में एक समृद्ध वैचारिक आधार प्रदान करती है। कौटिल्य की रणनीतिक सूक्ष्मता, भीष्म की नैतिक गहराई और श्रीकृष्ण की लोकसंग्रह की दृष्टि मिलकर एक ऐसी विश्वदृष्टि प्रस्तुत करती है जो आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संकटों का समाधान खोजने में सहायक हो सकती है।
आज की दुनिया साइबर युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानताओं जैसी नई चुनौतियों का सामना कर रही है। इन समस्याओं का समाधान केवल पारंपरिक शक्ति-राजनीति से संभव नहीं है। इसके लिए एक व्यापक नैतिक और सभ्यतागत दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
ऐसे समय में भारत की शास्त्रीय परंपरा हमें यह सिखाती है कि वास्तविक शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक सामर्थ्य में नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व और लोककल्याण की भावना में निहित होती है।
यदि विश्व राजनीति को वास्तव में शांति और स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ाना है, तो उसे केवल शक्ति-संतुलन की राजनीति से ऊपर उठकर धर्म और लोकसंग्रह के सिद्धांतों को भी स्वीकार करना होगा।
भारतीय परंपरा का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था —
“यतो धर्मस्ततो जयः”
अर्थात् जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।

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