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शिक्षा, समाज और राष्ट्र पर डॉ. मोहन भागवत का दृष्टिकोण : तीन दिवसीय संवाद

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी शताब्दी यात्रा पूरी करने जा रहा है। अपनी शताब्दी यात्रा में संघ ने अपनी कार्यशैली समयानुकूल कई परिवर्तन किए, लेकिन अपना सिद्धांत एवं लक्ष्य कभी नहीं बदला। भारत राष्ट्र का परम वैभव, निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा और आदर्श व्यक्तित्व निर्माण का ध्येय यथावत रहा। इसकी झलक संघ के कार्यों में भी है और दिल्ली में आयोजित अपने तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम के समापन में उपस्थित समूह द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तरों में भी स्पष्ट रही।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विजयदशमी 1925 को अपनी यात्रा आरंभ की थी। इस वर्ष विजयदशमी को उसकी स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। संघ इन दिनों अपनी शताब्दी यात्रा की समीक्षा कर रहा है। यह समीक्षा दोनों प्रकार से की जा रही है – अपनी आंतरिक बैठकों में भी और बैठकों के बाहर जनसामान्य के बीच जाकर भी। इसी कड़ी में तीन दिवसीय कार्यक्रम “संवाद” दिल्ली के विज्ञान भवन में संपन्न हुआ।

आरंभिक दो दिनों तक सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भारत राष्ट्र, उसकी प्राथमिकता, पहचान और भविष्य निर्माण की संकल्पना पर चर्चा की। प्रत्येक विषय पर बिंदुवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया। तीसरे दिन भागवत जी ने उपस्थित जन समुदाय के प्रश्नों का उत्तर दिया। प्रत्येक प्रश्न पर उनका उत्तर सत्य, तथ्य और तर्क पर आधारित था।

उनसे पूछे गए प्रश्नों में शिक्षा पद्धति, धर्म का आशय, हिन्दू की परिभाषा, संविधान की मान्यता, मुस्लिम समाज के प्रति दृष्टिकोण, आरक्षण पर संघ की नीति, जातीय परम्पराओं पर संघ की राय, राष्ट्रीय सुरक्षा, मतांतरण और सशस्त्र होने आदि विषय शामिल थे। सरसंघचालक डॉ. मोहन जी ने किसी प्रश्न को नहीं टाला, सबका सटीक और यथार्थपरक उत्तर दिया।

संघ के लक्ष्य, ध्येय यात्रा और वर्तमान संदर्भ के परिवर्तनों पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघ का लक्ष्य भारत राष्ट्र को विश्व के सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करना है, निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना है और उच्चतम मानवीय मूल्यों के साथ आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करना है। संघ की इस ध्येय यात्रा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। हाँ, देशकाल और समय की आवश्यकतानुसार कार्यशैली में कुछ परिवर्तन हुए हैं और आगे भी होंगे।

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निसंदेह, संघ की इस शताब्दी यात्रा में किसी भी घटना-दुर्घटना होने पर सेवा कार्यों के लिए संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुँचते हैं। चाहे वह 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हो, भारत विभाजन के समय पीड़ितों को सुरक्षित लाना हो या रेल दुर्घटना, बाढ़, भूकंप आदि आपदाएँ – संघ के स्वयंसेवक हमेशा पहले पहुँचते हैं।

भागवत जी का कहना था कि शिक्षा का मतलब केवल पढ़ना-लिखना नहीं होता। वास्तविक शिक्षा वह है जो इंसान को सच्चा मनुष्य बनाए। शिक्षा व्यक्ति को इतना विवेकवान बनाए कि वह विष को भी औषधि में बदल सके। उन्होंने कहा कि सुशिक्षा का उद्देश्य केवल करियर बनाना अथवा नौकरी पाना नहीं होता, बल्कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का निर्माण करना है – ऐसा व्यक्तित्व जो परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ मानवीय मूल्यों के प्रति भी जागरूक रहे।

उन्होंने आज भारतीय सामाजिक जीवन में दिख रही विसंगतियों और विरोधाभासों को रेखांकित करते हुए कहा कि इन्हें शिक्षा द्वारा ही दूर किया जा सकता है। समाज में माता-पिता के सम्मान संबंधी प्रश्न पर भागवत जी ने कहा कि इसके सूत्र भी शिक्षा और परंपरा में हैं। शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न हो, उसमें सामाजिक मूल्यों का भी समावेश होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि माता-पिता का सम्मान करना किसी भी धर्म में गलत नहीं माना गया है। यह सार्वभौमिक मूल्य है जिसे सबको सीखना चाहिए।

शिक्षा पद्धति के संबंध में पूछे जाने पर भागवत जी ने स्पष्ट कहा कि भारत की शिक्षा स्व-आधारित होनी चाहिए। शिक्षा से ही नागरिकों में आदर्श भाव और दायित्वबोध उत्पन्न होता है। उनका कहना था कि भारत के संविधान की प्रस्तावना, नागरिक अधिकार और कर्तव्य के प्रावधान किशोरावस्था की छोटी कक्षाओं के पाठ्यक्रम में होना चाहिए, ताकि बच्चों के मन में भारत राष्ट्र के स्वरूप, अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट हो सकें।

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भारत की राष्ट्रभाषा के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में भागवत जी ने कहा कि भारत की जितनी भाषाएँ हैं, वे सब राष्ट्रभाषाएँ हैं। सबका बराबर सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसके साथ संपर्क की भाषा कोई एक होनी चाहिए – जो अंग्रेजी न होकर भारतीय हो। अंग्रेजी की पढ़ाई हो सकती है, पर उसका स्थान एक सहयोगी भाषा के रूप में होना चाहिए।

इस “संवाद” समागम में एक प्रश्न सड़कों और नगरों के नाम बदलने पर भी आया। इसके उत्तर में सरसंघचालक डॉ. भागवत ने स्पष्ट कहा कि आक्रमणकारियों और विध्वंसकर्ताओं के नाम पर नगरों और सड़कों के नाम रखने का दुराग्रह क्यों होना चाहिए। ये नाम स्थानीय भावना के अनुरूप हों और आदर्श महापुरुषों के नाम पर हों, जैसे – हवलदार अब्दुल हमीद और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम।

भारत को “हिन्दू राष्ट्र” घोषित करने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि इस बात का कोई महत्व नहीं है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाता है या नहीं। वह तो हिन्दू राष्ट्र है। ऋषि-मुनियों की परंपराओं से स्थापित इस भूमि की जीवनशैली के अनुरूप यह हिन्दू राष्ट्र है और रहेगा। यह किसी अधिकृत घोषणा का मोहताज नहीं है। इसे स्वीकार करने से किसी को कोई नुकसान नहीं है, बल्कि इससे सामाजिक जीवन में सद्भावना बढ़ेगी।

अखंड भारत के प्रश्न पर भागवत जी ने कहा कि राष्ट्र की अवधारणा का संबंध राज्य सत्ता से नहीं होता। यह एक राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक स्वरूप है। भारत के इतिहास में भी अनेक राज्यों, भाषाओं और युद्धों के बावजूद राष्ट्रीय और सांस्कृतिक स्वरूप में कोई अंतर नहीं आया। समस्या तब होती है जब कोई भारतवासी को यूरोप या मध्य एशिया से जोड़ने का प्रयत्न करता है।

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जाति व्यवस्था और आरक्षण पर आए प्रश्नों के उत्तर में भागवत जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संविधान के अनुरूप आरक्षण का पक्षधर है। जाति व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि यह मूलतः कर्म आधारित थी और “स्वच्छता” की सावधानी से जुड़ी थी, लेकिन बिगड़कर जन्म आधारित हो गई और “स्वच्छता” की सावधानी “स्पर्श्यता” में बदल गई। इसी से समाज का क्षय हुआ। आज समाज बदल चुका है, अतः हमें भी बदले स्वरूप के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए। संघ का नारा – “एक मंदिर, एक कुँआ और एक शमशान” – आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

एक प्रश्न हथियार बढ़ाने पर भी आया। इसके उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ शांति की बात करता है। भारत भगवान बुद्ध का देश है, लेकिन संसार में कुछ देश और लोग ऐसे हैं जो शांति की भाषा नहीं समझते और शांतिप्रिय देशों में अशांति उत्पन्न करते हैं। तब शांति की रक्षा शस्त्र और शक्ति से ही होगी। हथियार बढ़ाने का अर्थ युद्ध करना या आक्रमण करना नहीं है, बल्कि स्वयं की रक्षा करना है।

इस तीन दिवसीय “संवाद” समागम में कुल 218 प्रश्न आए, जिन्हें विषयानुसार 21 समूहों में विभाजित किया गया। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया। प्रश्नकर्ताओं में प्रमुख राष्ट्रीय मीडिया चैनलों के पत्रकारों के अतिरिक्त उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, प्रशासनिक सेवा, पुलिस प्रशासन और विदेश सेवा से निवृत्त अधिकारी भी शामिल थे।