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विकास की गति बनाम राज्यों का बजट उपयोग

डॉ श्रद्धा मिश्रा

वित्त वर्ष 2025–26 के पहले दस महीनों (अप्रैल–जनवरी) में भारत के राज्यों ने अपने कुल पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) बजट का केवल लगभग 51.8 प्रतिशत ही खर्च किया है। यह आँकड़ा विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन की धीमी गति को दर्शाता है। इन आँकड़ों का स्रोत CAG (नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक) है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 148 के तहत स्थापित एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। CAG का कार्य केंद्र और राज्य सरकारों की सभी आय (receipts) और व्यय (expenditure) का लेखापरीक्षण करना है, ताकि सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।

कैपेक्स (Capital Expenditure) से आशय सरकार द्वारा ऐसे खर्च से है, जो नई संपत्तियों (assets) के निर्माण, अधिग्रहण या सुधार के लिए किया जाता है और जो दीर्घकालिक आर्थिक लाभ प्रदान करते हैं। उदाहरण के रूप में नई सड़कें, पुल, रेलवे लाइनें, सिंचाई परियोजनाएँ, स्कूल, अस्पताल और मशीनरी जैसे बुनियादी ढाँचे का निर्माण शामिल हैं। इस प्रकार का निवेश अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे स्थायी परिसंपत्तियाँ बनती हैं, उत्पादक क्षमता बढ़ती है और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो पूंजीगत व्यय किसी भी राज्य की दीर्घकालिक विकास रणनीति का मुख्य आधार होता है। जब सरकारें बुनियादी ढाँचे पर निवेश करती हैं, तो इससे उद्योग, व्यापार और सेवाओं के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। बेहतर सड़क, परिवहन, बिजली और संचार व्यवस्था से निजी निवेश भी आकर्षित होता है, जिससे आर्थिक गतिविधियाँ तेज होती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार राज्यों ने लगभग ₹10.37 लाख करोड़ के निर्धारित कैपेक्स बजट में से करीब ₹5.38 लाख करोड़ ही खर्च किए हैं। इसका अर्थ है कि बजट का लगभग आधा हिस्सा अभी भी उपयोग नहीं हो पाया। यह स्थिति दर्शाती है कि कई राज्यों में योजनाओं के क्रियान्वयन की गति धीमी है और प्रशासनिक क्षमता अपेक्षित स्तर पर नहीं है। इसके विपरीत केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय अपेक्षाकृत तेज रहा है। केंद्र ने वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में ही अपने बजट अनुमान का लगभग 55.1 प्रतिशत खर्च कर लिया था। यह अंतर इस बात को दर्शाता है कि जहां केंद्र सरकार बुनियादी ढाँचे पर निवेश को तेजी से आगे बढ़ा रही है, वहीं कई राज्यों में परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गति धीमी बनी हुई है।

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हालांकि कुछ राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। उदाहरण के लिए तेलंगाना ने अपने निर्धारित बजट से भी अधिक, लगभग 121 प्रतिशत पूंजीगत व्यय किया। इसके अलावा हरियाणा, केरल और बिहार जैसे राज्यों ने भी अपने बजट का बड़ा हिस्सा उपयोग किया है। इसके विपरीत कुछ राज्यों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय और उत्तर प्रदेश उन राज्यों में शामिल हैं जहाँ पूंजीगत व्यय की गति काफी धीमी रही। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की स्थिति चिंताजनक है, जिसने अपने कैपेक्स बजट का केवल लगभग 29 प्रतिशत ही खर्च किया। यह आंकड़ा न केवल प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाता है बल्कि राज्य की विकास प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े करता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। राज्य ने लगभग 31 प्रतिशत पूंजीगत व्यय किया है। छत्तीसगढ़ में ग्रामीण सड़क, सिंचाई, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की आवश्यकता है। यदि इन क्षेत्रों में पूंजीगत निवेश तेज किया जाए तो राज्य की आर्थिक क्षमता को काफी बढ़ाया जा सकता है।

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पश्चिम बंगाल कभी भारत के सबसे अग्रणी औद्योगिक और बौद्धिक केंद्रों में से एक था। लेकिन हाल के वर्षों में राज्य की आर्थिक नीतियों और प्रशासनिक ढांचे पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। पूंजीगत व्यय का इतना कम उपयोग यह संकेत देता है कि राज्य सरकार विकास परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने में असफल रही है। यह भी आशंका व्यक्त की जाती है कि राजनीतिक प्राथमिकताएँ और लोकलुभावन योजनाएँ अक्सर दीर्घकालिक बुनियादी ढांचा निवेश से अधिक महत्व पा जाती हैं। परिणामस्वरूप राज्य में औद्योगिक निवेश, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों की गति प्रभावित होती है।

राज्यों में पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की धीमी गति के पीछे कई संरचनात्मक और प्रशासनिक कारण माने जा रहे हैं। सबसे प्रमुख कारण प्रशासनिक देरी है। कई विकास परियोजनाओं में स्वीकृति, टेंडर प्रक्रिया और विभागीय समन्वय में समय लगता है, जिससे परियोजनाएँ समय पर शुरू नहीं हो पातीं। परिणामस्वरूप बजट तो तय हो जाता है, लेकिन उसका वास्तविक उपयोग धीमा रहता है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण भूमि अधिग्रहण से जुड़ी समस्याएँ हैं। सड़क, औद्योगिक क्षेत्र, रेलवे या अन्य बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए भूमि उपलब्ध कराना अक्सर जटिल और लंबी प्रक्रिया होती है। स्थानीय विरोध, कानूनी विवाद और मुआवज़े से जुड़े मुद्दों के कारण परियोजनाएँ महीनों या कभी-कभी वर्षों तक अटक जाती हैं। इससे पूंजीगत खर्च की गति प्रभावित होती है।

इसके अलावा कई राज्यों में राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) को पूंजीगत निवेश की तुलना में अधिक प्राथमिकता दी जाती है। राजस्व व्यय में वेतन, पेंशन, सब्सिडी और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च शामिल होता है। राजनीतिक और सामाजिक दबावों के कारण सरकारें अक्सर इन खर्चों को प्राथमिकता देती हैं, जबकि दीर्घकालिक विकास के लिए आवश्यक पूंजीगत निवेश पीछे रह जाता है।

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इन सभी कारणों के चलते राज्यों में विकास परियोजनाओं की गति धीमी पड़ जाती है और निर्धारित बजट का पूरा उपयोग नहीं हो पाता। यदि इन प्रशासनिक और संरचनात्मक चुनौतियों को दूर किया जाए, तो पूंजीगत व्यय की गति बढ़ सकती है और इससे बुनियादी ढाँचे के विकास तथा आर्थिक वृद्धि को अधिक बल मिल सकता है।

पूंजीगत व्यय में कमी का सीधा प्रभाव आर्थिक विकास पर पड़ता है। जब सरकार बुनियादी ढांचे पर निवेश करती है तो इससे निर्माण गतिविधियाँ बढ़ती हैं, रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलता है। यदि यह निवेश धीमा पड़ता है, तो आर्थिक विकास की गति भी प्रभावित होती है। विशेष रूप से उन राज्यों के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण होती है जिन्हें बुनियादी ढांचे के विस्तार की अधिक आवश्यकता है।

समग्र रूप से देखा जाए तो पूंजीगत व्यय किसी भी राज्य की विकास प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण संकेतक है। जहाँ कुछ राज्य बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का कमजोर प्रदर्शन यह दिखाता है कि यदि नीतिगत स्पष्टता, प्रशासनिक दक्षता और विकास की वास्तविक प्राथमिकता न हो, तो बड़े बजट भी आर्थिक प्रगति में अपेक्षित परिवर्तन नहीं ला पाते।