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आखिरी सांस तक दौड़नेवाली आजाद कलम : राजेश शर्मा

डॉ. देवधर महंत

6 फरवरी 2026 की अलसुबह महासमुंद की फिज़ा में एक मनहूस ख़बर ने शोक उंडेल दिया। विगत बीस वर्षों से निष्पक्ष और निर्भीक ख़बर परोसने वाली एक आज़ाद कलम सहसा हमेशा के लिए चुप हो गई। फेसबुक पर महासमुंद के युवा विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा की पोस्ट ने चौंका दिया। एकाएक विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि वह कलम बार-बार मौत से आँख-मिचौली खेलते हुए उसे मात देती रही थी। हर बार मौत पराजित हुई थी।

लेकिन अनुज के.पी. साहू की चलित भाषिक सूचना ने पुष्टि कर दी कि इस बार हम सचमुच उस आज़ाद कलम को खो चुके हैं। वह कलम अब फड़फड़ाती हुई पंछी बनकर आसमान की ओर उड़ गई थी, कभी वापस नहीं आने की शर्त पर। दूर कहीं कुमार गंधर्व कबीर को गा रहे थे— “उड़ि जाएगा हंस अकेला…”। इस बार सचमुच हंस अकेला उड़ चुका था, अपने मानसरोवर को सदा के लिए अलविदा कहकर।

फेसबुक पर राजेश शर्मा की एक पोस्ट पहले ही अंखियों के झरोखे से गुज़र चुकी थी कि वे 21 जनवरी 2025 से रक्त संचरण, रक्तचाप और शुगर लेवल में वृद्धि के कारण जैन नर्सिंग होम में भर्ती हैं। ईश्वर से प्रार्थना करने का आग्रह था, और मेरे जैसे अनेक लोग मौन प्रार्थना में लीन थे। हालत अनियंत्रित होने पर भाई के.पी. साहू की पहल से उन्हें एम्स रायपुर में भर्ती कराया गया। सांसों को बचाए रखने की भरपूर कोशिशें होती रहीं, किंतु अंततः 6 फरवरी 2025 की सुबह शुभचिंतकों की आशाओं पर गाज गिर गई। इस बार प्रार्थनाएँ अनसुनी रह गईं।

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वे वापस नहीं लौटे। वापस लौटी उनकी पार्थिव देह, जो पहले साप्ताहिक ‘राष्ट्रीय अभियोजक’ के दफ़्तर में अंतिम दर्शनार्थ रखी गई, फिर श्मशान घाट में सैकड़ों नम आँखों के सामने अग्नि को समर्पित होकर पंचतत्व में विलीन हो गई।

मेरे शासकीय जीवन का लगभग बारह वर्ष—दो चरणों में (1993 से 1997 तथा 2006 से 2013)—महासमुंद जिले में व्यतीत हुआ। दूसरी पारी में, लिखने-पढ़ने वाले वस्त्र व्यवसायी दिलीप चोपड़ा के माध्यम से राजेश शर्मा की गहन साहित्यिक अभिरुचि और उनके द्वारा संपादित साप्ताहिक ‘राष्ट्रीय अभियोजक’ के साहित्यिक पृष्ठों की सुगंध से परिचय हुआ। जिज्ञासु कदम स्वयं उनसे मिलने चल पड़े। पहली ही भेंट में उनकी अनौपचारिकता और आत्मीयता ने यह एहसास नहीं होने दिया कि यह पहली मुलाक़ात है। कब यह संबंध घनिष्ठता में बदल गया, पता ही नहीं चला। शायद यह समान विचारधाराओं का सहज संगम था।

‘राष्ट्रीय अभियोजक’ में मेरी कविताएँ निरंतर प्रकाशित होती रहीं। उनके संपादन कौशल की विशेषता थी कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भीड़ में इस साप्ताहिक का अपना पाठक वर्ग तैयार हुआ। इसी अख़बार के माध्यम से कविता की एक नई विधा—‘कविता रिपोर्ताज’—का प्रवर्तन हुआ। अब तक रिपोर्ताज गद्य तक सीमित था, पर उनके संपादकीय साहस ने इस विधा को कविता में स्थान दिया। समसामयिक घटनाएँ कविता रिपोर्ताज बनकर मेरी लेखनी से प्रवाहित होती रहीं और अपार लोकप्रियता मिली। आज उन स्मृतियों को प्रणाम करते हुए उन रचनाओं को पुस्तक रूप देने का विचार कर रहा हूँ—शायद यही मेरी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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राजेश शर्मा केवल पत्रकार नहीं थे। वे दुख-सुख के सहभागी, मार्गदर्शक, मित्र और संरक्षक थे। उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति यह महसूस करता था कि वे उसके अपने हैं। साहित्य, राजनीति, समाज और पत्रकारिता पर उनकी पकड़ गहरी थी। महासमुंद के लिए उनकी उपस्थिति ऐसी थी मानो—

“जिधर से जाए वो खुशबू बिखेरता जाए,
कोई तो चाहिए ऐसा भी इस शहर के लिए।”

इस क्रूर और दोगले समय में वे एक रोशनदान थे। पत्रकारिता पर चर्चा करते हुए वे पीत पत्रकारिता और गिरते मूल्यों से व्यथित रहते थे, फिर भी बिना भयादोहन के सत्य की मशाल जलाए रखते थे। कहते थे— “मैं सैनिक की तरह मैदान में लड़ते हुए शहीद होना चाहता हूँ।” और सचमुच वे अंतिम सांस तक उसी मैदान में डटे रहे।

उनकी मित्रता संकट की कसौटी पर खरी उतरती थी। मेरे कठिन समय में, जब अनेक लोग पीछे हट गए, वे चट्टान की तरह साथ खड़े रहे। उनके परामर्श ने मुझे संयम, धैर्य और सत्य के मार्ग पर टिके रहने की शक्ति दी। आज जब वे नहीं हैं, तब उनकी अनुपस्थिति की कीमत और अधिक समझ में आती है। मैं सचमुच निर्धन हो गया हूँ।

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अपने जन्मदिवस 23 अप्रैल 2025 को उन्होंने लिखा था—

“अंधकार चाहे भारी हो,
लक्ष्य समुंदर पार हो।
सदा उजाला ही जीता है,
अगर सत्य आधार हो।”

शायद उन्हें अपने जाने का पूर्वाभास था। 18 दिसंबर 2024 की उनकी पंक्तियाँ अब और भी अर्थपूर्ण लगती हैं—

“अब जिस्म कर रहा है हर रोज़ इशारे,
क्यों न सफ़र के लिए सामान समेटा जाए।”

शब्द कभी नहीं मरते। अक्षरों से बने शब्दकार कभी नहीं मरते। राजेश शर्मा हमारे बीच स्मृतियों में जीवित हैं। हाँ, उनके बिना शहर में एक खालीपन स्थायी रूप से दर्ज हो चुका है—

“आपके बिना अजीब इस शहर का आलम है,
चिराग सैकड़ों जलते हैं, मगर रौशनी कम है।”

डॉ. देवधर महंत