क्राँतिकारी पृथ्वी सिंह आज़ाद: गदर से गणतंत्र तक का संघर्षपूर्ण जीवन
भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास केवल देश के भीतर हुए आंदोलनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत क्राँतिकारियों के प्रयासों का भी परिणाम है जिन्होंने विदेशों में रहकर जनमत तैयार किया, संगठन खड़े किए और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध वैश्विक स्तर पर वातावरण बनाया। ऐसे ही अग्रणी, चिंतक और साहसी क्राँतिकारी पृथ्वी सिंह आज़ाद का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की बहुआयामी कथा को सामने लाता है। प्रस्तुत आलेख उनके जीवन, संघर्ष और विचारधारा का संक्षिप्त किंतु सारगर्भित परिचय है। – संपादक
भारत की स्वाधीनता के लिये जितना संघर्ष भारत के भीतर हुआ, संघर्ष के लिये उतना ही जन जागरण अभियान विदेशों में हुआ। असंख्य ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्राँतिकारी रहे, जिन्होंने भारत के भीतर भी संघर्ष किया और जेल गये, और भारत के बाहर भी स्वतंत्रता के लिये वातावरण बनाया। क्राँतिकारी पृथ्वीसिंह आजाद ऐसे ही स्वाधीनता सेनानी थे। वे गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
ऐसे चिंतक, विचारक और क्राँतिकारी पृथ्वी सिंह आजाद का जन्म 15 सितंबर 1892 को पंजाब प्रांत के मोहाली क्षेत्र अंतर्गत ग्राम लालरू में हुआ था। इन दिनों इस क्षेत्र को साहिबजादा अजीतसिंह नगर के नाम से जाना जाता है। उनके पिता शादीराम भी राष्ट्र जागरण अभियान से जुड़े थे। परिवार के संस्कार और राष्ट्रवादी वातावरण के चलते पृथ्वीसिंह किशोर अवस्था में ही राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ गये थे। आगे चलकर वे लाला लाजपत राय के संपर्क में आये और युवकों को संगठित कर क्राँतिकारी आंदोलन के समर्थक हो गये।
समय के साथ वे सक्रिय हुए और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी तथा खुदीराम बोस के बलिदान के समाचारों ने उनके मन में तीव्र प्रभाव डाला। उन्हें लगा कि भारत की स्वतंत्रता के लिये भारत से बाहर अंग्रेजों के विरोधियों का भी समर्थन आवश्यक है। अपने इस विचार से उन्होंने तत्कालीन वरिष्ठों को अवगत कराया और सहमति लेकर वे 1912 में अमेरिका गये। वहाँ वे हिंदुस्तानी एसोसिएशन ऑफ पैसिफिक कोस्ट के संस्थापकों में से एक लाला हरदयाल से मिले। इसी संस्था को गदर पार्टी के नाम से जाना जाता था। यह संगठन अमेरिका में प्रवासी भारतीयों को संगठित कर भारत की अंग्रेजों से मुक्ति के लिये वातावरण बना रही थी।
युवा पृथ्वीसिंह संस्था से जुड़े और इसके विस्तार के कार्य में लग गये। उन्होंने गदर पार्टी के मुखपत्र “गदर” के प्रकाशन और प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाई। जब प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ, तो गदर पार्टी ने अपने अनेक कार्यकर्ताओं को भारत भेजा और अंग्रेजों से मुक्ति की सशस्त्र क्रांति को तेज किया। युवाओं से आव्हान किया गया कि अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका जाये। भारत की स्वाधीनता का यही संकल्प लेकर पृथ्वीसिंह 29 अगस्त 1914 को लगभग 150 स्वतंत्रता सेनानियों के साथ भारत लौटे। उन्होंने पूरे पंजाब की यात्रा की और युवकों को संगठित करना आरंभ किया।
जब यह समाचार अंग्रेजों को मिला, तो 7 दिसंबर 1914 को वे गिरफ्तार कर लिये गये। अंग्रेजों ने उन पर लाहौर षड्यंत्र केस में भी आरोपी बनाया। उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया, लेकिन बाद में साक्ष्यों के अभाव में मृत्युदंड को बदलकर आजीवन कारावास कर दिया गया और उन्हें सेलुलर जेल भेजा गया। बाद में 1922 में उन्हें नागपुर जेल स्थानांतरित किया गया। इसके अतिरिक्त कलकत्ता, मद्रास आदि विभिन्न जेलों में भी लगभग दस वर्षों तक उन्हें रखा गया।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने अधिकांश राजनीतिक बंदियों को रिहा किया, जिसका लाभ पृथ्वीसिंह जी को भी मिला और वे रिहा कर दिये गये। रिहाई के बाद वे रूस गये और वहाँ रह रहे भारतीयों तथा अंग्रेज विरोधी विचार के लोगों से संपर्क किया। उन्होंने भारतीय समाज की पीड़ा और औपनिवेशिक दमन का विस्तृत वर्णन किया, जो लेनिन पत्रिका में प्रकाशित हुआ। बाद में उनके ये संस्मरण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुए।
भारत लौटने पर वे कांग्रेस से जुड़े और गांधी जी के नेतृत्व में आंदोलन की मुख्यधारा में सक्रिय हो गये। विभिन्न आंदोलनों में भाग लेते हुए वे कई बार जेल गये। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा आजाद हिंद फौज के गठन के समय वे उसके समर्थक भी बने।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने पंजाब से संविधान सभा का चुनाव लड़ा और विजयी हुए। भारत सरकार ने 1977 में उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया। जीवन का अंतिम समय अस्वस्थता में बीता और 5 मार्च 1989 को क्राँतिकारी और विचारक पृथ्वीसिंह आजाद ने 96 वर्ष की आयु में संसार से विदा ली। उनकी जीवन गाथा दो आत्मकथाओं में उपलब्ध है। इनमें “क्रांति पथ का पथिक” का प्रकाशन 1990 में हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा किया गया और “बाबा पृथ्वी सिंह आज़ाद, महान योद्धा” 1987 में भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित की गई।


भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास केवल देश के भीतर हुए आंदोलनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत क्राँतिकारियों के प्रयासों का भी परिणाम है जिन्होंने विदेशों में रहकर जनमत तैयार किया, संगठन खड़े किए और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध वैश्विक स्तर पर वातावरण बनाया। ऐसे ही अग्रणी, चिंतक और साहसी क्राँतिकारी पृथ्वी सिंह आज़ाद का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की बहुआयामी कथा को सामने लाता है। प्रस्तुत आलेख उनके जीवन, संघर्ष और विचारधारा का संक्षिप्त किंतु सारगर्भित परिचय है। – संपादक