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स्व का बोध से पर्यावरण संरक्षण तक: भारत निर्माण की दिशा

किसी भी राष्ट्र का उत्थान केवल आर्थिक प्रगति से नहीं होता, बल्कि उसके नागरिकों के संस्कार, कर्तव्यनिष्ठा, सामाजिक दृष्टिकोण और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी से होता है। आज जब समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है जैसे सांस्कृतिक विघटन, परिवारों का विखंडन, नागरिक कर्तव्यों की उपेक्षा, सामाजिक असमानता और पर्यावरण संकट, तब इन पंच सूत्रों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह न केवल व्यक्ति के जीवन को दिशा देते हैं, बल्कि समूचे समाज को संगठित, सशक्त और समरस बनाने की शक्ति रखते हैं।

1. स्व का बोध / स्वधारित जीवन शैली

किसी भी समाज का उत्थान तभी संभव है जब उसके लोग अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी मौलिकता को पहचानें। “स्व का बोध” का अर्थ है कि हम यह समझें कि हमारी जीवनशैली, हमारे विचार और हमारे कर्म स्वतंत्र और स्वावलंबी होने चाहिए। यह केवल व्यक्तिगत पहचान की बात नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता से भी जुड़ा हुआ है। विदेशी वस्तुओं और विचारों पर निर्भर रहने की बजाय हमें स्वदेशी उत्पादों, भारतीय परंपराओं, योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक जीवनशैली को अपनाना चाहिए। इससे समाज आत्मनिर्भर बनेगा और आत्मविश्वास से भर जाएगा।

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2. कुटुंब प्रबोधन (परिवार प्रबोधन)

परिवार किसी भी सभ्यता की पहली पाठशाला होता है। बच्चे अपने संस्कार, मूल्य और जीवन की दिशा सबसे पहले परिवार से ही ग्रहण करते हैं। यदि परिवार सुदृढ़ होगा तो समाज स्वतः सुदृढ़ बनेगा। कुटुंब प्रबोधन का आशय है कि परिवार में संवाद और सामूहिकता को बढ़ाया जाए। एक साथ भोजन करना, एक-दूसरे से चर्चा करना, बुजुर्गों से मार्गदर्शन लेना और परिवार को केवल आर्थिक इकाई न मानकर मूल्यनिष्ठ इकाई बनाना आवश्यक है। जब परिवार संस्कारवान होंगे, तब ही समाज में नैतिकता और सदाचार की नींव मजबूत होगी।

3. नागरिक कर्तव्य

सशक्त राष्ट्र केवल अधिकारों की माँग से नहीं, बल्कि नागरिकों के कर्तव्यों के पालन से भी निर्मित होता है। हर नागरिक का दायित्व है कि वह नियमों का पालन करे, कर समय पर अदा करे, चुनावों में भाग ले और समाज व राष्ट्र की प्रगति में अपना योगदान दे। सड़क पर सफाई रखना, यातायात नियमों का पालन करना, रक्तदान करना या स्थानीय समस्याओं के समाधान में सक्रिय रहना – ये सभी नागरिक कर्तव्यों के छोटे-छोटे उदाहरण हैं। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का उत्तरदायित्व निभाता है, तब ही समाज व्यवस्थित और सशक्त बनता है।

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4. सामाजिक समरसता

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ भाषा, धर्म, जाति और परंपराओं का व्यापक वैविध्य है। यदि इन भिन्नताओं को विभाजन का कारण मान लिया जाए, तो समाज में दूरी और संघर्ष पैदा होगा। किंतु यदि इन्हें विविधता में एकता के रूप में स्वीकार किया जाए, तो समाज और अधिक सशक्त होगा। सामाजिक समरसता का तात्पर्य है कि हम सबको समान दृष्टि से देखें। जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न करें। एक साथ बैठकर भोजन करना, त्योहार सामूहिक रूप से मनाना और सबको बराबरी का सम्मान देना सामाजिक समरसता के वास्तविक रूप हैं। यही समरसता समाज को संगठित और सुदृढ़ बनाती है।

5. पर्यावरण संरक्षण

प्रकृति हमारी जीवन रेखा है। यदि हम जल, जंगल और जमीन का अंधाधुंध दोहन करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ संकट का सामना करेंगी। पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं है, बल्कि जल का सदुपयोग करना, प्रदूषण रोकना, ऊर्जा का संयमित प्रयोग करना और पर्यावरण मित्र जीवनशैली अपनाना है। स्वच्छ नदियाँ, हरियाली से भरपूर गाँव और प्रदूषण रहित शहर – ये केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं हैं। इसके लिए हर नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। जब समाज पर्यावरण को अपनी जिम्मेदारी समझेगा, तभी भविष्य सुरक्षित होगा।

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पंच परिवर्तन के ये पाँच सूत्र समाज के सर्वांगीण विकास के मार्गदर्शक हैं। “स्व का बोध” हमें आत्मनिर्भर बनाता है, “कुटुंब प्रबोधन” संस्कार और मूल्य प्रदान करता है, “नागरिक कर्तव्य” समाज को जिम्मेदार बनाता है, “सामाजिक समरसता” एकता की भावना को गहरा करती है और “पर्यावरण संरक्षण” आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य रचता है। यदि इन पाँच सूत्रों को हम अपने जीवन में उतार लें, तो एक मजबूत, संस्कारित, समरस और समृद्ध भारत का निर्माण सुनिश्चित है।

टीम न्यूज एक्सप्रेस

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