नाना नानी हो तो नीम जैसे

श्रीकृष्ण “जुगनू”

यह कितने फीसदी सच है पता नहीं कि निरोगी जीवन के लिए नीम जरूरी है। अच्छे स्वास्थ्य की साधना की नींव में नीम है। नीम इतना परिचित और अपना है कि नीमला, नीबड़ा जैसे मैत्री वाली भाषा से भी बुलाया और बतलाया जाता है। है भी ठेठ गंवाई पेड़। गली का पेड़। गली की गांठ चौरे का पेड़। इसको पेड़ से ज्यादा अपना सगा ही माना जाता है। आत्मिक नीम! सेहरी का प्रहरी और घर का जर। रोग हर।

कटु कटवाई गंध के परिवेश को रचने वाला नीम और उसकी सीम कभी चेचक – पूतना तक से बचाए रखती। बारिश में नीम के नीचे भीगना व्याधिहारी स्नान क्यों माना जाता! क्यों मां नीम के पत्तों का धुआं करके बुखार और मयदी ताव उतार देती और कहती कि नाना हो तो नीमडे जैसा और नानी हो तो नीमडी जैसी! सुबह शाम पत्तों को बुहारती जाती और कहती रहती थी : बापजी! आप तो मेरे लिए काम बढ़ाया हुआ ही रखते हो। लेकिन, पत्तियां कहां गिराते हो, अभयदान देते हो।

नीम का तरु अपने आंगन की बहू का ससुर नहीं, पिता की तरह ख्याल रखता है और देखभाल करता है! भले ही गीतकार ने कह दिया : कभी नीम नीम, कभी शहद शहद…! नीम की गलबहियां कर गिलोय अमृता हो जाती है! कारलता कड़ा करेला हो जाता है! इन मुहावरों में नीम के साहचर्य के अनुपम गुणों का गान है। पीपल ने यदि गौतम को ज्ञान दिया तो नीम ने गौरी को कैलासनाथ शिव : नीम नियम पालन कियो, गवरन पायो ईस!

नीम के बहाने से कितनी बातें नारी के कोमल मन ने ऐसी कही कि लोक की थाती हो गई। ये बातें मैंने अपने थीसिस के काल में जानी थी! नीम के लोकगीत कंधार से कंबोई तक गूंजते हैं। निमाड़ी गायिका आदरणीय हेमलता उपाध्याय जी का गाया नीम की छाया माया वाला गीत कोई कैसे भुला सकता है! उनका संग्रह उपहार मेरी निधि हो गया है। (बड़े भाई श्री शिशिर उपाध्याय जी ने उसको भिजवाया है) नीम के नाम पर कितने गांव हैं। मेरी चचेरी बहन का नाम ही नीमा है!

कितने ही देव स्थानों के नीम के पेड़ों की डालियों पर संतान प्राप्ति के बाद पालने बनवाकर लटकाए गए! इन दिनों गांवों में सर्वेक्षण के काम में मुझे जब जब थकान हुई तो जिसकी छाया में पसीना सुखाया या सिर छुपाया, वह नीम का पेड़ निकला। गर्मी की ऋतु में नीम, इमली और आम के बीच बड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है। तीनों ही फलते हैं। अमराई से रसाल, चिंचाई से अमाल और नीमराई से नम्बाल यूं ही नहीं कहा जाता। नीम से हमारी गुवाड़ नीमाड़ वाली कहलाती। हवेली निम्वाली बोली जाती। नीम अपनी छाया की आड़ में उपचार भी करता रहता है! (वृक्षायुर्वेद में मेरी भूमिका)

यह कितना विचित्र है कि जिन लोक देवताओं को छत के नीचे विराजित किया जाता है, उन पर नीम की पाती बराबर चढ़ाई जाती है। यह देवता को भी निरोग और समर्थवान करता है। मुझे नीम की छाया में रहना भाता है। कड़वी कोमल पत्तियां चबाना और छिलके को भूनकर बनाये मंजन से दांत मांजना ठीक लगता है। नीम का दातुन घर की सारी पीढ़ी करती आई है। याज्ञवल्क्य को यही पसंद था। दादी यह भी जानती थी कि कोठे में जो गेहूं भरा जाएगा, उसके नीचे नीम की लकड़ियां और नीम के पके पत्ते बिछाने से घुन नहीं लगता। हां, कटु नीम और कृष्ण पक्ष का ध्यान रखती। बाबरू काका तो नीम की डाली से हवा करके जहर कैसे उतार डालते थे!

मैं देखता हूं कि बुजुर्ग कितने ज्ञानी थे कि गांव की बसाहट में जिन पेड़ों को जरूरी मानते थे, उनमें नीम प्रमुख है। बरगद अगर शिव है तो नीम पार्वती। पेड़ों को ऐसी पहचान कैसे मिली? पार्वती एकप्रण, एकप्राण और एकपर्णा हुईं। नीम के अनेक गुण गौरी की गरिमा लिए हैं। गौरी की पूजा में नीम की पत्तियां और डाली लाई जाती है… कितना बड़ा सच है कि न जैसे नकारात्मक वर्ण से नाम होने के बावजूद नीम सुखद, सकारात्मकता का साधक और आराधक है।

उदयपुर राजस्थान निवासी लेखक संस्कृति विशेषज्ञ हैं।

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