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पौराणिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है नवरात्र

पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक क्रूर राक्षस ने देवलोक और भूलोक में भयंकर उत्पात मचाया हुआ था। उसे ब्रह्माजी से अजेय-अमरता का वरदान प्राप्त था, जिसके अनुसार कोई स्त्री ही उसे मार सकती थी। महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने आदिशक्ति के विध्वंसक स्वरूप दुर्गा का आह्वान किया। तब मां दुर्गा ने रौद्र स्वरूप में प्रकट होकर नौ दिन चले युद्ध में महिषासुर का वध किया।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, लंका पर चढ़ाई से पूर्व श्रीराम ने ऋष्यमूक पर्वत पर प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन चंडी देवी की पूजा-अर्चना करके आशीर्वाद प्राप्त किया। इसीलिए प्रागैतिहासिक काल से नौ दिन तक नवरात्र पर्व मनाने की परंपरा है। कल्पशास्त्र व पुराणों के अनुसार, इन नौ दिनों में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में शक्ति की आराधना की जाती है। 51 शक्तिपीठ स्थलों पर विशेष उपासना होती है।

भारतीय संस्कृति में चार नवरात्र बताए गए हैं—चैत्र नवरात्र, आषाढ़ और पौष में गुप्त नवरात्र, तथा अश्विन मास में शारदीय नवरात्र। ये ऋतु-संधिकाल के भी द्योतक हैं। चैत्र नवरात्र से नववर्ष व वसंत ऋतु का आरंभ होता है, और शारदीय नवरात्र में शक्ति साधना से नवऊर्जा की प्राप्ति व शीत ऋतु का आरंभ होता है। इसलिए भी चैत्र और शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व है।

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आयुर्वेद के अनुसार, चैत्र में गेहूं व अश्विन में चावल की नई फसल कटती है। नवधान्य में उष्मा अधिक होने के कारण उसे पचा पाना कठिन होता है। नवरात्र के नौ दिन उपवास में रहने से जठराग्नि तीव्र होती है, इससे नवधान्य को ग्रहण करना सरल हो जाता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति की प्रतीक देवी दुर्गा की आराधना से जीवन में शुभता व शुचिता की स्थापना और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन होता है। मंत्रोच्चार, व्रत और नियम पालन से आध्यात्मिक व मानसिक शक्ति प्रबल होती है, तथा स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से, जिसे बिग बैंग बताया गया है, उसे भारतीय अवधारणा में हिरण्यगर्भ कहा गया है। इससे अस्तित्व में आए जगत के सभी जड़ व चेतन तत्व शक्ति का ही परिणाम हैं। ऋग्वेद में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड की अनन्त श्रृंखलाएं किसी शक्ति के प्रभाव से ही गतिशील बनी हुई हैं। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु और संहारकर्ता महेश से उत्पन्न आदिशक्ति को ही जगत का आधार माना जाता है।

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नवरात्र में आदिशक्ति के जिन नौ रूपों की आराधना होती है, वैज्ञानिक दृष्टि से इन्हें भी नौ ऊर्जाओं का स्वरूप बताया गया है—शैलपुत्री को स्थितिज ऊर्जा, ब्रह्मचारिणी को गतिज ऊर्जा, चंद्रघंटा को ध्वनि ऊर्जा, कुष्मांडा को नाभिकीय ऊर्जा, स्कंदमाता को चुंबकीय ऊर्जा, कात्यायिनी को आण्विक ऊर्जा, कालरात्रि को ताप ऊर्जा, महागौरी को विद्युत ऊर्जा और सिद्धिदात्री को रासायनिक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।
नौ अंक भी हमारी संस्कृति में महत्वपूर्ण है। नवधा भक्ति, नौ रस, नौ रत्न, नौ रंग और योग-आयुर्वेद में नौ चक्र इत्यादि के अतिरिक्त, 18 पुराण, 108 उपनिषद, 27 नक्षत्र, सृष्टि का पूरा काल और चारों युगों की कालावधि आदि नौ के ही गुणांक हैं।

-उमेश कुमार चौरसिया, साहित्यकार एवं संस्कृति चिंतक