मिजो सरदारों को जमीन का मालिकाना हक साबित नहीं हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की मांग वाली याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने मिजोरम के मिजो सरदारों को उनकी जमीन के कथित अधिग्रहण के बदले अतिरिक्त मुआवजा देने की मांग वाली याचिका को शुक्रवार को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि मिजो सरदारों के पास उस जमीन का पूर्ण स्वामित्व था, जिस पर वे प्रशासनिक अधिकार रखते थे।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य मुख्य रूप से ऐतिहासिक लेखों और शोध सामग्री पर आधारित थे, जो कानूनी रूप से जमीन के मालिकाना हक को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों और ऐतिहासिक विवरणों से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं होता कि मिजो सरदार उस भूमि के पूर्ण स्वामी थे। ऐसे कमजोर और अपर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर इतना बड़ा फैसला नहीं लिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें मिजो सरदारों की तुलना आजादी के बाद भारत में शामिल हुई रियासतों के शासकों से की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जैसे रियासतों के शासकों को प्रिवी पर्स दिया गया था, उसी तरह मिजो सरदारों को भी जमीन के बदले मुआवजा मिलना चाहिए।
अदालत ने कहा कि प्रिवी पर्स का प्रावधान उस समय हुए विशेष राजनीतिक समझौतों और वार्ताओं का परिणाम था। इसे किसी अन्य पारंपरिक सत्ता या समुदाय के लिए कानूनी अधिकार के रूप में नहीं माना जा सकता।
यह मामला मिजो चीफ काउंसिल द्वारा वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट में दायर किया गया था। याचिका में लुशाई हिल्स जिले (वर्तमान मिजोरम) के पूर्व सरदारों और उनके उत्तराधिकारियों की ओर से दावा किया गया था कि 1955 में जब सरदार व्यवस्था समाप्त की गई, तब उनकी जमीन राज्य के अधीन कर दी गई, लेकिन उसके लिए उचित मुआवजा नहीं दिया गया।
ऐतिहासिक रूप से मिजो समाज में वंशानुगत सरदारों की व्यवस्था थी। प्रत्येक सरदार एक निश्चित क्षेत्र, जिसे “राम” कहा जाता था, का प्रशासन संभालता था। वे ग्रामीणों को खेती के लिए भूमि देते थे और बदले में पारंपरिक कर “फाथांग” वसूलते थे।
ब्रिटिश शासन के दौरान भी प्रशासनिक सुविधा के लिए इस व्यवस्था को जारी रखा गया था। हालांकि सरदारों का काम औपनिवेशिक अधिकारियों की निगरानी में होता था। आजादी के बाद यह क्षेत्र असम का हिस्सा रहा और वर्ष 1954 में असम विधानसभा ने एक कानून बनाकर सरदारों के अधिकार समाप्त कर दिए और जमीन के अधिकार राज्य को हस्तांतरित कर दिए।
मार्च 1955 में जारी अधिसूचना के तहत सरदारों के अधिकार औपचारिक रूप से समाप्त कर दिए गए और उन्हें कानून के अनुसार कुछ मुआवजा दिया गया था। बाद में सरदारों का दावा था कि उन्हें केवल कुछ विशेषाधिकारों के खत्म होने का मुआवजा मिला, जबकि जमीन के लिए भुगतान नहीं किया गया।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेजों की जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि जमीन के मालिकाना हक का पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसलिए यह दावा भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि राज्य ने उनकी संपत्ति बिना मुआवजे के ले ली।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि मिजो सरदार अतिरिक्त मुआवजे के हकदार नहीं हैं।

