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एक अल्पज्ञात कवि की याद में…

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

उनके बारे में साहित्यिक बिरादरी की वर्तमान पीढ़ी को शायद जानकारी नहीं होगी, या फिर कम जानकारी होगी। आइए, जानते हैं उनके जीवन और उनके काव्य-सृजन के बारे में। वे हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के सुमधुर गीतकार थे। साहित्यिक क्षितिज पर तेजी से उभरता नाम था उनका मधु धांधी, जो बहुत कम उम्र में दुनिया से चले गए। आज 3 अप्रैल 2026 को ग्रामीण परिवेश के इस अल्पज्ञात कवि की 49वीं पुण्यतिथि है। निधन के समय उनकी आयु मात्र 26 वर्ष के करीब थी।

तत्कालीन रायपुर जिले के ग्राम पिसीद (विकास खण्ड कसडोल) में 21 जून 1951 को जन्मे मधु धांधी का निधन 3 अप्रैल 1977 को वर्तमान महासमुंद जिले के अपने गृह ग्राम खुटेरी (विकास खण्ड पिथौरा) में हुआ। उनके अल्प जीवनकाल में समय-समय पर उनकी कुछ कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं और कुछ कविताओं का आकाशवाणी रायपुर केन्द्र से प्रसारण भी हुआ। कवि सम्मेलनों के मंचों पर भी उनकी काव्य-प्रतिभा को अच्छी पहचान मिलने लगी थी। वह छत्तीसगढ़ के साहित्य आकाश के उभरते हुए सितारे थे। बहुत दुःखद है कि उनकी चमक पूरी तरह फैलने से पहले ही विलुप्त हो गई। कवि मधु धांधी का रचना-संसार बहुत व्यापक था। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं की हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और माटी-महतारी की मर्मस्पर्शी छुअन भी महसूस की जा सकती है।

उनके साहित्यिक मित्रों और प्रशंसकों ने उनकी स्मृति में पिथौरा में साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति का गठन किया था। समिति ने उनकी 25 चयनित कविताओं का संकलन “हृदय का पंछी” शीर्षक से वर्ष 1977 में प्रकाशित किया था। यह उनका पहला काव्य-संग्रह था। इसमें उनकी 13 हिन्दी और 12 छत्तीसगढ़ी कविताएँ शामिल थीं। लगभग 45 वर्ष बाद उनकी 74 हिन्दी कविताओं का संकलन “मेरा सागर : तुम्हारी कश्ती” शीर्षक से वर्ष 2022 में वैभव प्रकाशन, रायपुर से प्रकाशित हुआ। यह उनका दूसरा काव्य-संग्रह है। इसी तरह उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह “मोर सुरता के गाँव” का प्रकाशन भी वर्ष 2022 में हुआ। इसे श्रृंखला साहित्य मंच, पिथौरा द्वारा प्रकाशित किया गया। वर्ष 2022 में प्रकाशित दोनों पुस्तकों का विमोचन समारोह पिथौरा के समीप स्थित दिवंगत कवि के गृह ग्राम खुटेरी में 19 फरवरी 2023 को आयोजित किया गया। उनके प्रथम काव्य-संग्रह की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं को भी इन दोनों पुस्तकों में शामिल किया गया है।

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यह एक विडम्बना ही है कि स्वर्गीय मधु धांधी के तीनों कविता-संग्रह तब प्रकाशित हुए, जब वे इस दुनिया में नहीं थे। मैंने अत्यंत व्यथित और भारी हृदय से उनके इन तीनों कविता-संग्रहों का सम्पादन किया। काश! उनकी ये तीनों पुस्तकें उनके जीवनकाल में प्रकाशित हो पातीं, लेकिन नियति को शायद यह मंजूर नहीं था।

उनकी स्मृतियों को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए उनके गृह ग्राम खुटेरी में उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गई है। स्वर्गीय मधु धांधी के जन्मदिन पर 21 जून 2025 को उनकी प्रतिमा का अनावरण वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक हरिभूमि रायपुर के सम्पादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने किया। इस अवसर पर अंचल के अनेक साहित्यकार, पत्रकार, प्रबुद्ध नागरिक तथा स्वर्गीय मधु धांधी के आत्मीय परिजन उपस्थित थे।

काश! मधु धांधी हमारे बीच होते और मधुर स्वरों में अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर रहे होते। लेकिन संसार में सब कुछ हमारे चाहने मात्र से नहीं होता। मनुष्य इस संसार में आता है और नियति द्वारा निर्धारित आयु में विभिन्न कर्म क्षेत्रों में अपनी भूमिकाएँ निभाकर चला जाता है। मधु धांधी ने अल्प समय तक ही सही, लेकिन साहित्य साधना के माध्यम से एक श्रेष्ठ कवि के रूप में देश और समाज में अपनी सार्थक भूमिका निभाई। उनकी रचनाओं में जहाँ मानवीय प्रेम की सुकोमल भावनाओं के विविध रंग हैं, वहीं मजदूरों और किसानों के साथ-साथ सम्पूर्ण मानव जीवन के दुःख-दर्द तथा संघर्षों की मार्मिक अभिव्यक्ति भी मिलती है। उनकी लेखनी ने देशप्रेम के गीतों का भी सृजन किया। उनकी रचनाओं में अनेक प्रभावशाली प्रतीक और बिम्ब मिलते हैं।

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युवा अवस्था में ही भौतिक संसार को छोड़ जाने वाले कवि मधु धांधी का रचना-संसार अत्यंत व्यापक था। उनकी रचनाओं में हिन्दी साहित्य के छायावाद और प्रगतिवाद के अनोखे रंग दिखाई देते हैं। कवि की भावनाओं के महासागर में “तुम न रहे तो सृष्टि का निर्माण अधूरा” जैसी छायावादी रचनाओं की तरंगें भी हैं और “संघर्षों में घिर कर जी लें” जैसी प्रगतिवादी कविताओं की उफनती हुई लहरें भी। समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता से व्यथित कवि की पीड़ा इन पंक्तियों में प्रकट होती है —

मित्र, मुझे विश्वास नहीं है,
बहुत सुखी यह देश है मेरा,
कुछ सड़कों में काट रहे हैं,
किया कुछों ने रैन बसेरा।
गांधी पर भी गोली बरसी,
ईसा के हाथों में कीलें,
क्या होता है मेरे साथी,
संघर्षों में घिरकर जी लें।
भूखे को कब रोटी मिलती,
कब नंगे को वस्त्र मिला है,
हम बंदी, धन वाले शासक,
कैदी को कब अस्त्र मिला है?

उनके दूसरे कविता-संग्रह की एक और रचना की बानगी —

राम रहे क्या तुम ही बोलो,
तब हर नारी सीता कैसी,
स्वयं द्रौपदी बिकने बैठी,
तब हर पुस्तक गीता कैसी?
निकली है बिन लाश कफन के,
भूख-भूख बचपन चिल्लाता,
सुख का ही साम्राज्य नहीं जब,
दुःख को तुमने जीता कैसे?
ऋण के पक्के बांध यहाँ हैं,
खाद उधारी की फसलों पर,
आँसू की नदियाँ बहती हैं,
सागर हो फिर रीता कैसे?

हिन्दी की तरह उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं में भी माटी का सोंधापन, किसानों और मजदूरों की भावनाओं की सहज और प्रभावी अभिव्यक्ति मिलती है। उनके तीसरे कविता-संग्रह “मोर सुरता के गाँव” में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है —

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खेत-खेत ला पानी, सब ला काम दव,
जाए बर हे दुरिहा, झन आराम लव।

इस गीत में कवि जनता को संकेत देता है कि झूठे आश्वासनों पर भरोसा मत करो —

झन पतियाहू तुमन त असवासन ला,
का पाए हव सुन-सुन लबरा भासन ला?
गांधीजी के सपना सपना रहिगे,
नेहरूजी के प्रिय गुलाब कछु कहिगे,
छत्तीसगढ़ के बेटा मन सब सहिगे,
बादर बिन बरसे के बरसे रहिगे।

इस संग्रह में “आँखी होगे बदरा” और “रोवत हे अंगना के दीयना” जैसे प्रेम और विरह के गीत भी शामिल हैं। छत्तीसगढ़ की युवा पीढ़ी के इस कवि ने अपनी रचनाओं से अपने समय के अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों का ध्यान आकर्षित किया था।

नारायणलाल परमार, पूर्व उप प्राचार्य एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष, विज्ञान कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय धमतरी ने 11 फरवरी 1978 को लिखा —

हृदय का पंछी की प्रति मिली। इस संकलन में मधु की जितनी भी रचनाएँ संकलित हैं, वे कवि की गहरी अनुभव क्षमता का परिचय देती हैं। उभरती पीढ़ी के कवियों में मधु का स्वर अत्यंत ईमानदार और प्रभावी लगा।”

डॉ. विनय कुमार पाठक, पूर्व अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ने लिखा —

“कविता हृदयगत भावनाओं का स्वच्छन्द उच्छलन है। ‘हृदय का पंछी’ कल्पना और यथार्थ का समन्वय करते हुए जीवन का अनुभव कराता है। यह संग्रह छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा में एक महत्वपूर्ण उपक्रम है।”

रामेश्वर वैष्णव ने श्रद्धांजलि देते हुए लिखा —

“मधु धांधी एक स्नेहिल और संवेदनशील व्यक्तित्व थे। उनकी लेखनी में बड़ी संभावनाएँ थीं, लेकिन उनका जीवन अल्पकाल में ही समाप्त हो गया। छत्तीसगढ़ का एक सशक्त गीतकार हमसे दूर चला गया।”

वास्तव में, यदि मधु धांधी आज हमारे बीच होते तो निश्चय ही वे साहित्य की ऊँचाइयों पर होते। उनकी 49वीं पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

स्वराज्य करुण